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मैं योगिता श्री। एक ऐसी मां हूं, जो ईश्वर से अपने से पहले बेटे की मौत मांगती हूं। कोई भी मां ऐसी दुआ कभी नहीं कर सकती, लेकिन बेटे की पीड़ा देखकर यही कहती हूं- हे भगवान, हमसे पहले मेरे बेटे को उठा लेना। नहीं तो, हमारे बाद इसका क्या होगा? कौन इसकी देखभाल करेगा? यह सब सोचकर आंख भर आती है, लेकिन बेटे के सामने कभी नहीं रोती। अगर रोऊंगी, तो उसे लगेगा कि वह हमारे लिए बोझ है। अब तो उसकी तकलीफ दिन-पर-दिन बढ़ती ही जा रही है। हम गुजरात के अहमदाबाद के रहने वाले हैं। 2007 की बात है। मेरी शादी उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले अविनाश सिंह से हुई थी। अविनाश 13 साल की उम्र में ही अपने पिता के साथ अहमदाबाद आकर रहने लगे थे। शादी के एक साल बाद बेटे हितांशु का जन्म हुआ। मेरे पति तीन भाइयों में से एक हैं। उनमें यह पहला बेटा था। हर कोई खुश था कि घर का पहला चिराग आ गया। दो साल का था, तब यह अक्सर चलते-चलते गिर जाता था। तब हमें लगता था कि बच्चा है, बच्चे ऐसे ही गिर जाते हैं। शायद पैर कमजोर होंगे, मालिश या दवा की जरूरत होगी। फिर हम डॉक्टर को दिखाकर विटामिन की दवाएं लेकर आते। इसकी नानी और दादी सुबह-शाम इसकी मालिश करती थीं। जब 4 साल का हुआ तो इसके पैर थोड़े टेढ़े होने लगे। ऐसा लग रहा था कि पैरों में जान ही नहीं है। सीढ़ियां चढ़ने में इसे तकलीफ होती थी। मेरा भाई डॉक्टर है। वह समझ गया कि इसे कोई गंभीर या अलग तरह की बीमारी है। उसने 2012 में करीब 12 हजार रुपए खर्च करके इसका ब्लड टेस्ट करवाया। दो हफ्ते बाद जब रिपोर्ट आई, तो वो दिन हमारे लिए काला दिन जैसा था। भाई ने बताया, आगे चलकर इसके शरीर के अंग काम करना बंद कर देंगे। इसे मांसपेशियों की बीमारी है। यह पूरी तरह बिस्तर पर पड़ जाएगा। यह मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी में धीरे-धीरे शरीर के अंग काम करना बंद करने लगते हैं। सुनते ही कई दिनों तक तो हम सो नहीं पाए। लोग जिस भी डॉक्टर को दिखाने को कहते, वहां लेकर चले जाते। शुरुआत में एक-दो डॉक्टरों ने इलाज की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पोलियो फाउंडेशन में जब दिखाया तो उन्होंने साफ कहा- इसे घर ले जाओ। जब तक है, तब तक इसकी सेवा करो। अब इसका कुछ नहीं हो सकता। एक डॉक्टर ने तो फाइल तक नहीं देखी। सीधे बोले- रिपोर्ट सब बोलती है। यह जिंदगीभर ऐसे ही रहेगा। अब देश में ऐसी कोई दवा ही नहीं है, तो हम क्या कर सकते हैं। उस दिन तो हमारा दिल बैठ गया। उस वक्त मेरा बेटा स्कूल में पढ़ रहा था। 11 साल का था। स्कूल की दूसरी मंजिल पर इसका क्लासरूम था। तेज गर्मी में यह दोनों हाथ-पैर के सहारे रेंगकर सीढ़ियां चढ़ता था। सीढ़ी गर्म रहती थी, जिसके कराण इसके दोनों हाथ जल जाते थे। एक दिन स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा- हमारी नौकरी का सवाल है। इसे घर पर रखिए। यह पढ़-लिखकर क्या ही कर लेगा। स्कूल के बच्चे भी इसे लंगड़ा-लंगड़ा कहकर चिढ़ाते थे। उसके बाद हमें इसका नाम कटवाना पड़ा। तब से यह कभी स्कूल नहीं गया। जब स्कूल से इसका नाम कटवाया और घर पर रहने लगा, तो हर रोज कहता- मम्मी, मुझे स्कूल जाना अच्छा लगता था। अब क्या मैं कभी स्कूल नहीं जा पाऊंगा? जब बच्चों के स्कूल जाने का समय होता था तो यह खिड़की से सड़क की तरफ नजरें गड़ाए देखता रहता। अब जब घर के बरामदे में बैठती हूं और बाहर स्कूल जाते बच्चों को देखती हूं, तो अपने बेटे को निहारने लगती हूं। काश! यह भी अच्छा होता, तो स्कूल जा पाता। हमारे बुढ़ापे का सहारा बनता। लेकिन क्या करें, जो किस्मत में है, उसे भुगतना ही पड़ेगा! शायद पिछले जन्मों के हमारे बुरे कर्म होंगे, जो इस जन्म में भुगत रहे हैं। अब तो यह भी अपनी जिंदगी से थक चुका है, लेकिन फिर भी कहता है- मेरा एक ही सपना है, बड़ा होकर खूब पैसे कमाना। इसके दोनों हाथों में मोबाइल पकड़ा देती हूं, तो धीरे-धीरे मोबाइल चलाकर वीडियो देखकर पढ़ाई करता है। आजकल तीसरी क्लास का सिलेबस देख रहा है। शुरू में आस-पड़ोस के लोग आकर मेरे बेटे को बेचारा और लाचार कहते थे। कहते थे- हाय! भगवान ने तुम्हें कैसी किस्मत दे दी। इससे अच्छा तो बेऔलाद ही रहते। कुछ लोगों ने कहा- दूसरे बच्चे का प्लान कर लो। यह सब सुनकर बुरा लगता, लेकिन किस-किस का मुंह बंद कराती? दूसरा बच्चा न पैदा करने की भी वजह है। हम इसे एक डॉक्टर को दिखाने ले गए थे। उन्होंने कहा, इसे जेनेटिक बीमारी है। आगे आपने बच्चा पैदा किया तो ऐसे दो और बच्चे पैदा हो सकते हैं। सोचने लगी कि ऐसा एक बच्चा संभालना हमारे लिए पहाड़ जैसा है, दो और ऐसे बच्चे कैसे संभालूंगी? दरअसल, हमारे मामा के बेटे को यही बीमारी थी। उसे एक परिवार से मिली थी, जिसके दोनों बच्चों को यह बीमारी थी। इसलिए हमने दूसरे बच्चे का सपना ही छोड़ दिया। सोचिए जरा, जब हमारी शादी हुई, तभी से इसके पापा ने ठान रखा था- एक ही बच्चा करेंगे। चाहे बेटा पैदा हो या बेटी। जब यह पैदा हुआ, तो इसके पापा ने संतोष कर लिया। अब यह जैसा भी है, हम केवल इसी के लिए जी रहे हैं। हितांशु का वजन इतना है कि हम उसे अकेले नहीं उठा सकते। मेरे पति अविनाश और मैं, मिलकर उसे पेशाब-पॉटी कराते हैं। उस वक्त तीन-चार तकियों के सहारे उसे बैठाना पड़ता है। पेट, पीठ की तरफ निकलता जा रहा है। थोड़ी देर ही सो पाता है, उसके बाद शरीर में तेज दर्द कारण उठकर बैठ जाता है। हम पति-पत्नी उसे उठाकर वॉशरूम ले जाते हैं। भले ही वह शरीर से विक्लांग है, लेकिन उम्र की वजह से हमसे झेप जाता है, शर्माता है। कहने लगता है- ‘मैं तुम्हारे सामने पॉटी कैसे करूं?’ आप लोगों को परेशान कर रहा हूं? ये बातें सुनकर कलेजा बैठ जाता है। इसे समझाती हूं- हम तुम्हारे मां-बाप हैं, दोस्त की तरह हैं, लेकिन इसे अच्छा नहीं लगता। मन-ही-मन इसे लगता है कि हमारे लिए बोझ बन गया है। कुछ दिन पहले की बात है, इसने आवाज देकर मुझे उठाया था। मैं गहरी नींद में थी। झल्लाकर बोल पड़ी- थोड़ी सी नींद तो लेने दो। हर वक्त मम्मी-मम्मी करता रहता है। तुम्हें कभी पानी पीना है, कभी करवट बदलना है, कभी उठकर बैठना है, कभी वॉशरूम जाना है, कभी पॉटी करनी होती है। मैं भी तो इंसान ही हूं, मशीन तो नहीं। तुम्हारी वजह से हमें 24 घंटे जागते रहना पड़ता है। देख रहे हो न हमारी हालत…। सुनकर बोला था- मुझे पता है कि तुम लोग मेरी वजह से तंग आ चुके हो, लेकिन क्या करूं, जब तक भगवान मुझे उठा नहीं लेता, तुम लोगों को तकलीफ तो देता ही रहूंगा न! यह सुनते ही मैं और इसके पापा फफक-फफककर रोने लगे। इसके पापा सो रहे होते हैं, और यह अचानक बोल पड़ता है- ‘मुझे वॉशरूम जाना है’ या ‘हाथ पर कीड़ा बैठ गया है’। वह तुरंत नींद से उठ जाते हैं। अब तो इसके पापा का चेहरा ऐसे दिखता है, जैसे वह हर वक्त नींद में हों। वह दिन में कुछ ही घंटे सो पाते हैं। पूरी रात टैक्सी चलाते हैं। अब बेटे की इसमें क्या ही गलती है। भगवान ने इसे ऐसा ही शरीर दिया है। हम भी सोचते हैं कि भगवान ने कुछ सोचकर ही इसे हमारे घर भेजा है। जब तक हम लोगों से सेवा करवानी है, करवा लेगा, फिर भगवान के पास हमसे पहले चला जाए, यही हमारे लिए अच्छा होगा! इस समय मेरा बेटा हितांशु 18 साल का है, लेकिन इसकी देखभाल 6 महीने के बच्चे से भी ज्यादा करनी पड़ती है। 6 महीने या सालभर का कोई बच्चा बिस्तर पर पेशाब-पॉटी करता है, तो मां-बाप को उसे साफ करना बुरा नहीं लगता, लेकिन 18 साल का बच्चा जब ऐसा करे… तो दिल अंदर तक टूट जाता है। 5 साल पहले हितांशु दोनों हाथों और पैर के सहारे चलता था। फिर उसकी कमर और हाथ-पैर दोनों ने काम करना बंद कर दिया। अब तो हाल यह है कि वह खुद से खिसक भी नहीं सकता। अपने सिर के बाल तक नहीं खुजला सकता। शरीर पर बैठा मच्छर तक नहीं भगा पाता। लेकिन फिर भी कभी-कभी खुद को समझाती हूं- मेरे पास एक औलाद तो है! ऊपर वाले ने मुझे मां बनने का सुख तो दिया है न! गोद तो सूनी नहीं रखी! बहुत परिवार तो औलाद के लिए भी तरस जाते हैं। न जाने किन-किन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। यह व्हीलचेयर पर चले, इसके पापा को अच्छा नहीं लगता। वह कहते हैं- मेरे पास फोर व्हीलर गाड़ी है और यह व्हीलचेयर पर चले, अच्छा नहीं लगता। यह जो भी मांगता है, लाकर देते हैं। एक बार तो इसे मॉल लेकर गए। वहां इसने कह दिया- पापा, क्या आपको मुझे व्हीलचेयर में बिठाकर चलाने में शर्म आती है? लेकिन इसे क्या पता कि हकीकत क्या है? कई बार हम थक-हारकर चुप रह जाते हैं। यह ऐसी बातें हमसे कहता रहता है। हम हां, हां करते रहते हैं। क्या करें। 24 घंटे इसी में कैसे लगे रहें। इसे नहलाना, सुलाना, करवट बदलना, सारी चीजें करना…। बहुत मुश्किल जिंदगी हो चुकी है हमारी। अब यह बिस्तर पर लेटे-लेटे 24 घंटे में से लगभग 16 घंटे छत के पंखे को निहारता रहता है। इसकी आंख से टप-टप आंसू बहते रहते हैं। इसका दिल ही जानता होगा कि यह क्या महसूस कर रहा है। ज्यादा बोलने पर इसका ऑक्सीजन लेवल घटने लगता है। इसलिए हर दिन ऑक्सीजन लेवल और पल्स रेट चेक कराना पड़ता है और अलग से ऑक्सीजन देनी पड़ती है। हर दिन इसके हाथ-पैर की मालिश करनी पड़ती है। अब इसके दोनों पैर तिकोने आकार में मुड़ गए हैं। हाथ भी धीरे-धीरे टेढ़े हो रहे हैं। कमर पूरी तरह से मुड़ चुकी है। बैठाने पर सिर झूलने लगता है। यह सब देखकर मैं टूट जाती हूं। तब इसके पापा एक ही बात कहते हैं, भगवान ने कुछ सोचकर ही इसे हमारे घर भेजा होगा। जितना हो पाए, इसकी सेवा करते रहो। जब तक यह हमारे घर है, इसे किसी चीज की कमी या तकलीफ न होने पाए। हमें पता है कि आने वाले दिनों में हमारे बेटे का क्या हाल होगा। अभी तो उसके हाथ-पैरों ने काम करना बंद किया है। कुछ साल बाद वह ‘जिंदा लाश’ बन जाएगा, बिस्तर पर पड़ा रहेगा। सिर्फ सांस चलेगी। ऐसी जिंदगी किस काम की…। एक मां होकर मैं ये सारी बातें नहीं बोल सकती, लेकिन ये सच है कि ऐसी औलाद भगवान किसी को न दे। बस, अब तो कलेजे पर पत्थर रखकर हर वक्त एक ही दुआ करती हूं- हे ईश्वर, हमसे पहले मेरे बेटे को उठा लेना…। (हितांशु की मां योगिता श्री ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर नीरज झा से साझा किए) ————————————- 1- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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