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Rajya Sabha Election Cross Voting; NDA Majority | BJP Win Analysis


सोमवार, 16 मार्च को 3 राज्यों की 11 राज्यसभा सीटों पर मतदान हुए। विधायकों ने जमकर क्रॉस-वोटिंग की। इसके चलते ओडिशा में बीजेपी ने 1 एक्स्ट्रा सीट जीत ली। वहीं बिहार में कांग्रेस के 3 और RJD के एक विधायक वोट डालने ही नहीं पहुंचे। इससे बीजेपी की शिवेश र

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फरवरी-मार्च 2026 में राज्यसभा में 10 राज्यों की 37 सीटें खाली हुई थीं, जिनके लिए 40 कैंडिडेट्स ने पर्चा भरा। इनमें से 7 राज्यों के 26 प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए। हरियाणा, बिहार और ओडिशा की 11 सीटों पर वोटिंग हुई थी, जिसमें क्रॉस-वोटिंग का खेल हुआ।

चुनाव के बाद अब राज्यसभा में कौन-सी पार्टी कितनी ताकतवर है, वोटिंग में कैसे खेल हुआ और मोदी सरकार ज्यादा मजबूत कैसे हुई; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…

कैसे होती है राज्यसभा चुनाव की वोटिंग?

किसी राज्य में राज्यसभा की जितनी सीटें खाली हैं, उन पर राज्य के विधायकों की संख्या के हिसाब से वोट डाले जाते हैं। ये फॉर्मूला थोड़ा पेचीदा लग सकता है, इसलिए हरियाणा के एग्जांपल से समझिए…

  • हरियाणा से राज्यसभा की कुल 2 सीटें खाली थीं। यहां विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या 90 है।
  • एक सीट जीतने के लिए जरूरी वोटों की संख्या निकालने के लिए राज्यसभा की खाली सीटों में एक जोड़ना पड़ता है। यानी हरियाणा में ये संख्या हुई 2+1=3
  • अब 90 को 3 से विभाजित करेंगे, जिस पर 30 आता है। इसमें एक जोड़कर कुल संख्या 31 हुई।
  • यानी हरियाणा में एक राज्यसभा प्रत्याशी को जीतने के लिए 31 विधायकों के प्रथम वरीयता के मत चाहिए।
  • इन चुनावों में EVM मशीन का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि बैलेट पेपर पर उम्मीदवार के नाम के आगे वरीयता लिखनी होती है। इसके लिए चुनावकर्मी विधायकों को मतपत्र और पेन देते हैं।
  • हरियाणा में 3 कैंडिडेट हैं, तो विधायक एक से तीन तक की वरीयता का अंक लिख सकते हैं। लेकिन पहली वरीयता लिखना अनिवार्य है।
  • इसके बाद विधायक अपना मतपत्र पार्टी के ऑफिशियल एजेंट को दिखाते हैं। अगर ऐसा नहीं करते या किसी और को मतपत्र दिखाते हैं, तो उनका वोट रद्द हो सकता है। निर्दलीयों के लिए ये जरूरी नहीं।
  • राज्यसभा चुनावों में पॉलिटिकल पार्टियां का व्हिप लागू नहीं होता, भले ही पार्टियां व्हिप जारी करें। इसी के चलते काफी क्रॉस-वोटिंग होती है और नतीजे अनुमान के उलट हैरान करने वाले भी होते हैं।

बिहार में NDA ने कैसी जीतीं पांचों सीट?

बिहार में राज्यसभा की 5 सीटें खाली हुई थीं, जिनके लिए 6 कैंडिडेट्स ने नॉमिनेशन फाइल किया। NDA की ओर से बीजेपी के नितिन नबीन, RLM सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा, JDU के नीतीश कुमार और रामनाथ ठाकुर की जीत पहले से तय थी। लेकिन पेंच फंस गया बीजेपी के शिवेश राम की सीट पर।

दरअसल, RJD की ओर से एडी सिंह ने भी पर्चा भरा और उनका मुकाबला शिवेश कुमार से हुआ….

  • विधायकों की संख्या यानी 243 के हिसाब से बिहार में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 41 वोटों की जरूरत थी।
  • लेकिन वोटिंग के दौरान सिर्फ 239 विधायक ही विधानसभा पहुंचे। इससे राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 40 वोटों की जरूरत पड़ी।
  • इस हिसाब से NDA को पांचों सीट जीतने के लिए 200 वोटों की जरूरत थी और उसके पास 202 विधायक हैं। NDA के सभी विधायकों ने वोट डाला।
  • जबकि विपक्षी खेमे ‘महागठबंधन’ से सिर्फ 37 वोट ही डाले गए। यानी यहीं तय हो गया कि NDA के सभी कैंडिडेट्स जीत जाएंगे।
  • दरअसल, महागठबंधन के 4 विधायक गायब रहे। RJD ने अपने विधायक फैसल रहमान से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो पाई।
  • कांग्रेस के भी 3 विधायक- मनोहर प्रसाद, मनोज विश्वास और सुरेंद्र कुशवाहा विधानसभा ही नहीं पहुंचे। सभी के फोन बंद थे और किसी से बात नहीं हो पाई।
  • नतीजे आए तो नीतीश कुमार और नितिन नवीन को पहली वरियता के 44-44 वोट मिले। रामनाथ ठाकुर और उपेंद्र कुशवाहा को 42-42 वोट मिले।
  • जबकि 5वीं सीट के लिए बीजेपी के शिवेश राम को पहली वरियता के 30 और RJD के एडी सिंह को 37 वोट मिले। लेकिन दूसरी वरियता में शिवेश राम ने एडी सिंह को हरा दिया।
चुनाव जीतने के बाद बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और शिवेश राम। (बीच में)

चुनाव जीतने के बाद बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और शिवेश राम। (बीच में)

ओडिशा में कैसे हुआ क्रॉस वोटिंग का खेल?

ओडिशा से राज्यसभा की 4 सीटें खाली हुई थीं। बीजेपी के मनमोहन सामल और सुजीत कुमार की जीत पक्की थी। वहीं BJD के संतृप्त मिश्रा का भी जीतना तय था।

मुकाबला हुआ बीजेपी समर्थित कैंडिडेट दिलीप राय और BJD के डॉ. दत्तेश्वर होता के बीच…

  • ओडिशा में विधायक हैं 147 और राज्यसभा की सीटें खाली थीं 4। इस हिसाब से एक सीट जीतने के लिए 30 वोट की जरूरत थी।
  • बीजेपी के खुद के 79 विधायक और 3 निर्दलीय विधायकों का सपोर्ट मिला। इसके चलते मनमोहन सामल और सुजीत कुमार जीत गए। इसके बाद बचे 22 वोट और तीसरे कैंडिडेट दिलीप राय को जीतने के लिए 8 वोट और चाहिए थे।
  • मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कम से कम 11 विपक्षी विधायकों ने दिलीप राय के फेवर में क्रॉस-वोटिंग की। इसी के चलते दिलीप राय जीत गए।
  • कांग्रेस के 3 विधायक- रमेश जेना, दशरथी गोमांगो और सोफिया फिरदौस ने क्रॉस वोटिंग की।
  • BJD के डिप्टी चीफ व्हिप प्रताप केशरी देब ने बताया कि 8 विधायकों ने दिलीप राय को वोट दिया है। देवी रंजन त्रिपाठी, सौविक बिस्वार, चक्रमणि कहार, सुभाषिनी जेना समेत 8 BJD विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की।
  • नतीजे आए तो बीजेपी के तीनों कैंडिडेट- मनमोहन सामल, सुजीत कुमार और दिलीप राय ने जीत दर्ज की। वहीं BJD के संतृप्त मिश्रा भी जीतने में कामयाब रहे।
चुनाव जीतने पर मनमोहन सामल और सुजीत कुमार को बधाई देते सीएम मोहन चरण मांझी।

चुनाव जीतने पर मनमोहन सामल और सुजीत कुमार को बधाई देते सीएम मोहन चरण मांझी।

हरियाणा में देर रात क्यों आए नतीजे?

हरियाणा में राज्यसभा की 2 सीटें के लिए चुनाव हुए। बीजेपी ने संजय भाटिया का जीतना पहले से तय था। जबकि बीजेपी समर्थित सतीश नांदल और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौध के बीच मुकाबला हुआ…

  • हरियाणा में 90 विधायक हैं और 2 राज्यसभा की सीटें खाली थीं। इस हिसाब एक सीट जीतने के लिए 31 वोटों की जरूरत थी।
  • लेकिन सिर्फ 88 विधायकों ने ही वोट डाला। इसके बाद जीत के लिए 30 वोट जरूरी हो गए।
  • दरअसल, इंडियन नेशनल लोकदल यानी INLD के दोनों विधायक अर्जुन चौटाला और आदित्य देवीलाल वोटिंग से दूर रहे। INLD सुप्रीमो अभय चौटाला ने कहा कि हमने जनता की आवाज पर ये फैसला लिया।
  • बीजेपी के सभी 48 विधायकों ने वोट डाला। संजय भाटिया की जीत के बाद 18 वोट बचे। दूसरे कैंडिडेट सतीश नांदल को जीतने के लिए 12 वोट और चाहिए थे।
  • लेकिन देर रात तक काउंटिंग टलती रही। क्योंकि बीजेपी ने 2 कांग्रेसी विधायकों- भरत सिंह बेनीवाल और परमवीर सिंह के वोट की सीक्रेसी लीक होने की शिकायत की।
  • ऐसी ही शिकायत कांग्रेस की ओर से बीजेपी के अनिल विज को लेकर की गई। इस बीच चुनाव में गड़बड़ी को लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को लेटर भेजा।
  • चुनाव आयोग ने इन शिकायतों की जांच की, जिसके बाद परमवीर सिंह का वोट रद्द कर दिया। वहीं अनिल विज और भरत सिंह बेनीवाल का वोट वैलिड माना।
  • देर रात वोटों की गिनती शुरू हुई। रात सवा एक बजे नतीजे आए, जिसमें बीजेपी के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौध ने जीत दर्ज की।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को लेटर लिखा- सही वोट अयोग्य ठहराना सही नहीं है। इस मामले में दखल देने की जरूरत है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को लेटर लिखा- सही वोट अयोग्य ठहराना सही नहीं है। इस मामले में दखल देने की जरूरत है।

नियम होने के बावजूद क्रॉस-वोटिंग पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

बिहार, ओडिशा और हरियाणा में विधायकों ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार को छोड़ दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को वोट दिए। जबकि यहां पार्टियों ने व्हिप जारी किए थे, लेकिन राज्यसभा चुनाव में व्हिप लागू नहीं होता। विधायक अपने विवेक से वोट कर सकते हैं, लेकिन इसमें एक पेंच है।

राज्यसभा चुनाव में ओपन वोटिंग होती है। यानी विधायकों को मतपत्र पर वरीयता भरने के बाद अपनी पार्टी के तय एजेंट को उसे दिखाना होता है। जो विधायक ऐसा नहीं करते या किसी अन्य व्यक्ति को मतपत्र दिखाते हैं, तो उनका वोट कैंसिल हो सकता है। वहीं जो विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ जाते हैं, उन्हें पार्टी से निकालने का प्रावधान है।

इसके लिए पॉलिटिकल पार्टी को एक एप्लीकेशन विधानसभा के स्पीकर को देना होता है और उस विधायक की सदस्यता रद्द कर दी जाती है। ऐसे में ये कहना कि राज्यसभा चुनाव में दूसरे दल के उम्मीदवार को वोट करने पर कार्रवाई नहीं होती है, ये सही नहीं है। लेकिन पार्टियां ऐसा करने से बचती हैं।

2003 में बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ओपन वोटिंग का प्रावधान इसीलिए बनाया था, ताकि विधायक दूसरे दलों से पैसा लेकर राज्यसभा चुनाव में वोट नहीं करें।

NDA को राज्यसभा में फिर से बहुमत मिलने से कैसे मजबूत होगी मोदी सरकार?

राज्यसभा में बीजेपी के 106 सांसदों के साथ अब NDA के कुल सांसदों की संख्या 140 हो गई है। यानी NDA को फिर से बहुमत मिल गया। इसके चलते केंद्र की मोदी सरकार और मजबूत होगी।

कोई बड़ा बिल पास कराने के लिए अब उसे BJD, YSRCP या निर्दलीय सांसदों की जरूरत नहीं पड़ेगी। NDA के सांसद इसके लिए काफी होंगे। विपक्ष के वॉकआउट या विरोध के बावजूद बिल अटकेंगे नहीं।

हालांकि बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA को पिछले 2 साल से राज्यसभा और लोकसभा में बहुमत हासिल है।

इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा का चुनाव इस तरह से होता है कि लोकसभा और राज्यसभा में किसी एक दल को एक समय पर स्पष्ट बहुमत मिलना मुश्किल होता है।

अगर किसी बड़ी पार्टी के पास बहुमत है तो इसका फायदा यह है कि सरकार को क्षेत्रीय दलों या निर्दलीय सांसदों के समर्थन के बदले उनकी अनुचित मांगों के सामने झुकना नहीं पड़ता।

हालांकि इसका नकारात्मक पहलू भी है। जब किसी एक दल के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगहों पर बहुमत हो तो संसदीय कामकाज में आम सहमति बनाने की स्थिति कम हो जाती है। बड़ी पार्टी अपने मन से फैसला लेती है। वह छोटे और दूसरे दलों से सलाह नहीं लेती है। यह लोकतंत्र के लिए सेहतमंद स्थिति नहीं है।

1989 तक कांग्रेस पार्टी के पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत होता था। तब ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी।

लेकिन 1989 के बाद की सभी सरकारों को राज्यसभा में अहम बिल पास कराने में छोटे दलों को साधना पड़ा है या विपक्षी दलों के साथ मिलकर आम सहमति बनानी पड़ी है।

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