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40 दिन की जंग के बाद सीजफायर, और हैदराबाद का ईरान से 400 साल पुराना रिश्ता


Iran US War: 8 अप्रैल 2026 को वो हुआ जो दुनिया की कोई ताकत सोच भी नहीं सकती थी, ईरान ने अमेरिका और इजरायल दोनों को एक साथ रोक दिया. 40 दिनों तक चली खूनी जंग के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता में दो हफ्ते का सीजफायर लागू हुआ और ईरान ने जलडमरूमध्य होरमुज को फिर से खोलने पर सहमति दी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऐलान किया कि ईरान ने 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव पेश किया है जो “बातचीत का एक ठोस आधार” है. लेकिन असल कहानी इसके पीछे छिपी है.

28 फरवरी 2026 को इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई शहीद हो गए. ईरान टूटा नहीं, बल्कि और मजबूत होकर खड़ा हुआ. ईरान ने इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जलडमरूमध्य होरमुज को बंद कर दिया जिससे दुनिया भर का तेल व्यापार ठप हो गया और वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल गई. विश्लेषकों के मुताबिक होरमुज को बंद करने का ईरानी फैसला इस जंग का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

ईरानी लोग इस सीजफायर को 1447 साल पहले हुए खैबर के युद्ध से जोड़ रहे

सोशल मीडिया पर ईरानी लोग इस सीजफायर को 1447 साल पहले हुए खैबर के युद्ध से जोड़ रहे हैं. उनका कहना है कि जैसे हजरत अली ने खैबर की जंग में यहूदियों को 40 दिन में हराया था, वैसे ही अली के मानने वालों ने आज फिर 40 दिनों में दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. तेहरान और बगदाद की सड़कों पर जश्न मनाया गया, लोग शहीद आयतुल्लाह खामनेई और उनके बेटे व नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामनेई की तस्वीरें लेकर निकले.

हैदराबाद के शिया स्कॉलर मौलाना अमर हैदराबादी ने सीजफायर का स्वागत करते हुए कहा कि ईरान जुल्म के खिलाफ अपना बचाव कर रहा था. उन्होंने आयतुल्लाह खामनेई की शहादत को याद करते हुए कहा कि ईरान का जो नुकसान हुआ वो पूरा तो नहीं हो सकता, लेकिन खामनेई की कुर्बानी रायगां नहीं गई ईरान ने दोनों के दांत खट्टे कर दिए. मौलाना ने कहा कि यह अच्छा मौका है, बातचीत करके जंग खत्म करनी चाहिए, लेकिन अमेरिका और इजरायल का भरोसा नहीं किया जा सकता  वो किसी भी वक्त सीजफायर का उल्लंघन कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो ईरान जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है. अरब देशों पर टिप्पणी करते हुए मौलाना ने कहा कि उन्होंने साबित कर दिया कि वो बस नाम के मुसलमान हैं, जबकि ईरान ने बता दिया कि सच्चाई की ताकत किसी हथियार से कम नहीं.

इजरायल के अंदर सीजफायर विवादास्पद रहा

इजरायल के अंदर भी यह सीजफायर विवादास्पद रहा. विपक्ष के नेता याइर लैपिड ने इसे इजरायल के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक आपदा करार दिया और नेतन्याहू पर निशाना साधा कि वो बातचीत में शामिल तक नहीं थे. विश्लेषकों का कहना है कि ईरान इस जंग से रणनीतिक रूप से और मजबूत होकर निकला है.

400 साल पुराना ईरान और हैदराबाद का रिश्ता

हैदराबाद और ईरान का रिश्ता सिर्फ आज की राजनीति का नहीं है यह 400 साल से भी ज्यादा पुराना खून का रिश्ता है. 1591 में जब मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने हैदराबाद शहर की नींव रखी तो उनका सपना था कि यह शहर ईरान के मशहूर शहर इस्फहान जैसा खूबसूरत बने. इसीलिए हैदराबाद को “इस्फहान-ए-नौ” यानी नया इस्फहान कहा जाता था.

कुतुब शाही वंश का ईरान से गहरा जुड़ाव था. ईरान के गिलान प्रांत के अस्तराबाद से आए मीर मोमिन अस्तराबादी ने हैदराबाद के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शहर का नक्शा तैयार किया. चारमीनार, जो आज हैदराबाद की पहचान है, इसी ईरानी प्रेरणा की देन है. चारमीनार के चारों ओर बाग लगाए गए जिन्हें चारबाग कहा जाता था. बिल्कुल इस्फहान के मशहूर चारबाग की तर्ज पर. शहर की चौड़ी सड़कें, भव्य महल, बाग-बगीचे सब कुछ फारसी शहरी योजना का शाहकार था.

महदी अली ने बताया कि हैदराबाद का नाम हजरत अली के दूसरे नाम “हैदर” पर रखा गया. कुतुब शाह शिया मुसलमान थे और उनकी हजरत अली से गहरी श्रद्धा थी. उनके सिक्कों पर अलम का निशान था, उन्होंने बादशाही आशूरखाना बनवाया और उनकी कविताओं में हजरत अली और ईद-ए-गदीर की प्रशंसा मिलती है. यही वजह है कि इस शहर को “हैदराबाद” यानी अली का शहर नाम दिया गया.

ईरानी प्रभाव सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं रहा

ईरानी प्रभाव सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं रहा. कुतुब शाही दौर में ईरान से बड़ी संख्या में विद्वान, कलाकार और व्यापारी हैदराबाद आए. ईरानी चाय की संस्कृति ने हैदराबाद को अपना बना लिया  आज भी पुराने शहर की ईरानी चाय की दुकानें उसी परंपरा की जीवित निशानी हैं. बिरयानी, जो हैदराबाद की जान है, उसकी जड़ें भी फारसी “बिरिंज बिरियान” में हैं. सालार जंग म्यूजियम में 5,400 फारसी पांडुलिपियां और ईरानी कालीनों का अनमोल संग्रह इस सांस्कृतिक विरासत की गवाही देता है.

आज जब ईरान पर बम बरस रहे हैं, तो हैदराबाद के शिया समुदाय का दर्द समझा जा सकता है. यह सिर्फ एक देश की जंग नहीं है यह उस शहर के दिल की बात है जिसकी नींव में ईरानी मिट्टी मिली हुई है.



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