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18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। मैं यूपी के बागपत जिले के गांव किरठल का रहने वाला हूं। पिताजी बड़ी मुश्किल से खेती के सहारे परिवार का खर्च चलाते थे। पश्चिमी यूपी के ज्यादातर युवाओं की तरह मैं भी सेना में भर्ती होना चाहता था। खूब तैयारी भी करता था। इसी मेहनत की वजह से बीए की पढ़ाई के दौरान एनसीसी का ‘सी’ सर्टिफिकेट भी मिला। 12 अक्टूबर 2011 की वह स्याह रात आज भी मेरे जेहन में दर्ज है। उस वक्त मेरी उम्र 18 साल दो महीने थी। पिताजी ने मुझे जरूरी काम से बहन के घर शामली भेजा। उसी रात, बहन के गांव से करीब सात किलोमीटर दूर एक वारदात हुई। कुछ अपराधियों ने दो पुलिसकर्मियों पर हमला कर उनकी राइफल छीन ली। मुठभेड़ में एक सिपाही की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। पुलिस ने शक के आधार पर करीब 100 लोगों को हिरासत में लिया। उनमें मेरे पिताजी भी शामिल थे। पिताजी की गिरफ्तारी के बाद हमारे गांव में दहशत फैल गई। मेरी मां बुरी तरह घबरा गईं। उन्होंने मुझे दादी के मायके सरुरपुर भेज दिया। दादी के मायके रहते हुए 11 दिन बीत चुके थे। 24 अक्टूबर की रात करीब 8 बजे रहे थे। मैं परिवार के लोगों के साथ आंगन में खाना खा रहा था। तभी कुछ लोगों के आने की आहट सुनाई दी। वो सीढ़ियों से छत की तरफ बढ़ रहे थे। मैंने छत की ओर देखा तो पुलिसकर्मी AK-47 ताने खड़े थे। सभी बुलेटप्रूफ जैकेट पहने हुए थे। पूरा घर पुलिस छावनी बन चुका था। इस कार्रवाई में मेरा एक रिश्तेदार भी शामिल था, जिसकी उस दिन छुट्टी रद्द कर दी गई थी। छत से एक पुलिसकर्मी ने सख्त आवाज में पूछा- अमित कहां है? परिवार की एक महिला ने हाथ जोड़कर कहा- साहब, अमित ने कुछ गलत नहीं किया है। पुलिस तब भी लगातार वही सवाल दोहराती रही- पहले बताओ अमित कहां है, जहां भी है उसे हमारे हवाले कर दो। मेरे हाथ में रोटी का निवाला था, मैंने उसे थाली में छोड़ दिया। खड़ा हुआ और बोला- मैं ही अमित हूं। मुझे देखते ही पुलिस ने अपनी बंदूकें नीचे कर लीं। एक पुलिस वाले की तो हंसी छूट गई। वह बोला- अरे, तू ही अमित है रे? दरअसल, वे किसी लंबे-चौड़े, खूंखार अपराधी की तलाश में थे, लेकिन सामने 18 साल का एक दुबला-पतला, साधारण सा लड़का खड़ा था। हमारे रिश्तेदार पुलिस के सामने हाथ जोड़ते रहे, लेकिन पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और बोलेरो जीप में बैठाकर अपने साथ ले गई। यह मुजफ्फरनगर पुलिस थी। उधर, बागपत पुलिस भी मेरी तलाश में थी। जब उन्हें पता चला कि मुजफ्फरनगर पुलिस ने मुझे पकड़ लिया है तो उनकी जीप भी हमारे पीछे चल पड़ी। वो तब तक पीछा करते रहे, जब तक मुजफ्फरनगर पुलिस की जीप शामली में दाखिल नहीं हो गई। रास्ते में पुलिसकर्मी अपने अधिकारियों को सूचना देते जा रहे थे- जय हिंद सर, अमित को पकड़ लिया है। वे इस तरह बता रहे थे, जैसे किसी खूंखार आतंकी को दबोच लिया हो। इस पर अधिकारियों ने निर्देश दिया कि शामली मुख्यालय में बड़ी संख्या में मीडिया मौजूद है, इसलिए अमित को शामली थाने ले जाओ। फिर एक घंटे बाद मुजफ्फरनगर सिविल लाइन थाने ले जाना। पुलिस वालों ने ठीक ऐसा ही किया। एक घंटे बाद मुझे मुजफ्फरनगर सिविल लाइन थाने के हवालात में बंद कर दिया गया। मुझे हवालात में डालते ही पुलिस वालों ने पिताजी को छोड़ दिया। हवालात के ठीक बगल में क्राइम ब्रांच का ऑफिस था। उसके अधिकारी लगातार 11 दिन यानी 3 नवंबर तक हर रोज दिन में अपने पास रखकर पूछताछ करते और रात में हवालात में बंद कर देते थे। अब हवालात का हाल बताता हूं। पहले दिन मुझे आलू की सब्जी और रोटी दी गई। मैंने खाने से मना कर दिया। इस पर एक पुलिस वाले ने कहा- पहले इसे कूटो, फिर खाना खाएगा। इसके बाद एक पुलिसकर्मी ने कहा- हाथ उल्टा करके आगे कर। मैंने हाथ बढ़ाया तो उसने इतनी जोर से डंडा मारा कि मेरे हाथ का मांस उधड़ गया। फिर उसने मेरी कमर में मुक्के मारे। वे बार-बार पूछते रहे- बता, राइफल कहां है? मैं हर बार यही कहता रहा कि मुझे कुछ नहीं पता। पुलिस रोज मुझे बेरहमी से पीटती। बस पिटाई का तरीका बदल जाता था और वही सवाल दोहराती- बता, राइफल कहां है? मेरा जवाब भी वही होता था कि मैं नहीं जानता। एक दिन पुलिस ने मुझे जमीन पर लिटाया, दोनों टांगें बांधकर दीवार से लटका दिया। घंटो इसी तरह लटकाए रखा और मैं चीखता रहा। इसी तरह एक दिन मेरी पैंट उतरवाकर, घंटो खड़ा रखा। फिर फर्श पर बैठाकर मेरी दोनों टांगों को लगभग 360 डिग्री तक खींचा। दर्द के मारे हालत इतनी खराब हो गई कि चल भी नहीं पा रहा था। इसी दौरान सहारनपुर में कुछ बदमाशों ने पुलिस की राइफल छीन ली थी। पुलिस को लगा कि यह किसी एक ही गिरोह का काम है। इस घटना का गुस्सा भी पुलिस ने मुझ पर उतारा। उस दिन पुलिस ने हवालात में एक अपराधी से पूछताछ के दौरान उसके प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांध दी। जब मैंने उसे देखा तो पुलिस वाले कहने लगे- अब तेरी बारी है। फिर मेरे कपड़े उतरवाए और मेरे प्राइवेट पार्ट पर भी ईंट लटका दी। खिंचाव के कारण पेट में तेज दर्द होने लगा। ऐसा लग रहा था कि मैं मर जाऊंगा। हालत बिगड़ने पर एक पुलिस वाले ने ही कह दिया- ईंट हटाओ, वरना यह मर जाएगा। तब जाकर उन लोगों ने ईंट हटाई। फिर मुझे दूसरी सजा दी गई। मेरा सिर एक ओखलीनुमा कुर्सी में डालकर मुझे उल्टा लटका दिया गया। मैं दाएं-बाएं सिर भी नहीं हिला पा रहा था। आंखों और नाक में साबुन मिला पानी डाला गया। मैं दर्द से चिल्लाता रहा। दूसरी ओर पुलिस पैरों पर डंडे बरसाती रही- इतने कि आज भी मेरे घुटने टेढ़े हैं। ठीक से खड़ा नहीं हो पाता। 4 नवंबर उस थाने में मेरा आखिरी दिन था। उस दिन मुझे सबसे ज्यादा पीटा गया। हवालात के गेट के सामने फर्श पर बैठाया गया। जैसे ही आंख लगती, जोर से डंडा मारा जाता और गंदी गालियां दी जातीं। पुलिस का कमाल देखिए- रिकॉर्ड में मेरी गिरफ्तारी 3 नवंबर दिखाई गई। लिखा गया कि मुझे जंगल से उस वक्त पकड़ा गया जब मैं अपराधियों के साथ मुठभेड़ की योजना बना रहा था। जबकि सच यह था कि पुलिस ने मुझे 24 अक्टूबर से ही हिरासत में रखा था। इस तरह रिपोर्ट तैयार करने के बाद पुलिस मुझे शामली मुख्यालय लेकर गई। मीडिया के सामने राइफल और कुछ हथियार दिखाए। दावा किया कि पुलिस ने वो हथियार मुझसे ही बरामद किए हैं। मीडिया से बातचीत के बाद भी मुझे छोड़ा नहीं गया। थाने के बरामदे में मेरी पैंट उतरवाई गई और फिर डंडे बरसाए गए। उस दिन पूरी पैंट खून से सन गई। 4 नवंबर को मुझे कोर्ट में पेश किया जाना था। मेडिकल से पहले पुलिस ने एक बार फिर पिटाई की। कान इतनी जोर से रगड़े गए कि दर्द से कराह उठा। पूरे शरीर पर पिटाई के निशान साफ नजर आ रहे थे। हालांकि डॉक्टर ने रिपोर्ट में मुझे पूरी तरह फिट दिखा दिया। पुलिस मुझे पेशी के लिए जीप से ले जा रही थी। उस दिन घना कोहरा था। पुलिस की जीप एक गाड़ी से टकराने से बाल-बाल बची। उसका गुस्सा भी पुलिस ने मुझ पीटकर उतारा। जज के सामने मुझे पेश करते हुए पुलिस ने चालाकी से मुझे कमर तक ढंक रखा था, ताकि पैंट पर लगा खून जज को न दिखे। वहां जज ने मुझे देखा। फिर रीडर ने मुझसे एक कागज पर दस्तखत करवाए और पुलिस के साथ जेल भेज दिया। वहां मुझे जेल की अस्पताल में भर्ती किया गया। वहां एक शख्स आया और बोला- तुम्हें टीका लगेगा। मैंने पूछा- क्या आप डॉक्टर हैं? उसने कहा- नहीं, मैं कैदी हूं, लेकिन यह काम मुझे आता है। उसकी बात सुनकर मैं घबरा गया। कुछ समय बाद मुझे अस्पताल से डिस्चार्ज कर एक बैरक में भेज दिया गया। वहां एक पंडित जी थे। उनसे दोस्ती हो गई। लंगड़ाते देख उन्होंने पूरी बात पूछी। मैंने सब बता दिया। तब से वो मेरी देखभाल करने लगे। जेल में पानी जैसी दाल मिलती थी। उसी दाल में रुमाल भिगोकर अपने जख्मों की सिकाई करता था। जेल आए मुझे 15 दिन हो चुके थे। एक दिन पिताजी का नाम पुकारा गया। मैं खुश हो गया। वे मुझसे मिलने आए थे। उस दिन हम दोनों एक-दूसरे को बस निहारते रह गए। उस दिन पंडित जी ने कहा था- ध्यान रखना, पिताजी तुम्हारी खून से सनी पैंट न देख पाएं, नहीं तो बहुत दुखी होंगे। मैंने छिपाने की कोशिश भी की, लेकिन बातचीत के दौरान उनकी नजर पैंट पर पड़ गई। वे फूट-फूटकर रोने लगे। उन्हें जैसे-तैसे चुप कराया। जाते समय उन्होंने कहा- क्या से क्या हो गया, अमित। हम कहां से कहां आ गए। तबसे पिताजी हर महीने मुझसे मिलने आते। मैं हरबार कहता कि पढ़ाई छूट गई है। वे कहते- कोई बात नहीं, खुद को 12वीं पास मान लो, लेकिन मेरा दिल नहीं मानता था। जेल में रोज एक ही पानी की पाइप से सौ से ज्यादा कैदी नहाते थे। शाम होते ही सभी को एक जगह खड़ा कर दिया जाता। वहीं बातें होती थीं- अपराध की, सजा की और सबसे ज्यादा कानून की। मुझे लगता, यह जेल नहीं, अपने आप में एक चलती-फिरती अदालत है। हर दिन बैरक में कोई नया कैदी आता और कानून पर नई चर्चा छिड़ जाती। कानून से जुड़ी प्रैक्टिकल पढ़ाई तो मेरी वहीं हो गई थी। उसी जेल में पश्चिमी यूपी के नामी-गिरामी गैंगस्टर भी बंद थे। मुझे देखते और रोज अपने गैंग में शामिल होने का न्यौता देते। उन्हें लगता था कि मैंने पुलिस के हथियार लूटे हैं तो खूंखार भी हूं और पढ़ा-लिखा भी। असल में वे चाहते थे कि गैंग का हिसाब-किताब, लूट, जमाबंदी और बाकी कागजी काम संभालूं। हालांकि, पंडित जी ने समझाया था कि यहां सबकी हां में हां मिलाना है। मैं वही करता रहा। मेरे बैरक में एक बड़े अधिकारी भी बंद थे। उनका नाम नहीं बता सकता। वो मुझसे चिट्ठी-पत्री और अर्जियां लिखवाते थे। उनके साथ रहते हुए कानूनी दांव-पेच और कानूनी भाषा की गहरी समझ हो गई। एक दिन एक गांव के सरपंच आए। उन्हीं की मदद से एक वकील से मेरी बात बनी। तब इलाहाबाद हाईकोर्ट में मेरी जमानत अर्जी दी गई। फिर 7 फरवरी 2014 को जमानत मिली। यहीं से मेरी कहानी ने एक नई करवट ली। जिस दिन जेल से रिहा हो रहा था, जेल के लगभग सभी कैदी गेट तक छोड़ने आए। जेल में दो गैंग चलते थे। दोनों ही गैंग के कैदी मुझे छोड़ने आए थे। यह देखकर जेलर तक हैरान रह गया। उसने पूछा- आज ऐसा कौन आदमी छूट रहा है, जिसे दो दुश्मन गैंग एक साथ छोड़ने आए हैं? वजह साफ थी- मैं उनकी लिखा-पढ़ी का काम करता था। जेल से बाहर आते ही पिताजी के साथ घर गया। उस दिन मां ने पसंदीदा मटर-पुलाव बनाया था। घर वालों ने बताया कि मेरे जेल जाने के बाद उन्होंने कितना कुछ सहा। लोगों ने खुलकर सामाजिक बहिष्कार तो नहीं किया, लेकिन पीठ पीछे कहते थे- क्या पता, इनके लड़के ने ही मर्डर किया हो। ये सब सुनकर मां परेशान रहती थीं। उन्हें डर रहता था कि कोई मुझे नुकसान न पहुंचा दे। वे चाहती थीं कि गांव छोड़ दूं। वे कहतीं- बेटा, जमानत पर बाहर तो आ गया, अब बस इस मामले का कलंक हमारे माथे से मिटा दे। कुछ दिन बाद गांव छोड़कर गुड़गांव चला गया। वहां अपने दोस्त के साथ रहता था। गुजारा करने के लिए कैलेंडर बेचता था। साथ ही एक वकील के साथ तीन हजार रुपए महीने पर क्लर्क का काम करता था। 22 नवंबर 2015 को गुड़गांव से मेरठ आ गया। यहीं एलएलबी में दाखिला लिया। पढ़ाई की फीस जुटाने में दोस्तों ने खूब मदद की। कोर्ट की हर तारीख पर जाने के लिए वे मुझे 500 रुपए उधार देते थे। जिसे मैं छोटे-मोटे काम करके लौटाता था। 2018 में एलएलबी पूरा हुआ। इसके बाद 2020 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से एलएलएम किया। मेरे रिसर्च का विषय था- भारत में कैदियों के अधिकार एवं कारागार व्यवस्था का विश्लेषणात्मक अध्ययन। एलएलएम की फीस यूपी के एक पीसीएस अधिकारी ने भरी। उनका प्यार और सहयोग आज भी मेरे साथ है। डिग्री लेते ही मेरी असली लड़ाई शुरू हुई। अदालत में खुद अपनी पैरवी करने की अर्जी दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। अदालत के सामने मैंने पहला अहम सबूत रखा- जिस घटना में एक पुलिसकर्मी घायल हुआ था, उसने अपने बयान में साफ कहा था कि मैं उस वारदात में शामिल नहीं था। इसके बाद मैंने दूसरा महत्वपूर्ण फैक्ट सामने रखा। घटना 12 अक्टूबर की थी, जबकि मेरी गिरफ्तारी 24 अक्टूबर को हुई। जबकि, घायल पुलिसकर्मी से जांच अधिकारी ने पूछताछ 12 नवंबर को की। मेरा सवाल सीधा था- घायल पुलिसकर्मी का बयान लिए बिना मुझे कैसे गिरफ्तार कर लिया? इतना ही नहीं, पुलिस ने कागजों में मेरी गिरफ्तारी 3 नवंबर को एक फर्जी मुठभेड़ के तौर पर दर्ज की, जबकि मैं 24 अक्टूबर से ही पुलिस हिरासत में था। यही फैक्ट अदालत में साबित करने में सफल रहा। आखिरकार, 27 सितंबर 2023 को अदालत ने मुझे बाइज्जत बरी कर दिया। (एडवोकेट अमित चौधरी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) —————————————– 1- संडे जज्बात-लोग भैंस, बुलडोजर आंटी कहते थे:30 की उम्र में 92 किलो वजन था- किडनी खराब होने लगी तो 100 दिन में 20 किलो घटाया मैं कानपुर की रहने वाली आभा शुक्ला हूं। भैंस, मोटी, 45 साल की आंटी, चलती-फिरती बुलडोजर, किसी के ऊपर गिर जाए, तो वो दबकर ही मर ही जाए… कभी ये सारे नाम मेरे ही थे। लोग मुझे इन्हीं नामों से बुलाते थे। मेरे असली नाम ‘आभा शुक्ला’ से नहीं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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