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मस्क का मास्टरप्लान, काम से आजादी:मस्क ऐसी दुनिया बनाने पर जुटे, जहां अरबों रोबोट इंसानों की हर समस्या हल करेंगे


दुनिया के सबसे अमीर शख्स इलॉन मस्क अब एक ऐसे भविष्य की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं, जहां काम शब्द डिक्शनरी से बाहर हो सकता है। मस्क का नया मंत्र है सस्टेनेबल अबंडेंस। यह एक ऐसी दुनिया का खाका है जहां रोबोटिक सेना इंसानों की हर जरूरत पूरी करेगी, पैसा बेमानी हो जाएगा और श्रम का वजूद खत्म हो जाएगा। नवंबर में टेस्ला की शेयरधारक बैठक में मस्क ने एक साइनबोर्ड के सामने खड़े होकर ऐलान किया कि एआई और रोबोटिक्स के जरिये हम इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला अब ‘ऑप्टिमस’ जैसे इंसानी रोबोट बना रही है; ‘स्पेसएक्स’ कक्षीय डेटा केंद्रों को बढ़ावा दे रही है। एआई स्टार्टअप एक्सएआई को लेकर उनका दावा है कि वह मानवता की लगभग सभी समस्याओं को हल कर देगी। ‘मस्क का दावा है कि 12 से 18 महीनों के भीतर यह युग शुरू हो जाएगा और अरबों रोबोट होंगे जो इंसानों की हर जरूरत को पूरा करेंगे। 54 वर्षीय मस्क का यह नया नारा उनके एक दशक पुराने रुख से उलट है, जब उन्होंने चेतावनी दी थी कि बेकाबू एआई मानव जाति को नष्ट कर सकती है। अब यह अवधारणा उनके व्यापार विस्तार के लिए एक मिशन बन गई है। टेस्ला की चेयरपर्सन रॉबिन डेनहोम ने बताया कि मस्क का सस्टेनेबल अबंडेंस का लक्ष्य उस भारी-भरकम पे-पैकेज के पीछे का मुख्य तर्क था, जो उन्हें दुनिया का पहला ट्रिलियनेयर बना सकता है। टेस्ला एक ऐसी दुनिया बनाना चाहती है जहां वस्तुओं और सेवाओं का प्रचुर मात्रा में उत्पादन हो सके। यह अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादकता बढ़ाने के बारे में है।’ मस्क के इसे सपने के आलोचक कहते हैं कि ये रोबोट और स्पेस डेटा सेंटर हकीकत से कोसों दूर हैं, लेकिन मस्क ने दुनिया को एक ऐसी बहस में जरूर झोंक दिया है जहां काम, पैसा और वजूद के मायने बदलने वाले हैं। 1800 के दशक में कार्ल मार्क्स ने सामूहिक संपत्ति का सपना देखा था और 1930 में अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में इंसान हर हफ्ते सिर्फ 15 घंटे ही काम करेंगे। मस्क के मित्र और एक्सप्राइज फाउंडेशन के फाउंडर पीटर डियामांडिस कहते हैं कि मस्क का लक्ष्य मानवता के लिए ‘बेसलाइन’ तैयार करना है। अगर मंगल पर कोई मल्टी-ट्रिलियनेयर रह रहा है और पृथ्वी पर 8 अरब लोगों का जीवन स्तर शानदार है, तो कोई समस्या नहीं है। यदि काम नहीं होगा, तो सामाजिक ढांचा ढह जाएगा मस्क के इस जादुई विजन को हर कोई सच नहीं मान रहा है। आलोचकों का तर्क है कि यदि काम करने की आवश्यकता खत्म हो जाती है, तो समाज का ढांचा ढह जाएगा। शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर एलेक्स इमास ने सवाल उठाया कि मस्क ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह तकनीक से पैदा हुई इस संपत्ति का बंटवारा कैसे करेंगे। मालिक कौन होगा? अगर नीतियां नहीं बदलीं, तो हम स्वर्ग में नहीं, बल्कि एक भयावह नर्क में होंगे, जहां मांग पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।’

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