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मेरी कहानी एक साधारण स्पोर्ट्स कोच की नहीं, उस पिता की है, जिसने अपने दोनों अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बच्चों को खो दिया… लेकिन खेल और सपने को मरने नहीं दिया। 2004 में नेशनल चैंपियन तीरंदाज बेटी वोल्गा एक सड़क हादसे में चली गई। अकादमी बंद हो गई। परिवार बिखरने लगा। उसके बाद बेटे लेनिन ने MBBS छोड़ धनुष उठा लिया- अपने लिए नहीं, मेरे और अपनी बहन के अधूरे सपने के लिए। धीरे-धीरे वह इंटरनेशनल खिलाड़ी बना, कोच बना और अकादमी को फिर से खड़ा किया। लेकिन 2010 में, जिस दिन उसे राज्य सम्मान मिला, उसी दिन लौटते वक्त रास्ते में एक सड़क हादसे में उसकी भी मौत हो गई। बाद में, 55 साल की उम्र में मैं फिर पिता बना। बेटी शिवानी पैदा हुई। मैंने दो साल की उम्र में ही उसके हाथ में धनुष थमा दिया। आज वह भी इंटरनेशनल खिलाड़ी बन चुकी है। अब यही कहूंगा- ‘मेरा बेटा लेनिन गया नहीं… वह शिवानी के रूप में जिंदा है।’ मैं सत्यनारायण चेरूकुरी हूं। ‘चेरूकुरी वोल्गा आर्चरी अकादमी’ चलाता हूं। 1959 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के नंदीवाड़ा गांव में पैदा हुआ। हम कुल पांच भाई-बहन थे- दो भाई और तीन बहनें। वक्त के साथ सब छूटते चले गए… और अब मैं ही अकेला बचा हूं। उस वक्त हमारा इलाका हर साल बाढ़ से जूझता था। खेती पर निर्भर परिवार के लिए हालात आसान नहीं थे- हर साल कुछ न कुछ उजड़ जाता था। इसी वजह से, 1964 में मेरी नानी के कहने पर पूरा परिवार विजयवाड़ा आ गया। यहां हालात थोड़ा संभले। नानी ने पिता को एक बैलगाड़ी दिला दी, जिससे उन्होंने सामान ढोने का काम शुरू किया। घर चलने लगा। पिता सिर्फ किसान या मजदूर नहीं थे, उन्हें नाचने का भी शौक था। शायद वहीं से मेरे अंदर भी कला और खेल दोनों का बीज पड़ा। पिता चाहते थे कि मैं कुचिपुड़ी डांसर बनूं। उनके कहने पर मैंने बाकायदा डांस सीखना शुरू भी किया। इस समय तक आंध्र में डांस में भी मेरी एक पहचान बन चुकी थी। सब ठीक चल रहा था, लेकिन तभी शादी हो गई… और फिर धीरे-धीरे डांस छूट गया। जिंदगी ने जैसे उस मोड़ पर एक अलग दिशा पकड़ ली। डांस छूटने के बाद मेरा झुकाव छात्र राजनीति की तरफ बढ़ा। उस दौर में मैं सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़ा और संगठन के काम में लगातार सक्रिय रहा। इसी सिलसिले में मुझे लंबे समय तक रूस में रहने का मौका मिला। रूस में सोच बदलने वाला दौर था। वहां मैंने लेनिन को पढ़ा और धीरे-धीरे उनसे प्रभावित होता चला गया। वहां अक्सर कहा जाता कि ‘लेनिन’ का मतलब लिखने वाला पेन होता है। उसी समय मन में एक बात बैठ गई- अगर कभी बेटा हुआ, तो उसका नाम लेनिन रखूंगा। कुछ साल बाद जब मैं वापस भारत लौटा, तो जिंदगी अपने सामान्य ढर्रे पर लौट आई। पहले मुझे बेटी पैदा हुई। उसका नाम मैंने वोल्गा रखा और उसके डेढ़ साल बाद बेटा हुआ। उसका नाम लेनिन रखा। इधर, पार्टी के काम के सिलसिले में मेरा जंगलों और आदिवासी इलाकों में भी आना-जाना लगा रहता। कई बार वहां दिनों-दिन रुकना पड़ता। वहीं मैंने पहली बार तीरंदाजी को करीब से देखा। धीरे-धीरे मैंने भी तीर चलाना सीख लिया। जब घर लौटा, तो लगा कि जो सीखा है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए। मैंने लेनिन को भी तीरंदाजी सिखाने की कोशिश की। लेकिन उस समय उसकी दिलचस्पी कुचिपुड़ी डांस में ज्यादा थी। वह उसी में मशगूल रहता था। हां, बीच-बीच में शौक के तौर पर तीर पकड़ लेता था। लेकिन एक बात साफ थी- लेनिन के जन्म के साथ ही मैंने एक सपना देख लिया था कि उसे तीरंदाजी में आगे ले जाना है। सिर्फ खेलने तक नहीं, बल्कि एक दिन उसे इंटरनेशनल खिलाड़ी और कोच के रूप में देखना है। इसी सोच के साथ 1997 में मैंने छह बच्चों के साथ ‘कृष्णा डिस्ट्रिक्ट आर्चरी अकादमी’ शुरू की। लेनिन और वोल्गा- दोनों वहीं प्रैक्टिस करने लगे। हालांकि उस वक्त तक लेनिन ने तय नहीं किया था कि वह तीरंदाजी को करियर बनाएगा। वह डांस में भी उतना ही जुड़ा हुआ था। फिर 2000 में एक मोड़ आया। स्कूल गेम्स में लेनिन ने तीरंदाजी में नेशनल चैंपियनशिप जीत ली। यहीं से मैंने ठान लिया- अब इसे इसी में आगे बढ़ाना है। मैंने उस समय देश के जाने-माने कोच लिंबा राम और मंगल सिंह को अकादमी से जोड़ा। उनसे कहा- लेनिन को तैयार करना है। ट्रेनिंग शुरू हुई। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। 2003 तक वह यूनिवर्सिटी चैंपियन बन चुका था। नाम बनने लगा था। लेकिन घर के अंदर एक अलग ही बात चलती थी। मेरी बेटी वोल्गा चाहती थी कि उसका भाई डॉक्टर बने। दोनों में डेढ़ साल का ही फर्क था, लेकिन रिश्ता बहुत गहरा था। वोल्गा को जो भी चाहिए होता- वह मुझसे नहीं, सीधे लेनिन से कहती थी। उसे थम्स अप पीना बहुत पसंद था। लेनिन उसे मना करता, डांटता भी था… लेकिन फिर खुद ही जाकर लाता था। पॉपकॉर्न, चिकन- सब वही लाता था उसके लिए। असल में, वोल्गा के लिए लेनिन सिर्फ भाई नहीं- उसका सबसे भरोसेमंद साथी था। और इस दौरान वोल्गा खुद भी पीछे नहीं थी। 2004 तक वह अंडर-14, 17 और 19 कैटेगरी में खेल चुकी थी। पांच बार गोल्ड मेडल जीत चुकी थी। तीरंदाजी में नेशनल चैंपियन थी। घर में एक तरफ मेरा सपना था- लेनिन तीरंदाजी में आगे बढ़े और दूसरी तरफ वोल्गा का सपना- भाई डॉक्टर बने। दोनों अपने-अपने तरीके से एक-दूसरे के लिए जी रहे थे। लेनिन मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी भी कर रहा था। वह वोल्गा का सपना पूरा करना चाहता था- डॉक्टर बनने का। लेकिन 29 नवंबर 2004 को सब कुछ अचानक रुक गया। दोपहर करीब साढ़े 12 बजे का वक्त था। मैं और लेनिन स्टेडियम में थे। बच्चे प्रैक्टिस कर रहे थे। मैं उन्हें तीर पकड़ने का तरीका समझा रहा था। सब कुछ सामान्य था। तभी फोन आया। उधर से मेरी पत्नी की रोने की आवाज थी। उन्होंने बस इतना कहा- ‘जल्दी घर आओ… वोल्गा…’ आवाज साफ नहीं थी, लेकिन बात समझ आ गई- कुछ गंभीर हुआ है। मैंने लेनिन की तरफ देखा और कहा, ‘चलो, घर चलते हैं।’ हम तुरंत स्टेडियम से निकले। रास्ते भर मन में एक ही सवाल था- क्या हुआ होगा? घर के पास पहुंचे तो भीड़ दिखी। दिल बैठ गया। मैं भागते हुए अंदर गया। लेनिन पीछे था। अंदर देखा- वोल्गा जमीन पर पड़ी थी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। कुछ ही देर में साफ हो गया- वह नहीं रही। कॉलेज से स्कूटी पर लौट रही थी। घर से थोड़ी ही दूरी पर बस ने टक्कर मार दी। मौके पर ही मौत हो गई। सुबह जाते वक्त बस इतना कहा था- ‘पापा, कॉलेज जा रही हूं… शाम को ग्राउंड चलेंगे।’ वह रोज की तरह ही गई थी। लेकिन उस दिन… वह शाम कभी नहीं आई। वोल्गा के जाने के बाद कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकादमी बंद कर दी। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। मेरी पत्नी वोल्गा को याद कर-करके रोतीं। मैं उन्हें संभालने की कोशिश करता, लेकिन खुद भी भीतर से टूट चुका था। लेनिन सबसे ज्यादा बदला हुआ दिख रहा था। वह लगभग चुप हो गया था। कम बोलता था। बस कभी-कभी पूछता- ‘पापा, ये क्या हो गया… भगवान दीदी को क्यों ले गए?’ इन सबके बीच भी लेनिन ने तीरंदाजी नहीं छोड़ी। वह प्रैक्टिस के लिए जाता रहा। शायद वही उसका सहारा था। कुछ दिन बाद उसका एमबीबीएस में एडमिशन हो गया। उसने पढ़ाई शुरू कर दी। लेकिन घर का सन्नाटा बना रहा। करीब दो साल तक हम पति-पत्नी घर से बाहर नहीं निकले। न किसी से मिलना, न बात करना। घर में पहले जो आवाजें थीं- हंसी, नोक-झोंक, सब खत्म हो गई। इसी बीच लेनिन ने एक दिन साफ कहा- ‘पापा, मैं एमबीबीएस नहीं करूंगा। मैं तीरंदाजी करना चाहता हूं। हमें फिर से अकादमी शुरू करनी चाहिए।’ उस दिन वह हमें अकादमी ले गया। पहले दिन अकादमी पहुंचे तो सब सूना था। मैदान खाली पड़ा था। कुछ पुराने टारगेट धूल में पड़े थे। लेनिन ने खुद जाकर तीर-कमान उठाए। कुछ बच्चों को बुलाया, जो पहले यहां आते थे। धीरे-धीरे 4-5 बच्चे आ गए। वह उन्हें लाइन में खड़ा करता, तीर पकड़ने का तरीका बताता। खुद डेमो देता। ‘ऐसे पकड़ो… ध्यान सीधा रखो…’ मैं और मेरी पत्नी एक तरफ खड़े देख रहते थे। थोड़े दिन में उस मैदान में फिर से आवाजें सुनाई दे रही थीं- तीर के लगने की आवाज, बच्चों की हलचल। अकादमी फिर चल पड़ी। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे… और वह जगह फिर से जिंदा होने लगी। अकादमी दोबारा शुरू हुई, तो लेनिन ने एक और फैसला लिया। उसने कहा- अब इसका नाम ‘वोल्गा आर्चरी अकादमी’ होगा। उसका तर्क साफ था- ‘वोल्गा को दुनिया जानेगी। उसका नाम यहीं से जिंदा रहेगा।’ और उसी नाम से अकादमी चलने लगी। इसके बाद लेनिन पूरी तरह इसमें जुट गया। खुद भी ट्रेनिंग लेता और छोटे बच्चों को सिखाता। सुबह से शाम तक मैदान में रहता। धीरे-धीरे असर दिखने लगा बच्चे बढ़ने लगे। पुराने खिलाड़ी लौटे। कुछ नए जुड़े। अकादमी फिर से नेशनल लेवल तक खिलाड़ियों को भेजने लगी। इसी दौरान उसने एक बड़ा फैसला लिया। एमबीबीएस छोड़ दिया। वह जानता था कि तीरंदाजी मेरे लिए सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। शायद यह भी समझ गया था कि मैं अब अकेले इसे संभाल नहीं पाऊंगा। उसने कुचिपुड़ी डांस भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे उसने अपने सारे रास्ते समेटकर एक ही दिशा चुन ली- तीरंदाजी की। असल में, वह सिर्फ अपना करियर नहीं बना रहा था। वह मेरा सपना और वोल्गा की याद- दोनों को साथ लेकर चल रहा था। 2005 तक हालात पूरी तरह बदल चुके थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चे यहां आने लगे थे। उधर, लेनिन खुद भी आगे बढ़ रहा था। केरल में उसने नेशनल चैंपियनशिप जीती। आंध्र प्रदेश के लिए गोल्ड मेडल लाया और फिर- उसका चयन इंडियन टीम में हो गया। अब वह सिर्फ कोच का बेटा नहीं, खुद एक उभरता हुआ इंटरनेशनल खिलाड़ी बन गया था। बेटी के जाने के बाद घर में सन्नाटा था, लेकिन अब पूरा ध्यान लेनिन पर था। वही उम्मीद था। वही सहारा। धीरे-धीरे हम तीनों- मैं, मेरी पत्नी और लेनिन वोल्गा की याद के साथ उसी सपने को जीने लगे। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। कम उम्र में ही उसकी पहचान बनने लगी। महज 18 साल की उम्र में वह लेवल-3 कोच बन गया। तीरंदाजी की टेकनीक ‘कंपाउंड बो’ में उसका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। नेशनल जीता, फिर इंटरनेशनल सर्किट में नाम बना। वह सिंगापुर गया, वहां ट्रेनिंग ली। वहीं के एक कोच ने मुझसे कहा था- ‘लेनिन बहुत आगे जाएगा।’ उस वक्त यह बात हौसला देती थी… और बाद में सच भी साबित हुई। 2010 तक आते-आते लेनिन एक जाना-माना खिलाड़ी था। उसी साल कॉमनवेल्थ गेम्स में हमारे अकादमी के खिलाड़ियों ने सिल्वर मेडल जीते। राज्य सरकार ने 23 सितंबर को हैदराबाद में उसे सम्मानित करने के लिए बुलाया। कार्यक्रम खत्म हुआ। बारिश तेज थी। हम कार से विजयवाड़ा लौट रहे थे। विजयवाड़ा में हजारों लोग उसके स्वागत के इंतजार में थे। शाम करीब 4:40 बजे थे। विजयवाड़ा से कुछ दूरी पहले अचानक सामने एक ऑटो ने यू-टर्न लिया। लेनिन गाड़ी चला रहा था। उसने बचाने की कोशिश की, ब्रेक मारी… गाड़ी उछली… और कुछ सेकंड में सब खत्म हो गया। लेनिन दूर जा गिरा। मौके पर ही उसकी मौत हो गई। मैं भी घायल था। सिर में चोट थी, हाथ टूट गया था… लेकिन उससे बड़ा झटका यह था कि जिस दिन उसे सम्मान मिला, उसी दिन वह चला गया। 24 साल का मेरा बेटा, जो देश के लिए खेल रहा था… नहीं रहा। उसने अपने छोटे से करियर में बहुत कुछ किया था। नेशनल चैंपियन रहा, इंडियन टीम का हिस्सा रहा। रेलवे में नौकरी मिली और सबसे अहम- अकादमी को खड़ा किया। अब जब मैं अकादमी में देखता, तो हर कोना उसकी याद दिलाता है। उसके जाने के बाद एक पल को लगा- सब खत्म हो गया। लेकिन फिर एक सवाल सामने था- जो बच्चे यहां सीख रहे हैं, उनका क्या होगा? मैंने उसी दिन तय किया- अकादमी बंद नहीं होगी। जिस दिन लेनिन की मौत हुई… उसी दिन मैं अकादमी गया। काम किया। शाम को बच्चे मेरे पास आए। बोले- ‘सर, हम सब लेनिन हैं… आप अकेले नहीं हैं।’ उनकी बात सुनकर लगा- शायद यही रास्ता है। उस दिन के बाद अकादमी एक दिन के लिए भी बंद नहीं हुई। लेकिन लेनिन के जाने के बाद दोबारा हिम्मत मेरी पत्नी ने दी। उसने कहा कि अब घर में नहीं रहना है। पहले हम अकादमी से थोड़ा दूर रहते थे। लेनिन के जाने के बाद मैं और मेरी पत्नी अकादमी में ही शिफ्ट हो गए। हम यहीं रहने लगे। पत्नी ने कहा कि अकादमी के बच्चे अब हमारे बच्चे हैं। फिर वोल्गा और लेनिन दोनों के नाम की जायदाद मैंने अकादमी में लगा दी। लेनिन को गए करीब डेढ़ साल हो चुके थे। घर और अकादमी- दोनों ही जैसे चुप थे। उसी दौरान एक दिन मेरी पत्नी ने कहा- उसे बच्चा चाहिए। मेरी उम्र 55 साल थी। एक पल को लगा- क्या यह सही समय है? लेकिन फिर लगा, शायद यही आगे बढ़ने का रास्ता है। मैंने हां कह दी। 2012 में हमारे घर शिवानी पैदा हुई। शुरू से ही उसमें कुछ अलग था। मैं उसे देखता… तो बार-बार लेनिन याद आता। धीरे-धीरे यह एहसास और गहरा होता गया- उसके हाव-भाव, चलने का तरीका, खेलने का अंदाज… सब कुछ कहीं न कहीं लेनिन जैसा लगता। दो साल की हुई, तो मैंने उसके हाथ में धनुष दे दिया। यह कोई तय फैसला नहीं था, बस यूं ही। उसने उसे पकड़ लिया… और फिर छोड़ना नहीं चाहा। वह इसी अकादमी में पली-बढ़ी। मैदान, टारगेट, तीर- यही सब उसके खिलौने थे। समय के साथ उसने अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है। आज वह अंडर-9 तीरंदाजी में देश की चैंपियन है और अंडर-12 और अंडर-14 में विश्व चैंपियान तीरंदाज। अमेरिका और जर्मनी से लोग उस पर डॉक्युमेंट्री बनाने भी आए। अब वह आगे की तैयारी कर रही है। टारगेट है- ओलंपिक मेडल लाना। मैं अक्सर कहता हूं- मुझे शिवानी नहीं, उसमें लेनिन दिखाई देता है। मेरे दो बच्चे चले गए… लेकिन मेरे लिए लेनिन कहीं गया नहीं। वह हर दिन यहीं है- शिवानी की आदतों में, उसकी मेहनत में, उसके खेल में। शायद इसलिए मैं अब पीछे मुड़कर ज्यादा नहीं देखता। बस एक ही बात दिमाग में रहती है- लेनिन का नाम आगे बढ़ाना है। लेकिन इस वक्त मेरे साथ सदमा देने वाली बात हुई है। मेरी अकादमी से तैयार अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को कुछ कोच ने पैसे देकर खरीद लिया है। उन चैंपियन ने पैसे लेकर उन्हें अपना कोच बता दिया है, जबकि उनका कोच मेरा बेटा लेनिन था। मैंने इस मामले को अदालत में चुनौती दी है। मेरा मन बहुत दुखी हुआ जब गुरु-शिष्या की परंपरा को तोड़कर कुछ लोग पैसों के लिए बिक गए। दुखी होता हूं जब वे इंटरव्यू में लेनिन की बजाय किसी और का नाम लिया जाता है। (सत्यानाराण चेरूकुरी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) 1- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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