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साल 1803 यानी आज से करीब 223 साल पहले। केरलम के चेरथला नगर में ऐझावा जाति की एक मजदूर महिला की झोपड़ी के सामने राजमहल से एक टैक्स जमा करने वाला पहुंचा। महिला ने उसे वहीं रुकने के लिए कहा और झोपड़ी में चली गई। कुछ मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तो उसके सीने से दोनों स्तन कटे हुए थे। उसने खून से लथपथ स्तनों को एक पत्ते पर रखकर टैक्स कलेक्टर की तरफ बढ़ा दिए। ये किस्सा केरलम के मुलक्करम यानी स्तन ढंकने के लिए दिए जाने वाले टैक्स से जुड़ा है। केरलम में चुनाव होने को है। आज कहानी मुलक्करम की, जिसके जख्म और असर आज की राजनीति में भी दिखते हैं… मुलक्करमः ब्राह्मणों के सामने महिलाओं को उतारने पड़ते थे ऊपरी वस्त्र जब टैक्स देने की बजाए, नंगेली ने स्तन काटकर हाथ पर रख दिए शरीर ढंकने के लिए महिलाओं ने धर्म बदले, तो उनके कपड़े फाड़ दिए गए केरलम में ब्रेस्ट टैक्स का इतिहास बताने वाले लेखकों से लेकर केरलम की लोक कथाओं में नंगेली की यह कहानी बहुत प्रचलित है। लेकिन इसकी सच्चाई पर कई इतिहासकार सवाल भी उठाते हैं… दूसरा पहलूः नंगेली का विरोध स्तन ढंकने के लिए नहीं था साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक मनु पिल्लई लिखते हैं कि केरलम में 1860 तक कोई भी महिला स्तन नहीं ढंकती थी, चाहे वो राजपरिवार से ही क्यों न हो। ऊंची जाति की महिलाएं बस अपने कंधे पर एक कपड़ा डालती थीं। अंग्रेजों के आने से पहले पुरुषों और महिलाओं के लिए धड़ ढंकना शालीनता का प्रतीक नहीं था। 17वीं सदी में यूरोपीय यात्री विलियम वैन नीउहोफ, त्रावणकोर की रानी अश्वथी थिरुनल उमयम्मा से मिलते हैं। अपने यात्रा वृत्तांत में विलियम बताते हैं, ‘रानी ने कमर तक एक कपड़ा बांधा हुआ था। एक कपड़ा कंधे पर डाला हुआ था। कमर के ऊपर के ज्यादातर हिस्से में कोई वस्त्र नहीं पहना था।’ केरलम के इतिहासकार नंदकुमार बताते हैं, ‘जिस मुलक्करम को ब्रेस्ट टैक्स कह रहे हैं, वो दरअसल मुलाक्करम था। मुला यानी बांस। बांस पर लगने वाले टैक्स को ब्रेस्ट टैक्स बताया जाने लगा। जहां तक बात है स्तन खुले रखने की है, केरलम में 18वीं-19वीं सदी के पहले कोई महिला स्तन नहीं ढंकती थी। ऊंची जाति की भी नहीं। केरल् में साड़ी पहनना तक 19वीं सदी में शुरु हुआ है।’ नंदकुमार के मुताबिक, ‘1924 में महात्मा गांधी केरल् में पहली बार आए थे। उसके बाद 2 बार और आए। उन्होंने छुआछूत और छोटी जाति के अधिकारों पर बात की। लेकिन कभी ब्रेस्ट टैक्स का जिक्र नहीं किया। अगर ऐसा टैक्स होता, तो महात्मा गांधी की किसी किताब में तो इसका जिक्र मिलता। केरल् में छोटी जाति के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले किसी रिफॉर्मर ने ब्रेस्ट टैक्स का कभी जिक्र नहीं किया।’ तिरुवनंतपुरम के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में इतिहासकार जे. देविका के मुताबिक, ‘हमारे पास ब्रेस्ट टैक्स जैसे किसी टैक्स के ज्यादा रिकॉर्ड नहीं हैं, लेकिन जो हैं वो बताते हैं कि यह एक सामान्य टैक्स था। कथित नीची जाति के पुरुषों पर भी सिर टैक्स, मूंछों पर टैक्स लगते थे। नंगेली का विरोध स्तन ढंकने के लिए नहीं था, बल्कि टैक्स सिस्टम के जरिए हो रहे भेदभाव के खिलाफ था।’ मुलक्करम जैसी प्रथा का आज की राजनीति पर असर मुलक्करम और नंगेली की कहानी पर भले ही अलग-अलग हो, लेकिन त्रावणकोर जैसे समाजों में जातिगत भेदभाव के कई सबूत हैं। आज की राजनीति में इसके प्रतीकात्मक और नैरेटिव प्रभाव मजबूत हैं। वामपंथी पार्टियां इस तरह की ऐतिहासिक कहानियों से नैरेटिव बनाते हैं कि वे ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ खड़े हैं। ब्रेस्ट टैक्स और नंगेली की कहानी की सत्यता को लेकर भले ही विवाद हो, लेकिन एझावा जाति के साथ हुए भेदभाव की याद दिलाकर लेफ्ट इन्हें फिर से साधने की कोशिश करता रहता है। हालांकि सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के डायरेक्टर डॉ. धनुराज बताते हैं कि अब ब्रेस्ट टैक्स की बात बहुत पुरानी हो गई है। केरलम में इसके नाम पर वोट नहीं पड़ते हैं। ——— ये खबर भी पढ़िए… ऐसा मंदिर जहां देवी का योनि रूप पूजते हैं:‘रजस्वला’ में लाल हुए कपड़े के लिए मचती है होड़; चुनाव जीतने के लिए तंत्र-मंत्र करवा रहे नेता चारों तरफ धधकती चिताएं। इनके बीच कई तांत्रिक समाधि में बैठे साधना कर रहे हैं। सबके अपने तरीके हैं। कोई जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा, तो कोई ठंडी चिता पर धूनी रमाए हुए है। थोड़ी दूर दो तांत्रिक एक ही चिता पर मंत्र जाप कर रहे हैं। उनमें से एक उठता है और चिता की गरम राख के सामने उंगलियों से सीटी मारकर किसी को बुलाने का इशारा करता है। पूरी खबर पढ़िए…
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