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8 साल से हिंदी फिल्में नहीं देखी। कैसे देखूं? जिस फिल्म में 7-8 साल का कोई बच्चा दिखता है, मेरा अपना बेटा ‘माही’ उसमें दिखने लगता है। रास्ते में चलते-फिरते भी यदि कोई गोरा-चिट्ठा बच्चा दिख जाए, तो जी करता है- दौड़ गले लगा लूं। मेरी ऐसी कोई रात नहीं बीतती, जब आंसुओं से तकिया गीली न होता हो। पिछले चार साल कहीं भी जाती हूं तो अक्सर मुझसे पूछा जाता है- रश्मि, आपके कितने बच्चे हैं? दो बच्चे… कहना चाहती हूं, लेकिन यह बात जुबान पर आते-आते ठहर जाती है। फिर बोलती हूं- एक बेटी है। सोचती हूं- दो बच्चे बताऊंगी तो लोग सवाल पूछेंगे कि- दूसरा बच्चा कहां है? पति क्या करते हैं और कहां रहते हैं? लेकिन सच यह है कि मेरी कोख ने दो बच्चे को जन्म दिया। दूसरे बच्चे की मां होने का सुख पति ने छीन लिया। मैं रश्मि सहगल, दिल्ली की रहने वाली हूं। पैदा तो एक बड़े खानदान में हुई, लेकिन 15 साल की उम्र के बाद अनाथालय में पली। चौथी क्लास में थी, तभी पापा की मौत हो गई थी। कैसे हुई थी, पता नहीं। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा- आपकी मां ने पैसे के लिए आपके पापा को मार दिया। जबकि मां बताती हैं कि पापा को कैंसर था। खैर… पापा की मौत के बाद मां ने एक अमीर आदमी से दूसरी शादी कर ली। उनके साथ सौतेले पापा के यहां रहने लगी थी। 5वीं से 10वीं की पढ़ाई वहीं की। वहां मुझे हर रोज एहसास कराया जाता कि सौतेले पापा के पास रह रही हूं। हर बात पर टोका जाता। कहीं जाने-आने पर मनाही थी। कई बार तो कोई चीज अनजाने में टूट जाती, तो खूब पिटाई की जाती। बच्ची थी, कम समझती थी इसलिए सोचती कि मां-बाप तो बच्चे को मारते ही हैं। बड़ी हुई, तो पता चला कि सौतेले पापा मुझे जान-बूझकर मारते थे। अक्सर मुझे गंदे तरीके से छूते भी थे। एक दिन उन्होंने मेरी खूब पिटाई की। बेल्ट से मारा। एक हाथ की चमड़ी उधड़ गई। मारते हुए मां से कहा- इसे अभी घर से निकालो, वर्ना तुम्हें भी घर में नहीं रहने देंगे। उस समय रात के 10 बज रहे थे। मां ने मेरे खून से सने हाथ को पकड़ा और घर से बाहर कर दिया। फौरन अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। पूरी रात घर के बाहर बैठी रही कि शायद मम्मी का कलेजा पसीजेगा और वह मुझे भीतर बुला लेंगी। सुबह के लगभग 4 बज गए, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। मेरे हाथ से खून अब भी निकल रहा था। मैंने दुपट्टा फाड़ा और हाथ में लपेट लिया। घर से कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर हमारी मेड का घर था। सुबह होते ही मैं उनके यहां चली गई। मुझे देखकर मेड डर गईं। कहने लगीं- क्या हुआ रश्मि? तुम यहां क्या कर रही हो? मेरे मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। हकलाते हुए बोली, मम्मी-पापा ने घर से निकाल दिया। कुछ दिन आप अपने यहां मुझे रहने देंगी? कुछ देर बाद मेड बोली- नहीं, नहीं। तुम जवान हो। इस तरह किसी के घर कैसे रह सकती हो? जाओ अपने घर जाओ। यह कहते हुए उन्होंने भी दरवाजा बंद कर लिया। उसके बाद घर के पास एक अनाथालय था, वहां पहुंची। अनाथालय में मुझे रहने को जगह मिली। फिर वहीं रही और 12वीं तक पढ़ाई की। एक कंपनी में रिसेप्शनिस्ट की जॉब लग गई। यहीं पर एक कश्मीरी लड़के से मुलाकात हुई। वह बहुत हैंडसम लड़का था। उस ऑफिस की सारी लड़कियां उस पर फिदा थीं। 2014 की बात है। धीरे-धीरे हम दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। एक-दूसरे से मिलने लगे। बचपन में पिता की मौत, फिर मां के होते हुए भी मैंने अनाथ की जिंदगी जिया था। मुझे लगा कि- अब हर खुशी मिलने वाली है- पत्नी का सुख। मां बनने का सपना और अपना घर-परिवार, लेकिन किसे पता था कि यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली। उस लड़के ने कहा- अगर तुम्हें मेरे साथ शादी करनी है, तो इस्लाम को मानना होगा। मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं था- मैंने हां कह दिया। उसके बाद बुरका, पांच वक्त की नमाज… सब करने लगी। फिर हम दोनों कश्मीर चले गए। वहां मुस्लिम रीति-रिवाज से हमारी शादी हुई। कुछ ही महीने वहां रही, फिर पति के साथ दुबई चली गई। वहां पहुंचते ही पति का रवैया बदलने लगा। हर रोज गाली-गलौज, मार-पिटाई करने लगे। घर से निकल जाने को कहते। मन-ही-मन सोचती- हे भगवान! जिंदगी कितनी परीक्षा लेगी! पहले सौतेला बाप ने मार-पीटकर भगाया और अब पति भगाना चाहता है। किसी तरह रिश्ता निभाती रही। 2015 आते-आते गर्भवती हुई। पति को पता चला तो वह कहने लगे- अभी बच्चा नहीं पैदा करना है। इसे गिरा दो। सुनकर घबरा गई कि- एक बाप कोख में पल रहे अपने बच्चे को गिराने के लिए कह रहा है! लेकिन मैं अड़ गई, बोली- बच्चे पैदा करूंगी। 6-7 महीने की गर्भवती थी तब पति मेरे साथ संबंध बनाने की जिद करते थे। कहते – शौहर हूं, जब चाहूं संबंध बना सकता हूं। मैं मना नहीं कर पाती थी। जिद करके मेरे साथ संबंध बनाता। उससे मेरी प्रेग्नेंसी में दिक्कत आ गई। बच्चे के पैदा होने की तारीख नजदीक आई और जब तेज दर्द हुआ तो हॉस्पिटल लेकर गए। डॉक्टर ने फौरन कहा- सर्जरी करके बच्चा निकालना होगा। उस वक्त भी मेरे पति बार-बार कह रहे थे- डॉक्टर नॉर्मल डिलीवरी होने दीजिए। डॉक्टर ने समझाया नॉर्मल डिलीवरी का इंतजार करोगे, तो जच्चा-बच्चा दोनों की जान जा सकती है। तब मेरे पति माने। डॉक्टर ने सर्जरी की। बेटी पैदा हुई, सुनते ही पति के होश उड़ गए। कहने लगा- क्या ही पैदा किया तुमने। बेटी जनमी हो। मेरे सास-ससुर भी कश्मीर से दुबई आ गए। सर्जरी के दूसरे दिन ही अस्पताल से घर आ गई। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर डायपर लाने तक सब काम करना पड़ता। पेट में टांके कच्चे थे, घाव खुल गया और उसमें पस भर गई। उस दौरान भी सास-ससुर कोई मदद नहीं कर रहे थे। एक दिन तो अपने पति से डायपर लाने को बोली तो उन्होंने गुस्से में आकर मेरे मुंह पर थूक दिया और कहा- जानती हो कि तुम्हारी औकात क्या है? न तुम्हारे बाप का पता है, न घर का। सड़क से उठकर महल में आ गई हो। उस दिन समझ गई कि अब भी मैं अकेली हूं। पति का बेटी से कोई लगाव नहीं था। वह कुछ तय रकम दे देते। उसी में बच्चे और खुद की देखभाल करती। दो साल बाद, 2017 में बेटे माही का जन्म हुआ। तब लगा कि अब शायद सब ठीक हो जाएगा। देखभाल के लिए फिर से मेरी सास दुबई आ गईं। वह अक्सर कहतीं- तुम्हारे बच्चे मेरे हाथ से कुछ नहीं खाते, तुम ही इन्हें संभालो। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर ही थी। आज भी वह हिजाब मेरे पास है, जिसमें गांठ बांधकर मैं अपने बेटे को पेट से बांधकर रखती थी। पेट पर बांधे हुए उसे दूध पिलाती और बेटी को खाना खिलाती। एक बार भी सास नहीं कहती कि लाओ मैं संभाल दूं। बस मुझे इतना भरोसा था कि बेटा अब बड़ा हो रहा है, शायद सब ठीक हो जाएगा। 2022 की बात है। उस वक्त हम पति-पत्नी सिंगापुर चले गए। वहां रोज दोनों बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना पड़ता। सुबह पति को जगाती तो झगड़ पड़ते। एक दिन मैंने पति से कहा- मुझे ड्राइविंग सिखा दो, ताकि बच्चों को स्कूल छोड़ सकूं। उसके बाद मैंने ड्राइविंग लाइसेंस के लिए अप्लाई किया। जिस दिन ड्राइविंग टेस्ट था, मेरे पति ने मुझे कार देने से इनकार कर दिया। मैं कार के सामने खड़ी गिड़गिड़ाती रही। चाबी देने को कहती रही, लेकिन उसने एक नहीं सुनी। जाते वक्त मेरे पैर पर कार चढ़ाते हुए ऑफिस निकल गए। सोचा जिस इंसान को मेरी बिल्कुल कद्र नहीं, उसके साथ रहना बेकार है। 2021 आते-आते हालात और बिगड़ गए। पुलिस के पास भी नहीं जा सकती थी। जाती, तो वापस उसी घर में आना होता और फिर से वही मार-पिटाई होती। बेटा हर वक्त पति के साथ ही रहता था। एक रात पति ने मुझे और मेरी बेटी को घर से धक्का मारकर निकाल दिया। उसे लगा कि हर बार की तरह रोऊंगी और वापस लौट जाऊंगी, लेकिन उस दिन मैंने ऐसा नहीं किया। रात में ही दोस्तों को फोन करके उधार पैसे मांगे। फ्लाइट का टिकट कराया और बेटी के साथ दिल्ली लौट आई। कुछ दिनों तक अपने एक जानने वाले के यहां रही, फिर नौकरी करने लगी। कोई रेंट पर मकान देने को तैयार नहीं था। पूछते थे- पति क्या करते हैं? कहां रहते हैं? बताती- हम मां और बेटी हैं। पति नहीं हैं। मकान मालिक कमरा देने से इंकार कर देता। बड़ी मुश्किल से एक फ्लैट मिला। जो बेटी सिंगापुर में पढ़ रही थी, उसे दिल्ली में कोई स्कूल एडमिशन देने को तैयार नहीं था। सभी स्कूल बच्चे के पिता की डिटेल्स मांग रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक स्कूल में एडमिशन मिला। वहां महीने की फीस 15 हजार थी और मेरी सैलरी 30 हजार। करीब एक साल तक वहां पढ़ाया, फिर स्कूल ने फीस न जमा करने से बेटी को निकाल दिया। उसके बाद बेटी बीमार पड़ने लगी। जो भी पैसा मेरे पास था और ज्वैलरी थी, बेचकर उसका इलाज करवाने लगी। हर रात बेटी के साथ बेटे माही की याद आती है। कई बार मैंने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन पति बात नहीं कराता। धमकी देते हुए कहता- दिल्ली में हो, चैन से रहो, नहीं तो इतने टुकड़े काटूंगा कि गिनती भी नहीं हो पाएगी। उसी दौरान मेरी भी तबीयत बहुत खराब हो गई। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गई। मैं बेटी को कुछ दिनों के लिए अपनी मां के पास छोड़ने के लिए लाजपत नगर गई, लेकिन मां ने दरवाजा बंद कर लिया और सीधे मना कर दिया- यहां मत आना। बीमार होने की वजह से मेरी नौकरी छूट गई। उस वक्त लोग सलाह देने लगे- दूसरी शादी कर लो। बच्ची के चक्कर में जिंदगी क्यों खराब कर रही हो, जिसका बच्चा है, उसे दे दो, लेकिन उन्हें क्या पता, मैं अपनी बेटी के लिए ही जी रही हूं। उस वक्त बेटी कुछ मांगती, तो कोई बहाना बना लेती। उससे सच बताने की हिम्मत नहीं होती। जब नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाती तो बेटी फोन करके पूछती- मां, नौकरी लगी? मैं हंसकर कहती- नहीं बेटा। मन-ही-मन सोचती- आज फिर उसे पिज्जा खिलाने और फिल्म दिखाने का वादा पूरा नहीं कर पाऊंगी। ऐसे ही चार महीने गुजर गए। तब जाकर फिर से एक नौकरी लगी। अब सिर्फ बेटी के लिए जी रही हूं। सिंगल मदर हूं। कई बार तो सोचकर ही कांप जाती हूं- अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरी 10 साल की बेटी का क्या होगा? बेटी का नाम लॉरिन है। मेरा बस एक ही सपना है कि उसे पढ़ा-लिखा दूं, उसके लिए एक घर बना दूं, जिसके गेट के बोर्ड पर लिखा हो- ‘लॉरिन हाउस’, ताकि कभी कोई उसे ताना दे, घर से निकाले तो वह कह सके- मेरा अपना भी घर है। बेटे की शक्ल देखे हुए सालों हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि वह कहां है? किस देश में है? पति दूसरी शादी कर चुका है। शायद अब ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है। मैंने कई बार कश्मीर जाकर बेटे को तलाशने की कोशिश की। बहुत पहले वह एक बार मिला भी था। कश्मीर मानवाधिकार आयोग की मदद से। तब मैंने उससे गले लगकर कहा था- मैं तुम्हारी नजर में अपराधी हो सकती हूं। जब कभी लौटने का मन हो तो लौट आना। मुझे जितना मारने का मन करे, मार लेना। हूं तो तुम्हारी मां। जहां रहो खुश रहो। मेरे पास उसकी एक भी तस्वीर नहीं है। 5 साल हो गए हैं, उसकी शक्ल नहीं देखी है। हर दिन यही सोचती हूं कि आज भी बेटे की कोई खबर नहीं है। पति ने घर से निकालते वक्त धमकी दी थी कि बेटी से ही संतोष करना, वर्ना उसे भी छीन लूंगा। (रश्मि सहगल ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर नीरज झा से साझा किए) ————————————— 1- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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