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‘पापा ने मेरी शादी के लिए दो एकड़ जमीन बेच दी थी। उस समय मैं 20 साल की थी। जून का महीना था जब मेरी शादी हुई और मैं ससुराल आई। सुहागरात के अगले दिन सुबह-सुबह मेरे जेठ और ननदोई मेरे कमरे में आए। उन्होंने पूछा- तुम्हारी पहली रात कैसी रही? कोई परेशानी तो नहीं हुई? सुनते ही मेरी नजर शर्म से झुक गई। मन ही मन सोचने लगी कि कोई इस तरह की निजी बातें कैसे पूछ सकता है! बाद में मुझे पता चला कि मेरे पति को शारीरिक संबंध बनाने से जुड़ी पहले कुछ समस्याएं थीं। मेरे दो बच्चे हैं। मेरे बेटे की उम्र 16 साल है और बेटी की 10 साल। दोनों बच्चे दो अलग-अलग मर्दों से हैं और अब बिना पिता के बड़े हो रहे हैं। इनके लिए अब मैं ही मां-बाप हूं।’, सुनीता आर्या स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में सुनीता आर्या की कहानी, जिन्हें घूंघट न करने पर जेठ ने निर्वस्त्र करके पीटा। गर्भवती होने के 3 महीने बाद पति ने छोड़ दिया। उसके बाद प्रेमी ने गर्भवती किया और बच्चा स्वीकार नहीं किया। सुनीता आर्या अभी मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गैरतगंज में रहती हैं। सरकारी जमीन पर बने एक छोटे से घर में उनका गुजारा हो रहा है। मां और दोनों बच्चे भी साथ रहते हैं। जब मैं उनसे बातचीत करने पहुंचा, तो उन्होंने आसपास नजर घुमाई और धीमे से कहा, ‘बच्चों को कमरे में भेज देती हूं। हम बगल के नए घर के बरामदे में बैठकर बात करते हैं। उनके सामने ये सारी बातें करना ठीक नहीं होगा।’ उन्होंने हल्के से इशारा किया, तो बच्चे चुपचाप कमरे के भीतर चले गए। मैं उस बरामदे में उनके साथ आकर बैठा। सुनीता ने गहरी सांस ली, जैसे बीते वर्षों की परतें फिर से खोलने की तैयारी कर रही हों। वह बताती हैं, ‘2007 की बात है। अपने पापा के साथ मध्य प्रदेश के इंदौर में रह रही थी। मां-बाप की इकलौती संतान। एक रिश्तेदार घर आते, तो अक्सर कहते- बेटी जवान हो गई है। अब शादी कर दो। बाद में ढंग का लड़का नहीं मिलेगा। अपनी बिरादरी में तो 13-14 साल की उम्र में ही शादी हो जाती है।’ जवाब में पापा ने कहा, ‘अगर कोई अच्छा लड़का मिले तो बताइए।’ उन्होंने मेरे मामा से भी इस बारे में बात की। कुछ दिनों बाद मामा रायसेन से एक रिश्ता लेकर आए। उन्होंने लड़के और उसके परिवार के बारे में काफी तारीफ की- कहा कि लोग ठीक हैं, खानदान अच्छा है। फिर हमारे परिवार का आपस में मिलने-जुलने का सिलसिला चला। देखते ही देखते बात आगे बढ़ी और रिश्ता पक्का हो गया। शादी हुई और मैं ससुराल आ गई। शुरू-शुरू में सब सामान्य लग रहा था। नए माहौल को समझने और उसमें खुद को ढालने की कोशिश कर रही थी। इसी बीच जब पहली बार गर्भवती हुई, तो मन में एक अजीब-सी खुशी थी। लगा कि शायद अब जिंदगी में कुछ ठहराव आएगा। लेकिन जब मैंने यह बात अपने पति को बताई, तो उनका चेहरा उतर गया। उन्होंने मुझे समझाना शुरू किया- अभी मैं बच्चा पैदा करने के लिए तैयार नहीं हूं, हमारी हालत भी ठीक नहीं है। अगली बार कर लेंगे। इस बार बच्चा गिरवा देते हैं। वह बार-बार यही कहते रहे। मैं दुविधा में थी। एक तरफ मेरे मन में मां बनने की चाह थी, दूसरी तरफ पति की बात और उनका दबाव। आखिरकार, उनके जोर देने पर मैंने गर्भपात करवा लिया। इसी बीच घर के भीतर एक और अजीब स्थिति बन रही थी। जो जेठ मुझे हर वक्त घर में पर्दा करने की नसीहत देते थे, उन्हीं की नजरें मुझ पर ठीक नहीं थीं। वह अक्सर डॉक्यूमेंट बनवाने के बहाने मुझे शहर लेकर जाते। गांव की बस की सीढ़ियां ऊंची होती थीं, तो वह मेरी कमर में हाथ डालकर चढ़ाने का बहाना करते और फिर सीट पर सटकर बैठ जाते। शुरू में मुझे लगता था कि वह मेरा ख्याल रख रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी हरकतें साफ होने लगीं। एक-दो बार उन्होंने मुझे गलत तरीके से छूने की कोशिश की, यहां तक कि मेरी छाती पर भी हाथ लगा दिया। इन घटनाओं से मैं अंदर ही अंदर परेशान होने लगी थी, लेकिन जो आगे हुआ, उसने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया। हमारा शहर में भी एक घर था। एक दिन मैं वहां आराम कर रही थी। दरवाजा भीतर से बंद कर रखा था। गर्मी का मौसम था, इसलिए हल्के कपड़ों में लेटी हुई थी। मेरे जेठ टीचर थे। उस दिन वह घर आए। मुझे सोता हुआ समझकर दरवाजे के ऊपर बनी खिड़की से झांकने लगे। अचानक मेरी नींद खुली, तो देखा- वह दरवाजे पर चढ़े हुए थे। जैसे ही उनकी नजर मुझसे मिली, वह तुरंत नीचे उतर गए, मानो कुछ हुआ ही न हो। उस दिन बहुत डर गई थी, लेकिन सोचती रही कि शायद यह एक बार की बात हो। पर ऐसा नहीं था। इसी तरह एक बार मैं वॉशरूम में नहाने गई थी। मेरे कपड़े कमरे में बेड पर रखे थे। जब वॉशरूम से टॉवल लपेटे बाहर आई, तो देखा- जेठ सामने कमरे में बैठे हैं। मैं घबरा गई। चीखते हुए बोली- आप मेरे कमरे में अचानक कैसे आ गए? वह इधर-उधर देखने लगे और बहाना बनाने लगे कि किसी काम से आए थे। उस समय तो मैंने किसी तरह खुद को संभाला, लेकिन अंदर से टूटती जा रही थी। बाद में हिम्मत करके यह बात अपनी सास और पति को बताई। मुझे उम्मीद थी कि वे मेरा साथ देंगे, लेकिन उल्टा मुझे ही समझाने लगे। कहा- वह ऐसा नहीं कर सकते, तुम गलत समझ रही हो। घर में थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच हो जाए तो औरत को बर्दाश्त करना चाहिए। यह सुनकर मुझे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं है। मैं उनकी इस तरह की हरकतों से लगातार परेशान थी। हर दिन मुझे यही चिंता सताती रहती थी कि पता नहीं कब, किस बहाने वह फिर से मेरे सामने आ खड़े होंगे। आखिरकार हिम्मत जुटाई और अपनी जेठानी को सारी बातें बताईं। उन्हें बताया कि किस तरह वह मुझे शहर ले जाने के बहाने छूने की कोशिश करते हैं और कमरे में बिना बताए आ जाते हैं। जेठानी ने बात को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने जेठ से साफ-साफ पूछा- तुम देवरानी को बार-बार शहर क्यों लेकर जाते हो? उसका पति क्यों नहीं जाता? तुम्हें उससे थोड़ी दूरी बनाकर रहना चाहिए। उस समय मुझे लगा कि शायद अब कुछ बदलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जेठ ने अपनी आदतें नहीं बदलीं। ऊपर से सामान्य व्यवहार करते, लेकिन उनकी नजरें अब भी वैसी ही थीं- टकटकी लगाए, मौका तलाशती हुईं। एक दिन मैं रसोई में खाना बना रही थी। काम करते-करते अनजाने में सिर पर रखा पल्लू थोड़ा नीचे सरक गया। मुझे इसका ध्यान भी नहीं रहा। तभी अचानक जेठ की तेज आवाज सुनाई दी। मेरा खुला सिर देखते ही वह चीखने लगे। गाली देते हुए बोले- ऐसी ही औरत परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलाती है। बेशर्म की तरह खुला सिर लेकर पूरे आंगन में घूमती रहती है। उनकी आवाज इतनी ऊंची थी कि घर के बाकी लोग भी पहुंच गए। मैं घबराकर तुरंत पल्लू ठीक करने लगी, लेकिन तब तक वह बात बढ़ा चुके थे। उनकी आवाज इतनी ऊंची थी कि माहौल तनाव से भर गया। समझ ही नहीं पा रही थी कि इतनी सी बात पर इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं। बार-बार पल्लू ठीक करते हुए कह रही थी कि गलती से सरक गया, मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। लेकिन जैसे वह सुनने की हालत में ही नहीं थे। यह कहते हुए वह गुस्से में मेरी तरफ बढ़े और अचानक मेरे बाल पकड़कर जोर से खींचने लगे। मैं दर्द से चीख उठी। चीख सुनकर मेरे पति भी आ गए। उन्होंने मुझे बचाने के बजाय अपने भाई का ही साथ दिया। उन्होंने भी मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। दोनों मिलकर मुझे घसीटते हुए कमरे से आंगन की ओर ले जाने लगे। इस खींचतान में मेरी साड़ी ढीली होकर खुलने लगी। खुद को संभालने की कोशिश करती रही, लेकिन उस वक्त कोई मेरी बात सुनने वाला नहीं था। उस वक्त ऐसा लगा कि दुर्योधन द्रौपदी का चीरहरण कर रहा हो। शोर सुनकर आस-पास के घरों के लोग आंगन में जुट गए। लेकिन किसी ने एक शब्द बोलना जरूरी नहीं समझा। साड़ी उतरने से मैं सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में रह गई थी। जेठ और मेरे पति ने मेरे बाल पकड़ लिए और बेल्ट व डंडे से मारना शुरू कर दिया। आंगन में एक बड़ा पत्थर रखा था। उसी पर पटक दिया। तेज चोट लगी और मैं दर्द से कराह उठी। उस वक्त 3 महीने की गर्भवती थी। हाथ-पैर पटकते हुए रहम की भीख मांग रही थी, लेकिन दोनों का कलेजा नहीं पसीजा। उस वक्त लगा कि काश! इस तरह भीड़ के सामने निर्वस्त्र बेइज्जती होने से अच्छा मार दी जाती। मेरा गला घोंट देते। धीरे-धीरे यह बात रिश्तेदारी में भी फैल गई। शायद किसी पड़ोसी ने मेरे मामा के बेटे को सब कुछ बता दिया। जब उसे सच्चाई पता चली, तो वह बिना देर किए आया। उसने मेरी हालत देखी और उसी समय फैसला किया कि अब मुझे वहां नहीं छोड़ सकता। वह मुझे अपने साथ मायके ले आया। उस समय मैं गर्भवती थी और बेहद कमजोर भी। मायके पहुंचकर थोड़ा सुकून मिला। वहां 6 महीने बाद मैंने एक बेटे को जन्म दिया। हॉस्पिटल का पूरा खर्च मेरे मां-बाप ने उठाया। मेरे रिश्तेदार वगैरह देखने आए, लेकिन मेरा पति न तो अस्पताल आया, न कभी बच्चे को देखने। कोई खर्च भी नहीं भेजा। उस दिन मुझे साफ समझ आ गया कि अब यह जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है। उसके बाद मैंने बच्चे को अकेले पाला। फिर ये बेटी कैसे हुई? ‘हां, आगे वही बताने वाली हूं। 2011 की बात है। तब तक मैं अपने बेटे के साथ मायके में ही रह रही थी। पापा को एक जमीन बेचनी थी। गैरतगंज में मनीष जैन नाम का एक व्यक्ति था, जो जमीन की खरीद-फरोख्त करता था। जब उसे पता चला कि पापा जमीन बेचना चाहते हैं, तो वह मेरे घर आया। इसी दौरान मेरी उससे पहली मुलाकात हुई। जमीन के सिलसिले में उसका घर आना-जाना बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उससे बातचीत होने लगी और वह मुझे अच्छा लगने लगा। मेरा बेटा भी उसे अपनापन देने लगा। उसे ‘पापा’ कहकर बुलाता। ‘पापा’ शब्द सुनकर उसके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखाई देती थी। हालांकि, वह शादीशुदा था, फिर भी उसका हमारे घर आना-जाना लगातार बना रहा।’ वह इस तरह मेरे मायके आने लगा। कई बार रात-रातभर रुकता था। धीरे-धीरे वह मेरे साथ सोने लगा। एक दिन मैंने उससे साफ पूछा- क्या तुम अपनी पत्नी से झूठ बोलकर मेरे पास आते हो? उसने कहा- नहीं, पत्नी को तुम्हारे बारे में सब पता है। उसे कोई परेशानी नहीं है। उसकी बात पर मुझे भरोसा नहीं हुआ। मैंने उसकी पत्नी को फोन किया और कहा- आपके पति मेरे साथ रहते हैं, क्या आपको एतराज नहीं? उन्होंने जवाब दिया- मुझे मालूम है कि वे आपके पास जाते हैं। आप उनकी दोस्त हैं। यह सब सुनने के बाद मेरे मन का संकोच कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे वह भी मुझे अच्छा लगने लगा। इतने संघर्षों के बाद मुझे एक सहारे की जरूरत महसूस होती थी। जब भी वह मुझसे मिलने आता, हम एक-दूसरे के करीब आ जाते और हमारे बीच शारीरिक संबंध बनने लगे। हमारे बीच नजदीकियां बढ़ती गईं और मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा। इसी दौरान, 2013 में, मैं उससे गर्भवती हो गई। जब उसे इस बात का पता चला, तो वह घबराया हुआ मेरे पास आया। उसके चेहरे पर बेचैनी थी। उसने कहा- अभी मैं इसके लिए तैयार नहीं हूं। तुम इस बच्चे को गिरा दो। बाद में बच्चा कर लेंगे। अभी अबॉर्शन करवा लो। उसकी बात सुनकर मैं एक बार फिर दुविधा में पड़ गई। मुझे लगा वाकई में कोई परेशान होगी, लेकिन उसके शब्दों ने मुझे अंदर तक हिला दिया। आप उस शादीशुदा आदमी से शादी करना चाहती थीं? ‘नहीं, मैं उससे शादी नहीं करना चाहती थी। लेकिन चाहती थी कि वह इस बच्चे को दुनिया में आने दे। फिर भी, उसकी बातों में आकर आखिरकार गर्भपात करवा लिया। 2 साल बाद फिर से उससे गर्भवती हुई। इस बार जब उसे पता चला, तो उसका रवैया पूरी तरह बदल गया। कहने लगा- यह बच्चा मेरा नहीं है, किसी और का होगा। तुम मेरे पीछे किस-किस से मिलती हो, मुझे क्या पता? मैं तो महीने में एक-दो बार ही तुमसे मिलने आता हूं। तुम्हारे पेट में पल रहा बच्चा मेरा नहीं है। उसकी यह बात सुनकर मुझे गहरा धक्का लगा। जिस रिश्ते को मैं भरोसे के साथ निभा रही थी, उसी पर उसने सवाल खड़े कर दिए। मैं हैरान थी और भीतर से बहुत गुस्से में भी थी। उसकी बातें सुनते ही गहरे तनाव में चली गई। बार-बार यही सोच रही थी कि 4 साल से वह मेरे साथ संबंध बना रहा था। दो बार उससे गर्भवती हुई। पहली बार उसके कहने पर मैंने गर्भपात करवा लिया, और अब वह कह रहा है कि यह बच्चा किसी और का है। उस पल मुझे लगा जैसे मेरे विश्वास की कोई कीमत ही नहीं थी। सोच रही थी कि उसे सिर्फ मेरे शरीर से मतलब था, मेरी भावनाओं से नहीं। यह कहते-कहते सुनीता अपने दोनों हाथों से चेहरा ढक लेती हैं। 15 साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन उन दिनों को याद करते हुए आज भी उनकी आवाज कांपने लगती है। वह कहती हैं, ‘जब भी उन बातों को याद करती हूं तो अंदर तक सिहर जाती हूं।’ वह आगे बताती हैं कि उसके आरोपों और इनकार के बाद मैंने ठान लिया कि अब पीछे नहीं हटूंगी। अपने पेट में पल रहे बच्चे को दुनिया में लाऊंगी। उससे मैंने साफ कहा- इस बच्चे को जन्म दूंगी और अदालत में साबित करूंगी कि यह तुम्हारा है। तब तक पहले पति से मेरा तलाक हो चुका था, इसलिए मुझे किसी और बंधन का डर नहीं था। आखिरकार मैंने एक बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्म के बाद उसका डीएनए टेस्ट करवाया। रिपोर्ट लेकर अदालत पहुंची। जांच हुई और साबित हो गया कि बच्ची उसी की है। 2015 में अदालत का फैसला मेरे पक्ष में आया। साबित हुआ कि बच्ची मनीष जैन की है। लेकिन मनीष ने अदालत का फैसला मानने से इनकार कर दिया। उसने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 2018 में फिर से अदालत का फैसला मेरे पक्ष में आया। फैसला तो पक्ष मेरे पक्ष में आ गया। इतनी कानूनी लड़ाइयों और संघर्षों के बाद भी मेरी जिंदगी आसान नहीं हुई। आज भी दोनों बच्चों के साथ अकेली रहती हूं। बातचीत के दौरान बार-बार मेरी नजर उनके छोटे कटे बालों पर जा रही थी। मैं कुछ पूछता, उससे पहले ही वह खुद कहने लगीं- ‘2023 में पापा की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। उनकी इकलौती संतान हूं। मैंने ही उन्हें मुखाग्नि दी। उसके बाद सिर मुंडवा लिया था। गांव वालों ने यहां तक कहा था कि मैं पागल हो गई हूं, लड़की को सिर नहीं मुंडवाना चाहिए। लेकिन नहीं मानी थी।’ यह सच्ची कहानी सुनीता आर्या की अंधेरी जिंदगी की है, लेकिन कहानी हार की नहीं है। जिन हालातों में ज्यादातर लोग टूट जाते हैं, उन हालातों में सुनीता आर्या अकेले खड़ी रहीं। ————————————- 1- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया:3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-‘एक्स्ट्रा सर्विस’ न देने पर मारी गई थी अंकिता भंडारी:मां-बाप ने खुद को घर में बंद किया; न कमा रहे, न राशन खरीद पा रहे दिल्ली से आए मीडिया के लोग दिनभर अंकिता भंडारी के माता-पिता से बात करने के लिए उनके घर के बाहर बैठे रहे, लेकिन वे घर पर ताला लगाकर चले गए थे। तब तक नहीं लौटे, जब तक मीडिया के लोग वापस नहीं चले गए। अगले दिन मैं बिना बताए उनके घर पहुंची। वह हड़बड़ा गईं, लेकिन बात करने से पहले एक शर्त रख दी- ‘मनीषा जी, आप पत्रकार बनकर नहीं, मेरी बेटी बनकर सुनेंगी, तभी बात करूंगी,’ मैंने हामी भर दी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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