सरबजीत कौर की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती है- सीमा पार का प्यार, सोशल मीडिया पर 8 साल की दोस्ती और फिर अचानक पाकिस्तान में शादी, लेकिन इसमें ट्विस्ट है- आरोप जबरन धर्मांतरण, रेप और कानूनी उलझनों का. कौर के भारतीय पति करनाल सिंह ने लाहौर हाईकोर्ट में नई याचिका दाखिल कर इस शादी को रद्द करने की मांग की है. यह मामला न सिर्फ दो परिवारों की जंग है, बल्कि पाकिस्तान के शरिया कानूनों पर भी सवाल उठा रहा है. आखिर एक शादीशुदा गैर-मुस्लिम महिला, मुस्लिम पुरुष से कैसे शादी कर सकती है? ऐसे मामले क्यों इतने दुर्लभ हैं?
तीर्थयात्रियों के जत्थे के साथ पाकिस्तान पहुंची थीं सरबजीत
52 साल की भारतीय सिख महिला सरबजीत कौर नवंबर 2025 में गुरु नानक देव प्रकाश पर्व मनाने के लिए करीब 2,000 सिख तीर्थयात्रियों के साथ पाकिस्तान गई थीं. 13 नवंबर को सभी यात्री भारत लौट आए, लेकिन कौर गायब हो गईं. कुछ दिनों बाद खबर आई कि उन्होंने पाकिस्तानी नागरिक नासिर हुसैन से शादी कर ली है, इस्लाम कबूल किया और अपना नाम नूर फातिमा रख लिया. जबकि कौर पहले से शादीशुदा थीं.
दोनों की मुलाकात सोशल मीडिया पर 8 साल पहले हुई थी. कौर के परिवार का दावा है कि यह सब जबरदस्ती हुआ, जबकि पाकिस्तानी पक्ष इसे प्यार की कहानी बता रहा है.
सरबजीत के पहले पति पहुंचे लाहौर हाईकोर्ट
कौर के भारतीय पति करनाल सिंह ने इस घटना से सदमे में आकर लाहौर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उनकी याचिका में दावा है कि कौर की शादी भारतीय कानून के तहत वैध है और इसे बिना खत्म किए पाकिस्तान में नई शादी नहीं हो सकती.
सिंह ने आरोप लगाया कि कौर का धर्मांतरण जबरन कराया गया और नासिर हुसैन को पता था कि वो पहले से शादीशुदा हैं. याचिका में रेप के आरोप लगाने की भी मांग की गई है. लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि सिंह ने पाकिस्तान के फेडरल शरियत कोर्ट के सिद्धांतों को आधार बनाया है.
पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम विवाहित महिला से शादी का कानून क्या?
पाकिस्तान में शरिया कानूनों के तहत, एक शादीशुदा गैर-मुस्लिम महिला जो इस्लाम कबूल कर मुस्लिम पुरुष से शादी करना चाहती है, उसे सख्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. फेडरल शरियत कोर्ट ने कई फैसलों में यह साफ किया है कि महिला को पहले अपने देश के कानूनों के मुताबिक न्यायिक तलाक लेना होगा.
फिर, उसे अपने गैर-मुस्लिम पति को दो गवाहों की मौजूदगी में इस्लाम अपनाने का न्योता देना होगा. अगर पति मना करता है, तो 90 दिनों की इद्दत (वेटिंग पीरियड) का पालन करना जरूरी है. इसके बाद ही पहली शादी खत्म मानी जाती है और नई शादी वैध होती है. सिंह की याचिका इसी पर टिकी है कि कौर ने इनमें से कोई कदम नहीं उठाया.
पाकिस्तान में इंटरफेथ मैरिजेस पर सख्त कानून
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे मामले पाकिस्तान में दुर्लभ हैं, लेकिन जब होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचाते हैं. पाकिस्तान के कानून में इंटरफेथ मैरिजेस को लेकर जटिलताएं हैं. मुस्लिम फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961 और शरियत एक्ट 1980 के तहत, मुस्लिम पुरुष गैर-मुस्लिम महिला से शादी कर सकता है, लेकिन अगर महिला पहले से शादीशुदा है और कन्वर्ट हो रही है, तो ऊपर बताई प्रक्रिया अनिवार्य है.
अगर ये नहीं होती, तो शादी अवैध मानी जाती है और इसमें शामिल लोगों पर बिगेमी (दोहरी शादी) या रेप के आरोप लग सकते हैं. बीते सालों में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने माइनॉरिटी गर्ल्स की फोर्स्ड मैरिजेस पर सख्ती दिखाई है.
उदाहरण के तौर पर, 2023 में कोर्ट ने सरकार से ऐसे मामलों पर रिपोर्ट मांगी और नए कानून बनाने के निर्देश दिए. लेकिन अमल में कमी है. कई बार कोर्ट्स मेडिकल एज टेस्ट या कन्वर्जन सर्टिफिकेट पर भरोसा करते हैं, जबकि परिवार जन्म प्रमाण पत्र जैसे डॉक्यूमेंट्स दिखाते हैं.
इस मामले पर भारत का रिएक्शन क्या है?
इस केस ने इंडिया-पाक रिलेशन्स पर भी असर डाला है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने कौर की सुरक्षा पर चिंता जताई है, जबकि पाकिस्तान का कहना है कि यह व्यक्तिगत मामला है. सिंह की याचिका कोर्ट में सुनवाई के लिए लगी है और उनके वकील अली चंगेजी संधु ने कहा है कि यह शरिया के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है.
अगर कोर्ट याचिका मंजूर करता है, तो यह पाकिस्तान में इंटरफेथ मैरिजेस के लिए एक मिसाल बन सकता है. लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि ऐसे मामलों में सामाजिक दबाव और धमकियां आम हैं, जिससे न्याय मिलना मुश्किल हो जाता है.


