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क्या असम में चाय बागान मजदूर बिगाड़ेंगे BJP का खेल: 10 साल में 154 रुपए बढ़ी दिहाड़ी, ST दर्जा नहीं, खतरे में 45 सीटें


24 साल के परदुम ताती डिब्रूगढ़ के चाय बागान में काम करते हैं। उनके माता-पिता भी यहीं काम करते थे। परदुम पुलिस में नौकरी करना चाहते थे, लेकिन परिवार के हालात ने बागान पहुंचा दिया। यहां मिलने वाली दिहाड़ी से खुश नहीं हैं। हालात पूछते ही भावुक हो जाते ह

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असम में लगभग 8 लाख से ज्यादा वर्कर्स चाय बागान में काम करते हैं। दिहाड़ी के नाम पर उन्हें रोज के महज 280 रुपए मिलते हैं। पिछले 10 सालों में दिहाड़ी सिर्फ 154 रुपए बढ़ी है। महिलाएं बागान में टॉयलेट जैसी बेसिक सुविधा न होने की शिकायत करती हैं। वर्कर की नाराजगी टी ट्राइब्स को अनसूचित जाति (ST) में शामिल न करने को लेकर भी है।

126 विधानसभा सीटों वाले असम की लगभग 45 सीटों पर चाय बागान मजदूरों का सीधा असर है। असम की सत्ता का रास्ता इन्हीं बागानों से होकर निकलता है। 9 अप्रैल को यहां चुनाव हैं। ऐसे में चाय मजदूरों के क्या मुद्दे हैं, वे किन हालात में हैं, ये जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम डिब्रूगढ़ के चाय बागान पहुंची।

दुनियाभर की चाय का 13% हिस्सा अकेले असम के बागानों से पहुंचता है। भारत में पैदा होने वाली चाय का 50% हिस्सा असम से आता है। इसमें भी डिब्रूगढ़ जिला सबसे आगे है।

दुनियाभर की चाय का 13% हिस्सा अकेले असम के बागानों से पहुंचता है। भारत में पैदा होने वाली चाय का 50% हिस्सा असम से आता है। इसमें भी डिब्रूगढ़ जिला सबसे आगे है।

बागान से बाजार तक 24 घंटे में पहुंचती हैं पत्तियां डिब्रूगढ़ शहर से 20 किलोमीटर दूर हम ढलाजन सब डिवीजन के कनाई गांव पहुंचे। यहां मोकलबाड़ी टी एस्टेट कंपनी का चाय बागान है। सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक काम होता है। बड़े बागानों में लगभग 12 से 14 हेक्टेयर के करीब 14 सेक्शन होते हैं।

एक सेक्शन में कुल 60 से 70 लोग काम करते हैं। महिला और पुरुषों के सेक्शन अलग हैं। ऐसे करीब एक बागान में कुल 800 मजदूर काम करते हैं। हर सेक्शन में मजदूरों से काम कराने वाली एक महिला और एक पुरुष केयरटेकर यानी सरदार होता है। करीब 24 घंटे में बागानों से निकली पत्तियां पैक होकर बिकने के लिए रेडी हो जाती हैं।

बागान से रोज पत्तियां फैक्ट्री भेजी जाती हैं, जहां 15 से 16 घंटे सुखाने के बाद उन्हें प्रोसेस कर पैकिंग के लिए भेजा जाता है।

बागान से रोज पत्तियां फैक्ट्री भेजी जाती हैं, जहां 15 से 16 घंटे सुखाने के बाद उन्हें प्रोसेस कर पैकिंग के लिए भेजा जाता है।

मजदूरों की 3 मांगें- दिहाड़ी, जमीन का हक और ST दर्जा बाग में काम करते मिले परदुम कम दिहाड़ी मिलने से नाराज हैं। वे शिकायत करते हुए कहते हैं, ‘अगर पढ़ा-लिखा होता, तो कहीं और नौकरी करता। अभी दिहाड़ी 250 से बढ़ाकर 280 रुपए कर दी लेकिन फिर भी कम है। हमने डिब्रूगढ़ में आंदोलन करके 551 रुपए की मांग की थी, लेकिन पूरी नहीं हुई।‘

परदुम बीते 3 साल से चाय बागान में काम कर रहे हैं। 4 साल पहले मां गुजर गईं। बुजुर्ग पिता काम नहीं कर सकते इसीलिए वो घर में अकेले कमाने वाले हैं। चुनाव को लेकर परदुम साफ कहते हैं, ‘हमारी तीन मांगें हैं। दिहाड़ी बढ़ाई जाए, जमीन का हक मिले और ST का दर्जा दिया जाए। जो ये मांगें पूरी करेगा, हम उसी का समर्थन करेंगे।‘

प्लांटेशन लेबर एक्ट के तहत 1 अप्रैल से पहले मजदूरों को 250 रुपए दिहाड़ी मिलती थी। हिमंता सरकार ने 30 रुपए बढ़ाकर इसे 280 रुपए कर दिया। केरलम में भी 1 अप्रैल को टी वर्कर्स की दिहाड़ी 48 रुपए बढ़ाकर 546 रुपए कर दी गई है। ये असम के मुकाबले लगभग दोगुनी है।

वर्कर्स की हालत पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और ग्लोबल लिविंग वेज कोलीशन (GLWC) नजर रखते हैं। GLWC की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, असम के चाय बागान वाले इलाकों में परिवार का पेट पालने के लिए एक मजदूर की मंथली इनकम कम से कम 15,000 रुपए होनी चाहिए, जबकि अभी ये करीब 8 हजार रुपए है।

न बीमा-न कोई सुविधा, छतों से पानी टपकता है आकाश नायक बागान में काम करते हैं और असम चाय मजदूर संघ से भी जुड़े हैं। वे शिकायत करते हैं कि कंपनी ने कोई बीमा नहीं कराया और न ही कोई खास सुविधाएं दी हैं। रहने के लिए मिले क्वार्टर की हालत भी खराब है। छतों से पानी टपकता है और दीवारें फटी हुई हैं, लेकिन कंपनी मरम्मत नहीं करवाती। आकाश आने वाले चुनाव में ‘चाय जनजाति’ की मांग को सबसे जरूरी बताते हैं।

असम के जंगलों को साफ करके अंग्रेजों ने यहां चाय के बागान लगाए और काम करने के लिए कुछ लोगों को लाकर बसाया था। इन्हें असम में टी ट्राइब या चाय जनजाति कहा जाता है। तब से इनकी पीढ़ियां यहीं रह रही हैं। राज्य में इनकी आबादी करीब 70 लाख है यानी करीब 20% हिस्सेदारी है। असम के 10 जिलों की 45 विधानसभा सीटों पर टी-ट्राइब हार-जीत तय करते हैं।

असम चाय बागान यूनियन के असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी लखींद्र कुर्मी ST के दर्जे को सबसे बड़ी मांग बताते हैं। वे कहते हैं, ‘झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उरांव, मुंडा, संथाल और खड़िया जैसी हमारी जातियों को ST दर्जा हासिल है। असम के चाय बागानों में हम उसी स्थिति में रह रहे हैं। हम प्रकृति के पुजारी हैं। हमारी कुल 108 उप-जातियां हैं, जिनमें सिर्फ 36 को ST दर्जा मिला है।’

अब महिला वर्कर्स की बात… टॉयलेट नहीं, खुले में जाने को मजबूर असम के बागानों में करीब 60% महिला वर्कर्स हैं। पत्तियां तोड़ने का काम उन्हीं के जिम्मे है। 52 साल की बुरुन ताती पिछले 10 साल से महिला मजदूरों की केयरटेकर हैं। वे बताती हैं, ‘बागान में 18 से 58 साल तक के मजदूर हैं। रिटायरमेंट के बाद हमारा काम बेटे या बहुओं को मिल जाता है। PF के लिए कटने वाला पैसा हमें मिल जाता है।‘

महिलाओं को मिलने वाली सुविधाओं पर वे कहती हैं, ‘बागान में टॉयलेट न होना सबसे बड़ी परेशानी है। सरकार ने हमारी बस्ती में घरों पर टॉयलेट बनवाए हैं, लेकिन यहां नहीं। हर बार काम बीच में छोड़कर घर जाना मुमकिन नहीं होता। मजबूरन खुले में जाना पड़ता है।‘

‘प्रेग्नेंट महिलाओं का ध्यान रखा जाता हैं। उन्हें हल्का काम देते हैं। अगर काम करते हुए कोई बीमार पड़ जाए, तो कंपनी की गाड़ी उसे अस्पताल भी ले जाती है।‘

बारिश में भी चाय की पत्तियां तोड़ने का काम नहीं रुकता। वर्कर्स छाता लगाकर काम करते हैं। अक्टूबर में पत्तियां तोड़ने का सीजन खत्म होने के बाद पेड़ों की कटाई-छंटाई होने लगती है।

बारिश में भी चाय की पत्तियां तोड़ने का काम नहीं रुकता। वर्कर्स छाता लगाकर काम करते हैं। अक्टूबर में पत्तियां तोड़ने का सीजन खत्म होने के बाद पेड़ों की कटाई-छंटाई होने लगती है।

महंगाई में खर्च चलाना मुश्किल, दिहाड़ी बढ़े-जमीन का हक मिले 25 साल की भानुमती ताती बीते 6 साल से बागान में काम कर रही हैं। पति राजमिस्त्री हैं और 5 साल का एक बच्चा है। वे बताती हैं, ‘महंगाई की वजह से दिक्कत बढ़ गई है। बच्चे की पढ़ाई और बीमारी में कम पैसों में मैनेज करना मुश्किल हो जाता है। जब मैनेजर से दिहाड़ी बढ़ाने को कहते हैं, तो काम करने की बात कहकर टाल देते हैं।’

26 साल की सपना ताती पिछले 5 सालों से काम कर रही हैं। वे चुनाव पर कहती हैं, ’नेता आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन लौटकर नहीं आते। इसलिए किसी पर कोई दबाव नहीं है, सब अपनी मर्जी से वोट देते हैं। हमारी बस यही मांग है कि दिहाड़ी बढ़ाई जाए, हमारे घर ठीक कराए जाएं और सबसे जरूरी, जमीन का मालिकाना हक मिले।’

स्टाफ भी नाखुश, बोला- सरकार के वादे अधूरे, अबकी जवाब देंगे 4 अप्रैल को जब हम गांव पहुंचे तब सभी वर्कर्स काम खत्म कर पेमेंट लेने पहुंचे थे। हर 15 दिन बाद शनिवार को उनकी पेमेंट मिलती है। सेंटर पर काफी भीड़ थी। पे स्लिप के साथ लोगों के नाम बोले जा रहे थे, तीन डेस्क पर करीब 12 लोग पेमेंट बांट रहे थे।

यहीं हमें पेमेंट देने वाले 35 साल के संतोष गोला मिले। वे बागान के हालात पर कहते हैं,

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जो नियम और सुविधाएं होनी चाहिए, असल में वो नहीं हैं। 10-12 साल में यहां किसी स्टाफ का प्रमोशन नहीं हुआ। 10-12 पद खाली पड़े हैं, लेकिन भरे नहीं जा रहे। सिर्फ लोगों से काम निकाला जा रहा है।

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‘हमारी सबसे बड़ी दिक्कत कम मेहनताना है। पत्तियां तोड़ने वालों से लेकर पढ़े-लिखे लोगों तक सबको रोज के 250 रूपए ही मिलते हैं। ये काम मजबूरी में कर रहे हैं, क्योंकि थोड़ा पढ़ा-लिखा होने के कारण दूसरा काम नहीं कर सकते।‘

चुनाव के बारे में पूछने पर संतोष मौजूदा सरकार पर नाराजगी जताते हैं। वे कहते हैं, ‘BJP ने बड़े-बड़े वादे किए थे कि जमीन देंगे, दिहाड़ी बढ़ाएंगे, लेकिन कुछ नहीं मिला। अबकी हमने मन बना लिया है कि अगर हमें सुविधाएं और हक नहीं मिला, तो सब मिलकर मौजूदा सरकार को हटाएंगे।‘

मैनेजर बोले- मजदूरों को कोई खास दिक्कत नहीं हम बागान के मैनेजर अमित सिंह से भी मिले। वे बताते हैं कि चाय की पत्तियां तोड़ने से लेकर पैकिंग तक सारा काम उनकी कंपनी ही करती है। वे प्रोडक्शन को लेकर कहते हैं, ‘एक सीजन में 14 से 15 लाख किलो चाय बनाते हैं। हमारी तीन फैक्ट्रियों से रोजाना औसतन 5,000 किलो चाय निकलती है। ये यूरोपियन यूनियन और जापान एक्सपोर्ट होती है। अरब देशों में भी जाती है। फिलहाल जंग के चलते ईरान में सप्लाई बंद है।‘

लोगों की समस्याओं पर वे दावा करते हैं, ‘सुविधाओं को लेकर कोई खास समस्या नहीं है। महिलाओं के लिए वॉशरूम को लेकर सरकारी अफसरों से बात कर रहे हैं। वे सालाना यूरिनल और बाथरूम मुहैया कराते हैं। हमने आवेदन किया है। कंपनी अपने बजट और प्रोजेक्ट्स में भी इसे शामिल रखती है।‘

एक्सपर्ट बोले- चाय बागान मजदूरों के हाथ में 45 सीटें अपर असम के सीनियर जर्नलिस्ट इकबाल अहमद मानते हैं कि सरकार बनाने में चाय जनजाति की बड़ी और निर्णायक भूमिका होती है। इस चुनाव में ST का दर्जा बड़ा मुद्दा है। सिर्फ चाय जनजाति ही नहीं, बल्कि 5 अन्य कम्युनिटी की कुल 6 जनजातियां ST दर्जे की मांग कर रही हैं। पार्टियों ने वादे किए, लेकिन केंद्र को रिपोर्ट नहीं भेजी। इससे लोगों में निराशा है।

डिब्रूगढ़ के जर्नलिस्ट अभिक चक्रवर्ती 15 सालों से अपर असम में एक्टिव हैं। वे बताते हैं,

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अपर असम में 40 से 45 सीटों पर बागान मजदूरों का सीधा असर रहता है। यहां की आबादी का करीब 75% हिस्सा इन्हीं मजदूरों का है। चुनावों में महिला मजदूर अहम रोल निभाती हैं क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है।

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वे कहते हैं कि एक समय था जब ये कम्युनिटी कांग्रेस का पक्का वोट बैंक हुआ करती थी। उनके बड़े नेता कम्युनिटी के लिए ठीक से काम नहीं कर पाए, जिससे 2016 ये वोट BJP के पास आ गया। हालांकि अभिक मानते हैं कि इस बार चुनाव के मैदान में ST दर्जे का मुद्दा उतना हावी नहीं, जितना लैंड पट्टा और दिहाड़ी है।

BJP बोली: असम सरकार ST दर्जा दिलाकर रहेगी असम BJP के राज्य महासचिव और असम पर्यटन विकास निगम (ATDC) के अध्यक्ष रितुपर्णा बरुआ कहते हैं, ‘सिर्फ टी-ट्राइब्स ही नहीं, कुल 6 कम्युनिटीज ST दर्जा मांग रही हैं। सरकार ने इसके लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाया है। सभी कम्युनिटी के लीडर्स से चार राउंड बातचीत हो चुकी है। GoM ने रिपोर्ट भी दे दी है। असम सरकार भी यही चाहती है कि इन सभी 6 कम्युनिटी को ST दर्जा मिले। हम उसके लिए काम कर रहे हैं।’

मेहनताने को लेकर बरुआ कहते हैं कि अगले तीन सालों में इसे बढ़ाकर 500 करने का हमारा वादा है। इसे हर हाल में पूरा करेंगे।

वहीं, कांग्रेस लीडर गोपाल शर्मा का कहना है कि इनकी ST दर्जे की मांग को लेकर पार्टी का स्टैंड बिल्कुल साफ है, जो लोग तय क्राइटेरिया पूरा करेंगे, उन्हें दर्जा दिया जाएगा। अगर हमारी सरकार बनती है तो मजदूरी बढ़ाने समेत बाकी मांगों पर भी विचार करेंगे।

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