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जिस जापान पर कभी अमेरिका ने बरसाए थे एटम बम, अब उसी जापान को ईरान के परमाणु संकट में क्यों घसीट रहे डोनाल्ड ट्रंप?


समय बदलता है. चाहे 80 साल बाद ही क्यों न. अमेरिका ने हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए थे. उस बात को 8 दशक से ज्यादा हो गए. इसमें 2 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे. अब वही अमेरिकी प्रशासन जापान से ईरान की बढ़ती परमाणु महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने का आग्रह कर रहा है. हालांकि, इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति से जापान की प्रधानमंत्री ने मुलाकात की है.

ट्रंप ने जापान से क्या अपील की है

अमेरिका अपने सहयोगी देशों से मिडिल ईस्ट में चल रही जंग में हिस्सेदार बनने का आग्रह कर रहा है. इनमें जापान भी शामिल है. यूरोपीय देशों में इसको लेकर कन्फ्यूजन बना हुआ है, तो वहीं अब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने जापान को इस युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर डाल रहा है. अमेरिका की इस अपील के केंद्र में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, यह इलाका दुनिया में तेल और गैस आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है. 

यही उम्मीद है कि ट्रंप जापान से खदान-रोधी जहाज (जिन्हें माइंसविपर्स कहा जाता है) और नौसैनिक बल तैनाती की अपील कर सकते हैं. ताकि इस रास्ते को सुरक्षित करने और फिर से खोलने में मदद मिल सके. ईरान के साथ संघर्ष अब अपने तीसरे सप्ताह में एंट्री कर चुका है. सार्वजनिक रूप से इसको लेकर प्रेशर बनाया जरूर है. यह तर्क देते हुए कि मिडिल ईस्ट के तेल पर जापान अधिक निर्भर है. दशकों से अमेरिका की तरफ से दी जा रही सुरक्षा सहायता उसे कार्रवाई के लिए बाध्य करता है. 

जापान इस युद्ध से पीछे क्यों हट रहा है?

इसके पूरे केंद्र में जापान में 80 साल पहले हुए परमाणु हमला है. युद्ध के बाद जापान शांतिवाद और परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर बढ़ चुका है. जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने स्वीकार किया है कि ट्रंप के साथ बातचीत बहुत मुश्किल होगी. उन्हें अपने देश में कानूनी और राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. इसमें जापान का शांतिवादी संविधान भी शामिल है. यह बल प्रयोग को सिर्फ आत्मरक्षा तक ही सीमित रखता है. जनता का नजरिया भी ट्रंप के आग्रह से इतर है. एक हालिया जनमत सर्वे में पता चला है कि सिर्फ 9% जापान के नागरिक अमेरिका और इजरायल की ईरान पर सैन्य कार्रवाई का समर्थन करते हैं. 

जापान अमेरिका की मांगे किन शर्तों पर पूरा कर सकता है?

अगर वैश्विक स्तर पर देखा जाए, तो जापान अगर अमेरिका की मांगों को पूरा करता है, तो वह यह आश्वासन अमेरिका से चाहता है कि वॉशिंगटन हिंद प्रशांत इलाके के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा. जापान चीन को बढ़ते सुरक्षा खतरे के रूप में देखता है. खासकर पूर्वी चीनी सागर और ताइवान के आसपास के इलाके. जापान ने हाल में ही मध्य पूर्व की ओर चीनी सैनिकों की बढ़ती आवाजाही को लेकर चिंता व्यक्त की है. जापान ने इसे क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर पड़ना करार दिया है. इधर, 19 मार्च को होने वाली शिखर वार्ता पर दुनिया की निगाह है. आखिर जापान अमेरिका के आग्रह को किन आधारों पर स्वीकार करता है.

युद्ध के बीच ट्रंप से मिलीं जापान की प्रधानमंत्री

गुरुवार (19 मार्च) को जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने वॉशिंगटन में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की है. इस बैठक में ईरान और अमेरिका के बीच बने तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराते खतरे, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है. जापान की प्रधानमंत्री ने जोर दिया है कि ईरान की स्थिति पर जल्द से जल्द शांति कायम करना चाहिए. जापान की प्रधानमंत्री पहली सहयोगी देश की नेता हैं, जिन्होंने युद्ध के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति से मुलाकात की है. 

यह भी पढ़ें: पीएम मोदी ने कतर के अमीर से फोन पर की बात, ईरान का बड़ा दावा- अमेरिका का F-35 मार गिराया



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