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केरलम का त्रावणकोर इलाका। एक ब्राह्मण पुरुष तैयार होकर नायर बस्ती में जाता है। वहां एक घर के बाहर नहाता है। कपड़े बदलता है। एक अन्य ब्राह्मण उसे खाना परोसता है। फिर वह चप्पल उतारकर अंदर चला जाता है, जहां एक महिला उसका इंतजार कर रही होती है। जब महिला का पति लौटता है और उसे घर के बाहर एक आदमी की चप्पल दिखती है, तो बिना कुछ कहे वापस लौट जाता है। क्योंकि वो समझ जाता है कि उसकी पत्नी एक नंबुदरी ब्राह्मण पुरुष के साथ संबंधम में है। ये किस्सा केरलम की दशकों पुरानी परंपरा ‘संबंधम’ का है, जिसमें नंबूदरी ब्राह्मण नायर महिलाओं से शारीरिक संबंध बना सकते थे। अभी केरलम में चुनाव होने वाले हैं। आज कहानी इसी ‘संबंधम’ परंपरा की…
एक से ज्यादा पुरुषों से संबंध बना सकती थीं नायर महिलाएं शादी के बाद भी पत्नी को घर नहीं ले जाते नंबूदरी ब्राह्मण कोच्चि के राजा का 16 साल की लड़की से संबंधम संबंधम, शोषण है या मातृसत्ता का प्रतीक? केरलम से कांग्रेस के लोकसभा सांसद और लेखक शशि थरूर संबंधम पर लिखते हैं, ‘नायर समाज के पुरुष तब ही अपनी पत्नियों के पास जा सकते थे, जब उनके घर के बाहर किसी और पुरुष की चप्पल उतरी हुई न रखी हो।’ CPI(M) की पूर्व सांसद सुभाषिनी अली संबंधम को नायर महिलाओं का शोषण और जातीय भेदभाव बताती हैं। वो कहती हैं, ’नायर परिवारों में घर के बाहर एक जगह होती थी- मड़म। नंबूदरी पुरुष पहले यहां आते। एक निचले दर्जे का पंडित उनके लिए खाना बनाता। मड़म में पुरुष खाना खाते, नहाते और कपड़े बदलते। फिर नायर महिला के कमरे में जाते। उनके परिवार के किसी और सदस्य को नहीं छूते। न ही संबंधम से जन्में बच्चों को हाथ लगाते।’ हालांकि, सभी इतिहासकार ऐसा नहीं मानते। कुछ का कहना है कि संबंधम परंपरा नायर जाति में मातृसत्ता और महिलाओं की आजादी का प्रतीक थी। इतिहासकार के. एम. पणिक्कर के मुताबिक, बहुविवाह के रिकॉर्ड 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच अंग्रेजों ने दर्ज किए हैं। इन्हें नायरों के घर के 60 गज, यानी 200 फीट के दायरे में आने की भी इजाजत नहीं थी, इसलिए यह रिकॉर्ड भरोसेमंद नहीं है। उस समय के मलयाली साहित्य में बहुविवाह का कोई जिक्र नहीं है। 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश अफसर डॉ. फ्रांसिस बुचानन जब सर्वे के लिए केरलम पहुंचे तो उन्होंने संबंधम के बारे में लिखा- नायर महिलाएं अपने प्रेमियों में अनेक ब्राह्मणों, राजाओं और उच्च कुल के पुरुषों के होने पर गर्व करती थीं। हालांकि केरलम के इतिहासकार नंदकुमार इसे महिलाओं की आजादी बताते हैं। वे कहती हैं कि उस वक्त की महिलाएं अपना साथी खुद चुन सकती थीं। उन्हें शादी के बाद अपना घर और नाम नहीं छोड़ना पड़ता था। पुरुष खुद उनके घर आते करते थे। क्या संबंधम नस्ल सुधारने की तकनीक? सुभाषिनी अली बताती हैं कि RSS के दूसरे सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर ने संबंधम को नस्ल सुधारने का प्राचीन तरीका बताया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम के मुताबिक, 17 दिसंबर 1960 को गुजरात यूनिवर्सिटी में दिए भाषण में गोलवलकर ने ये बात कही थी। गोलवलकर ने कहा… RSS के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के जनवरी 1961 के एडिशन में भी इस भाषण का जिक्र है। ब्रिटिश मिशनरी के आने से संबंधम पर रोक लगी आज की राजनीति पर संबंधम का कोई असर है? संबंधम परंपरा में दो किरदार थे- नायर और नंबूदरी ब्राह्मण। दशकों पहले शूद्र माने जाने वाली नायर जाति आज सामान्य वर्ग में आती है। केरलम में नायर करीब 15% हैं। वहीं ब्राह्मण करीब 2% हैं। इनमें नंबूदरी सिर्फ 1% हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि केरलम की राजनीति में संबंधम का भले ही सीधा असर न दिखे, लेकिन ऐसी परंपराओं ने लोगों के बीच जातिगत खाई पैदा कर दी है। इसका इस्तेमाल पॉलिटिकल पार्टियां नायरों को साधने के लिए करती हैं। ——– केरलम की यह अनोखी परंपरा भी पढ़िए… ब्रेस्ट ढंकने के लिए टैक्स देती थीं केरलम की महिलाएं:विरोध में नंगेली ने अपने स्तन काट लिए; आज भी 50+ सीटों पर इसका असर साल 1803 यानी आज से करीब 223 साल पहले। केरलम के चेरथला नगर में ऐझावा जाति की एक मजदूर महिला की झोपड़ी के सामने राजमहल से एक टैक्स जमा करने वाला पहुंचा। महिला ने उसे वहीं रुकने के लिए कहा और झोपड़ी में चली गई। कुछ मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तो उसके सीने से दोनों स्तन कटे हुए थे। उसने खून से लथपथ स्तनों को एक पत्ते पर रखकर टैक्स कलेक्टर की तरफ बढ़ा दिए। पूरी खबर पढ़िए…
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