साल 1997 और महीना जून का। जगह थी नई दिल्ली का इंटरनेशनल एयरपोर्ट। एक फ्लाइट लैंड की, जिस पर लिखा था- ‘रॉयल भूटान एयरलाइन्स’। ये फ्लाइट भूटान की राजधानी थिंपू से आई थी। फ्लाइट से 3 लोग उतरे- प्रेग्नेंट महिला, उसकी सहेली और एक आदमी, जो आर्मी अफसर जैसा
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एयरपोर्ट पर टैक्सी उनका इंतजार कर रही थी। तीनों टैक्सी में बैठकर एक होटल पहुंचे। वहां बोंटी बरुआ के नाम पर उनके लिए एक कमरा बुक था। कुछ देर कमरे में आराम करने के बाद तीनों बाजार घूमने निकल गए।
बाजार में उनसे एक शख्स मिला। उसने इन तीनों से कहा, ‘आपके मुंबई जाने का इंतजाम हो गया है। वहां के जसलोक अस्पताल में इलाज के लिए बात हो गई है।’
जब चारों आपस में बात कर रहे थे, तब एक पांचवां व्यक्ति सुन रहा था। वो था- एक पुलिस अफसर, जो सिविल ड्रेस में प्रेग्नेंट महिला और उसके साथियों का पीछा कर रहा था।
ये प्रेग्नेंट महिला कोई और नहीं, बल्कि एक उग्रवादी थी, जो यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, यानी ULFA की मेंबर थी। नाम था- प्रणति डेका।
ULFA एक उग्रवादी संगठन था, जो बंदूक के दम पर असम से बंगाली और हिंदी भाषी लोगों को भगा रहा था। असम को आजाद कराने के लिए सैकड़ों लोगों की हत्या कर चुका था।
तब असम के हालात भी उग्रवाद झेल रहे पंजाब जैसे हो गए थे। इनकी दहशत का आलम ये था कि असम के लोगों को सरकार के अलावा ULFA को भी टैक्स देना पड़ता था।
दरअसल, उग्रवादी प्रणति अपने दो साथियों के साथ इलाज कराने दिल्ली पहुंची थी। जो शख्स बाजार में इनसे मिला था, वो टाटा टी कंपनी के सीनियर वेलफेयर अफसर डॉ. ब्रोजेन गोगोई थे। उन्होंने टाटा टी कंपनी की तरफ से महिला के इलाज, फ्लाइट और ठहरने की पूरी व्यवस्था की थी।
तब सवाल उठा कि असम में दहशत फैलाने और सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले संगठन के उग्रवादियों के लिए आखिर टाटा जैसी देश की बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी वीआईपी इंतजाम क्यों कर रही थी?
दो दिन बाद यानी 9 अप्रैल को असम में वोटिंग है। आज भी असम की 126 में से 45 सीटों पर इन्हीं चाय बागानों का असर है।
आज कहानी उग्रवादी संगठन ULFA और टाटा टी कंपनी से उसके रिश्ते की…
ULFA का मकसद- असम की आजादी और बाहरी भगाओ
साल 1971… पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया और बांग्लादेश बना। लाखों शरणार्थी असम में घुसे। असमिया बोलने वालों को डर था कि उनकी आबादी माइनॉरिटी में बदल जाएगी। 1905 के बंगाल विभाजन और 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के चलते असम में पहले से ही भारी संख्या में शरणार्थी थे।
इसे रोकने के नाम पर अप्रैल 1979 में असम के शिवसागर जिले में कुछ छात्रों ने एक हथियारबंद संगठन शुरू किया। नाम रखा- यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, यानी ULFA.

साल 1983 में पहली बार हथियार मिलने के बाद तैयारी करते उल्फा के मेंबर।
शुरुआत में तो इन्होंने जैसे-तैसे हथियार जुटाए, लेकिन 1990 के दशक आते-आते पूरे असम में दहशत फैल गई। ULFA का नारा था- ‘आजाद असम’ और ‘बाहरी भगाओ’।
ULFA का तिनसुकिया से लेकर डिब्रूगढ़ तक दहशत फैल चुकी थी। ये पूरब के वो इलाके हैं, जहां से असम के चाय बागानों की शुरुआत होती है और पश्चिम तक जाती है।
ULFA वाले यूपी, बिहार से आए हिंदी भाषी मजदूरों को कतार में खड़ा करके मार देते थे। इस तरह करीब 300 लोग मारे जा चुके थे।
असम को बाकी देश से जोड़ने वाले नेशनल हाईवे 37 से गुजरने वाले ट्रकों से ULFA पैसा वसूलता था। जो नहीं देता, तो उसका ट्रक जला दिया जाता या ड्राइवर गायब हो जाता। कुल मिलाकर ULFA असम में समानांतर सरकार चला रहा था।
आगे चलकर ULFA को हथियारों और पैसे की जरूरत पड़ने लगी। ऐसे में ULFA ने पैसा उगाहने का फैसला किया। फरमान निकाला कि हर एक किलो चाय पर एक रुपए की फिरौती दी जाए और ऐसा नहीं करने वाला अंजाम के लिए तैयार रहे।
दरअसल, उस वक्त दुनिया की 17% चाय असम में उगती थी।
ULFA के आतंक को देखते हुए असम की छोटी चाय कंपनियां फिरौती देने के लिए तैयार हो गईं। लेकिन टाटा टी ने फिरौती देने से मना कर दिया। उसकी जगह अस्पताल, स्कूल वैगरह बनाने की पेशकश की। टसल के बावजूद जैसे-तैसे काम चलता रहा।

असम के घरों की दीवारों पर ULFA नारे लिखा करता था- ‘भारत की कॉलोनी बनाना बंद करो।’ (Source: India Today)
मैनेजर के अपहरण के बाद टाटा टी ने घुटने टेके
साल 1993… टाटा टी के रीजनल मैनेजर बोलिन बोरदोलोई का अपहरण हो गया। करीब एक साल तक उनकी रिहाई नहीं हो पाई। ये काम ULFA का नहीं, बल्कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड यानी NDFB का था। ये संगठन 1986 में असम की बोडो जनजाति को बचाने के लिए बना था, लेकिन धीरे-धीरे इसने भी आतंक फैलाना शुरू कर दिया था।
NDFB ने टाटा टी से बोलिन की रिहाई के लिए एक करोड़ की फिरौती मांगी। टाटा टी ने अपने मैनेजर को बचाने के लिए ऐसा किया भी। लेकिन इससे ULFA भड़क गया। उसने टाटा पर दबाव डाला और कहा कि NDFB को पैसा दे रहे हो, तो हमें क्यों नहीं दे रहे?
कंपनी ने फिर से वही ऑफर दिया और कहा कि डिब्रुगढ़ जिले के चाबुआ में चाय बागान के कर्मचारियों के लिए हम एक अस्पताल बनाएंगे। लेकिन ULFA राजी नहीं हुआ।
1995 में ULFA के को-फाउंडर परेश बरुआ ने टाटा टी के मैनेजिंग डायरेक्टर आरके कृष्ण कुमार को एक खत लिखा और मांग रखी- ‘हमें 100 वाकी टॉकी चाहिए।’
अगले साल असम में विधानसभा चुनाव होने थे। कंपनी को लग रहा था कि असम गण परिषद यानी AGP चुनाव जीत सकती है और ये पार्टी भी असम को शरणार्थियों से बचाने के लिए बनी है। पहले भी 1985-90 तक AGP की ही सरकार थी।
सीनियर जर्नलिस्ट राजीव भट्टाचार्य अपनी किताब ‘ULFA-द मिराज ऑफ डॉन’ में लिखते हैं, ‘AGP सरकार के दौर में ULFA जैसे उग्र गुटों की जड़ें गहरी हुई थीं। टाटा टी को लगता था कि AGP सरकार का रवैया ULFA पर नरम रह सकता है और उस पर लगा बैन भी हट सकता है। ऐसे में ULFA की मांगों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।’
इसके अलावा टाटा टी का ज्यादातर चाय कारोबार असम से ही होता था। यहां उसके 70 से ज्यादा चाय बगान थे। 150 साल पुराना चाय कारोबार का इकोसिस्टम यहां था। ऐसे में टाटा टी कहीं और नहीं जा सकती थी। इन्हीं वजहों के चलते टाटा टी राज्य सरकार के पास गुहार लगाने पहुंची।
कंपनी ने ULFA की चिट्ठियां असम सरकार को दीं। तब के मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने कंपनी को ULFA से दूर रहने को कहा, लेकिन इतने में चुनाव आ गया। कंपनी का डर भी सच हो गया। 1996 में सरकार बदल गई और प्रफुल्ल कुमार महंत की पार्टी AGP सत्ता पर काबिज हुई।

1996 का चुनाव जीतने के बाद जश्न मनाते AGP के प्रफुल्ल कुमार महंत और अन्य नेता।
टाटा ने बैंकॉक में ULFA से मीटिंग की
AGP की सरकार बनने के बाद ULFA के को-फाउंडर परेश बरुआ ने टाटा टी कंपनी को बैंकॉक में मीटिंग के लिए न्यौता भेजा। कंपनी मीटिंग के लिए राजी हो गई, लेकिन इसकी तैयारी में एक साल लग गए।
दरअसल, दिसंबर 1995 में ULFA ने टाटा टी कंपनी से 100 पेयर वॉकी-टॉकी की मांग की। कंपनी पहले ही उल्फा पर भारी-भरकम पैसे खर्च कर चुकी थी। ऐसे में अब कंपनी ने असम के गृह सचिव को एक चिट्ठी लिखी और पूरी बात बता दी, पर सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया।
तब कंपनी ने दिल्ली में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी की मदद ली। IB के एडिशनल डायरेक्टर रतन सहगल और टाटा टी कंपनी की मीटिंग हुई। रतन सहगल ने कंपनी से कहा कि वो बैंकॉक में ULFA से मीटिंग करे। साथ ही हिदायत भी दी कि वो ULFA को ना तो कैश दे ना ही कोई इक्विपमेंट। सबसे जरूरी बात- वो इसकी जानकारी राज्य सरकार को भी ना दे।
25-26 मई 1997 को बैंकॉक में मीटिंग हुई। मीटिंग में कंपनी की तरफ से चार अधिकारी शामिल हुए। इनमें सीनियर वेलफेयर अफसर डॉ. ब्रोजेन गोगोई भी थे। कंपनी ने ULFA की 6 मांगें मान लीं जैसे- अस्पताल बनवाना, युवाओं को ट्रेनिंग देना और ULFA के लोगों के असम से बाहर इलाज का इंतजाम करना।

बैंकॉक में ULFA और टाटा टी के अधिकारियों के बीच हुई मीटिंग का AI जनरेटेड फोटो।
एक मुखबिरी से टाटा और ULFA के खेल का खुलासा हुआ
अब लौटते हैं उस कहानी पर जिसका जिक्र हमने शुरुआत में किया है। बैंकॉक की मीटिंग के तुरंत बाद, मई 1997 की बात है। भूटान की राजधानी थिंपू में एक मीटिंग हुई। इसमें तय हुआ कि ULFA के फाइनेंस सेक्रेटरी चित्रबान हजारिका की पत्नी प्रणति का इलाज दिल्ली और मुंबई में कराया जाएगा। इसकी जिम्मेदारी ULFA के फणिंद्र मेधी को दी गई।
आर्मी अफसर जैसा दिखने वाला मेधी, प्रणति और उसकी सहयोगी मृदुला चांगमाई को लेकर दिल्ली पहुंचा। तीनों होटल में ठहरे, जहां टाटा कंपनी की तरफ से डॉ. ब्रोजेन गोगोई उनसे मिलने आए। गोगोई ने कहा कि मुंबई में इलाज के इंतजाम में कुछ समय लगेगा।
प्रणति, मेधी और मृदुला उत्तम नगर में एक मकान किराए पर लेकर रहने लगे। कुछ दिन बाद गोगोई फिर उनसे मिले। गोगोई ने बताया कि मुंबई जाने की व्यवस्था हो गई है।
फिर तीनों फ्लाइट से मुंबई रवाना हुए। गोगोई ने ही उन्हें रिसीव किया और जसलोक अस्पताल ले गए। पहली जांच के बाद दो महीने बाद फिर बुलाया गया। इसके बाद वे दिल्ली लौट गए।
तीनों अगले दो महीने दिल्ली में किराए के मकान में रहे। इस बीच मेधी एक दिन के लिए गुवाहाटी आया। वो उल्फा के मेंबर मुन्ना मिश्रा से मिला।
बातचीत में मेधी ने मुन्ना को बता दिया कि वह भूटान से दिल्ली और मुंबई का सफर क्यों कर रहा था। मेधी से यहीं गलती हो गई।
दरअसल, कुछ महीने पहले मुन्ना असम पुलिस का मुखबिर बन गया था और ये बात मेधी को नहीं पता थी। जब तक मेधी वापस दिल्ली पहुंचा, तब तक मुन्ना ने पुलिस को सब बता दिया।
पुलिस ने दिल्ली के होटल, उत्तम नगर के घर से लेकर मुंबई के जसलोक अस्पताल तक नजर रखना शुरू कर दिया। गोगोई भी उनकी नजर में आ गए।
अगस्त के महीने में प्रणति ने एक बेटे को जन्म दिया। 23 अगस्त को बच्चे के साथ तीनों मुंबई के सांता क्रूज एयरपोर्ट पर दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने पहुंचे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि पुलिस उनका इंतजार कर रही थी। पुलिस ने मौका पाते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए गुवाहाटी ले आई।

23 सितंबर 1997 को मुंबई से प्रणति डेका को गिरफ्तार किया गया था।
धीरे-धीरे पुलिस ने तमाम सबूत जुटा लिए। टाटा के खर्च का हिसाब, होटलों और अस्पताल को लिखे लेटर जमा कर लिए। टाटा टी के 3 अधिकारियों से भी पूछताछ की। वहीं डॉ. ब्रोजेन गोगोई फरार थे।
दरअसल, मुन्ना मिश्रा की मुखबरी से पहले ही असम पुलिस को बैंकॉक में हुई मीटिंग की भनक पड़ चुकी थी। वहीं असम के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत को मलाल था कि टाटा ग्रुप ने चुनाव में भरपूर चंदा नहीं दिया, उल्टे वो ULFA का खर्च उठाता रहा।
7 सितंबर 1997 को असम DGP के ऋषिकेशन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने दावा किया कि टाटा ग्रुप की कंपनी ‘टाटा टी’ ULFA को फंडिंग कर रही थी।
इस खबर के बाद असम से लेकर दिल्ली-मुंबई तक हड़कंप मच गया। टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा से लेकर केंद्र की इंद्र कुमार गुजराल सरकार तक चौंक गई।
टाटा टेप्स लीक हुए, फिर भी मामला दब गया
12 सितंबर 1997 को टाटा ग्रुप ने प्रेस नोट जारी कर सारे आरोपों को खारिज कर दिया। टाटा ने बताया उसने IB डायरेक्टर को ULFA से डील के बारे में सबकुछ बता दिया था। किताब ‘ULFA-द मिराज ऑफ डॉन’ के मुताबिक, असम के डीजीपी को केंद्र से गृह सचिव का फोन आया कि इस मामले को वे ज्यादा तूल न दें। टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा ने भी दिल्ली में मुख्यमंत्री महंत से मुलाकात की और बताया कि प्रणति का मामला स्थानीय स्तर की चूक के अलावा और कुछ नहीं है।
अक्टूबर 1997 में मीडिया में कुछ कॉलिंग टेप्स जस के तस छप गए। इनमें कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों की फोन पर की गई बातचीत थी। बॉम्बे डाइंग के चेयरमैन नुस्ली वाडिया का फोन उस वक्त टैप था।
इन कॉलिगं टेप्स में वाडिया टाटा टी को बचाने के लिए कई लोगों से बात करते पकड़े गए, जिनमें रतन टाटा, महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के चेयरमैन केशब महिंद्रा, सांसद और उद्योगपति जयंत मल्होत्रा और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जैसे नाम शामिल थे। मीडिया में ये कांड ‘टाटा टेप्स’ के नाम से मशहूर हुआ और इसी से पता चला कि टाटा ग्रुप को इस डील के बारे में पता था।
रतन टाटा ने खुद गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता और गृह सचिव पद्मनाभैया से बात की। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और एच डी देवेगौड़ा से असम सरकार के साथ सुलह कराने की मदद मांगी। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु तक गुवाहाटी पहुंच गए।
किताब ‘ULFA-द मिराज ऑफ डॉन’ के मुताबिक, सीएम महंत को मैसेज पहुंच गया कि वे टाटा टी से जीत चुके और उन्हें अब इस मसले को छोड़ देना चाहिए। महंत भी ज्यादा दिन ये लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे। इसके चलते डॉ. ब्रोजेन गोगोई के खिलाफ कोई चार्जशीट पेश नहीं की गई। तीन महीने की जेल के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। पूरा मामला दब गया।
ULFA के खात्मे के लिए सरकार ने शुरू किया सुल्फा
- 1990 के दशक के आखिर में ULFA के मेंबर सरेंडर करने लगे। असम के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने एक स्ट्रैटजी बनाई। सरेंडर कर चुके उग्रवादियों को सरकार ने हथियार दिए और ULFA का सफाया करने की छूट दी। यहीं से बना सुल्फा यानी सरेंडर ULFA (SULFA)।
- 1998 से 2001 के बीच असम में ‘सीक्रेट किलिंग्स’ हुई। नकाबपोश बंदूकधारी रात के अंधेरे में ULFA सदस्यों और उनके परिवारों की हत्या कर देते थे। इसने ULFA की कमर तोड़ दी।

सुल्फा के हिरासत में ULFA का मेंबर। (File Photo)
- फिर दिसंबर 2023 में केंद्र की बीजेपी सरकार ने ULFA के ‘प्रो-टॉक’ गुट से बातचीत की। ULFA के इस गुट, असम और केंद्र सरकार के बीच त्रिपक्षीय शांति समझौता हुआ।
- कभी पूरे असम में पकड़ रखने वाला वाला सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, यानी AFSPA अब राज्य के 85% से ज्यादा हिस्से से हटा लिया गया है।
- हालांकि, परेश बरुआ के नेतृत्व वाला ULFA-इंडिपेंडेंट अब भी म्यांमार के जंगलों में एक्टिव है। मार्च 2026 में इसी गुट ने तिनसुकिया जिले के जागुन में पुलिस कैंप पर ग्रेनेड हमला किया था।
‘असमिया बनाम बाहरी’ आज भी मुद्दा, 45 सीटों पर चाय बागानों का असर
- ULFA ने जिस मुद्दे को लेकर असम में दहशत फैलाई, वो मुद्दा आज भी असम में है। राजनीतिक पार्टियां ‘असमिया बनाम बाहरी’ को चुनावी मुद्दा बनाती हैं।
- 27 मार्च को एक चुनावी रैली में असम के सीएम और बीजेपी नेता हिमंता बिस्व सरमा ने कहा, ‘मैं अगले 5 साल में असम में रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की कमर तोड़ दूंगा।’
- ULFA ने जिन चाय बागानों से असम में जड़ें जमाई थीं, वो 10 जिलों में फैले हैं। यहां 45 विधानसभा सीटें हैं, यानी असम की 126 में से करीब एक-तिहाई सीटें।
- इन चाय बागानों में 8 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। कहा जाता है कि असम में जिस पार्टी ने चाय बागानों को साध लिया, उसकी सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया।

- चाय बागानों के मजदूरों की दिहाड़ी पिछले 10 साल में सिर्फ 154 रुपए बढ़कर 250 रुपए हो पाई थी। फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री ने इनकी दिहाड़ी 30 रुपए बढ़ा दी। यानी अब उन्हें 280 रुपए प्रति दिन मिलते हैं।
- 13 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी में चाय मजदूरों को जमीन के पट्टे भी बांटे।
- कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वे 450 रुपए रोजाना दिहाड़ी देंगे। जमीन के पट्टे भी बांटेंगे।
- कुल मिलाकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही चाय बगानों के मजदूरों को साधने में लगी है।
असम की राजनीति को करीब से देखने वालीं सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं, ‘ULFA की सोच आज भी असम राजनीति पर असर डालती है। ‘असमिया बनाम बाहरी’ के मुद्दे का चुनाव पर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि असमिया लोगों को लगता है कि बाहरियों के आने से उनकी पहचान और संस्कृति को खतरा है।’
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Reference…
ULFA: द मिराज ऑफ डॉन- राजीव भट्टाचार्य
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चारों तरफ धधकती चिताएं। इनके बीच कई तांत्रिक समाधि में बैठे साधना कर रहे हैं। सबके अपने तरीके हैं। कोई जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा, तो कोई ठंडी चिता पर धूनी रमाए हुए है।
थोड़ी दूर दो तांत्रिक एक ही चिता पर मंत्र जाप कर रहे हैं। उनके हाव-भाव से लग रहा मानो कोई अकेले में बात कर रहा हो। पूरी खबर पढ़िए…


