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ब्लैकबोर्ड- बच्ची से रेप के केस में फंसाया: जेल से मेंटल हॉस्पिटल भेजना पड़ा, 25 साल बाद अदालत बोली- बेगुनाह हूं मैं




57 साल के आजाद खान अपने भाई की किराने की दुकान पर बेसुध बैठे हुए हैं। तीन महीने पहले ही 25 साल बाद जेल से बाइज्जत बरी होकर आए हैं। अकेले में कुछ बुदबुदा रहे हैं। पूछने पर कहते हैं- पूरी जिंदगी काल-कोठरी में गुजार दी। अब किसी से क्या ही बात करूं, क्या ही बचा है! मैंने पूछा- पूरी जिंदगी जेल में गुजार दी, किसी का मर्डर किए थे क्या? ‘नहीं-नहीं, डकैती का झूठा मुकदमा था। कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सोचिए जरा- डकैती के मामले में आजीवन कारावास!’ तभी पीछे से आजाद की भाभी आशा बेन बोल पड़ती हैं, ‘बेकसूर थे। झूठे मुकदमे में गांव के एक परिवार ने फंसा दिया था। सब बर्बाद हो गया।’ स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज झूठे मुकदमों में फंसाए गए लोगों की कहानी, जिनकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई और आखिर में बाद कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। मैं उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर से 22 किलोमीटर दूर ब्योंती कटरा गांव पहुंचा हूं। 25 साल बाद जेल से बाइज्जत बरी होकर आए आजाद खान से मिलने। यहां संकरी गली और खुले में बहते एक गंदे नाले के बीच आजाद खान का छप्पर का घर है। इसकी हालत इतनी खराब है कि हल्की आंधी आए तो उड़ जाए। इससे सटा इनके भाई मस्तान खान का घर है। एक छोटा-सा बिना प्लास्टर वाला ईंट का बना। सामने दो-तीन मवेशी बंधे हुए हैं। यहीं पर मस्तान खान की दुकान है। उसके बाहर बैठ जाता हूं और अपने भाई आजाद खान को बुलाने के लिए कहता हूं, लेकिन आजाद मुझसे बात करने के लिए सामने नहीं आ रहे। पहले इनके भाई ने बुलाया और फिर भतीजा कई बार बुलाने गया तब आने को तैयार हुए। दुकान से बाहर आकर यहां रखे तख्त पर बैठ जाते हैं। अब भी काफी सहमे हुए नजर आ रहे हैं। बार-बार इधर-उधर देख रहे हैं। उसी तख्त के बगल बैठी इनकी भाभी आशा बेन कहती हैं- जेल जाने से मानसिक हालत खराब हो गई है। तीन महीने पहले 21 जनवरी 2026 को जब सुबह-सुबह मेरे बेटे और पति इन्हें जेल से रिहा कराकर घर लाए, तो गांव की बदली गली और घर देखकर चौंक गए। इन्हें सब बदला-बदला लग रहा था। धीमी आवाज में बोले- भाभी सब बदल गया न! मैं इनकी पीठ पर हाथ सहलाते हुए बोली- हां, सब बदल गया। अब जेल से छूटकर आ गए हो। डरो मत। मैं तुम्हारी मां जैसी हूं। जब ये जेल गए थे, तो 30 बरस के थे। 25 साल सलाखों के पीछे रहने के बाद 55 साल के हो गए हैं। इनकी पूरी जिंदगी जेल में चौपट कर दी गई। यह बताते हुए आशा बेन की आंखें भर आती हैं और दुपट्टे से आंसू पोछने लगती हैं। थोड़ी देर रुककर फिर कहती हैं- मुझे ब्याहकर आए 10 साल हुए थे। आजाद अपने 5 भाइयों में सबसे छोटे हैं। शुरू से थोड़ा अड़ियल मिजाज के रहे हैं। किसी से डरते नहीं थे। इसी वजह से गांव वालों की नजर में चढ़े हुए थे। 22 अक्टूबर 2000 को दिवाली का दिन था। हम लोग गहरी नींद में सो रहे थे। आजाद उस वक्त दिल्ली में सिलाई का काम करते थे। सुबह के 3 बजे, अचानक गांव में हल्ला मचा कि- डाका पड़ गया है। चोरी हो गई है।
शोर-शराबा सुनकर हम भी उठकर दौड़े। हमारे गांव के एक ब्राह्मण परिवार के यहां चोरी हो गई थी। उनके यहां शादी की तैयारी चल रही थी, लिहाजा उनके घर में काफी गहने रखे थे, जो चोरी हो चुके थे। मामले की पुलिस से शिकायत की गई। फौरन हमारे एऊल थाना की पुलिस छानबीन में जुट गई। तीन-चार दिनों बाद अचानक पुलिस हमारे घर आई। गाली देते हुए बोली- उस रात डकैती में तुम्हारा देवर आजाद खान भी शामिल था। यह सुनकर हम हैरान हो गए। मैंने कहा- साहेब, वह तो दिल्ली में सिलाई का काम करते हैं। वो यहां कैसे आ गए? पुलिस कहने लगी- झूठ मत बोले। तुम लोगों ने उसे यहां से भगा दिया। उसके खिलाफ गवाही मिली है। तुरंत उसे बुलाकर थाने में पेश करो, वर्ना सभी को जेल में डाल दूंगा। हम लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। मेहनत-मजदूरी करके घर चलाते हैं। उस दौरान गांव वाले हमारी हंसी उड़ाने लगे। कहने लगे- और चलो ठसक में! अब भुगतो अपनी करनी का फल। आखिर गांव वाले भी हमें ही गलत मान रहे थे। उसके बाद हमने आजाद को चिट्ठी लिखी और बताया- पुलिस आपको खोज रही है। घर आ जाइए। आपके ऊपर गांव के घर में डाका डालने का केस दर्ज है। इस बातचीत के दौरान तख्त पर ही मुरझाया चेहरा लिए, मटमैली पीली बनयान और पैजामा में आशा बेन के पति मस्तान खान भी बैठे हैं। कहने लगे- आजाद ने अपनी जवाबी चिट्ठी में लिखा- मैं तो दिल्ली में हूं। मैंने कौन-सा अपराध किया है, जो पुलिस के सामने सरेंडर करूं? आजाद अभी तक घर नहीं आए थे। इसी बीच, पुलिस घर की कुर्की-जब्ती का नोटिस लेकर आ गई। दीवार पर नोटिस चिपकाते ही घर में चीख-पुकार मच गई। हम पांच भाई, मेरे तीन बच्चे। कहां जाते। घर न बचता, तो सड़क पर आ जाते। उसके बाद हमने कर्ज लिया और वकील को 20 हजार रुपए दिए, तब कुछ दिनों के लिए कुर्की-जब्ती से मोहलत मिली। उसके बाद फौरन अपने भाई आजाद खान से मिलने दिल्ली निकल गया। उसे पूरी बात बताई, तब वह कोर्ट में सरेंडर करने को राजी हुआ। वह आया और कोर्ट में सरेंडर कर दिया। करीब महीनेभर बाद नवंबर 2001 में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। फिर सुनवाई चली और सेशन कोर्ट ने 25 साल जेल की सजा सुनाई। अब जाकर तीन महीने पहले यह बाइज्जत बरी होक बाहर आया है। आजाद की न शादी हुई, न घर बसा। पूरी जवानी जेल में खप दिया। अब किसी काम का नहीं बचा है। सोच-सोचकर मानसिक रूप से बीमार हो गया। यह कहते हुए मस्तान खान फूट-फूटकर रोने लगते हैं। आंख मलते हुए बोलते हैं, ‘जेल में इससे मिलने के लिए हजार-पांच सौ रुपए पुलिस वालों को देने होते थे। मेर पास जब भी कुछ रुपए जमा होते, तब इससे मिलने चला जाता था। आखिर मेरा छोटा भाई है। जेल के दौरान मैंने कई बार कोर्ट में जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन खारिज होती रही। वकील ने कहा- 50 हजार रुपए दो, तब जमानत करवाऊंगा, लेकिन उस वक्त मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। किसी तरह से जमींदारों के खेत में दिहाड़ी-मजदूरी करके पैसे जुटाता, फिर साल-दो साल में वकील के पास जा पाता। वकील पैसे तो ले लेता, लेकिन जमानत नहीं करवाता था। एक बार तो रमजान का महीना था। 5 हजार रुपए लेकर मैनपुरी शहर से खाने-पीने का कुछ सामान खरीदने गया था। साथ में भाई की जमानत के लिए वकील से मिलकर बात करनी थी। उस दिन वकील ने मेरे सारे पैसे ले लिए। त्योहार का कोई सामान नहीं खरीद पाया। यहां तक कि इतना भी पैसा नहीं बचा कि बस का किराया दे सकूं। उस दिन पैदल ही मैनपुरी से अपने गांव आया था। इस बातचीत के दौरान बीच-बीच में आजाद खान कुछ-कुछ बुदबुदा रहे हैं। उनसे बात शुरू किया तो कहने लगे- जेल में मैं खूंखार कैदियों के बीच रह रहा था। एक बार तो वे सारे मिलकर मुझे मारने की योजना बना लिए थे। उन्होंने एक थैले में कई सारी खुरपियां जुटाई। एक कैदी ने तो मेरे हाथ पर खुरपी से हमला भी कर दिया था। मौके पर जेल अधिकारी पहुंच गए थे और किसी तरह बचाया था। उस दिन बच गया था, लेकिन इतना डर गया कि मानसिक रूप से बीमार रहने लगा। मन में एक खौफ बस गया। हर वक्त लगने लगा कि- कोई मुझे मारने आ रहा है। ऐसा लगने लगा कि जेल से बाहर जाऊंगा तो गांव वाले मार देंगे। मेरी खराब हालत खराब होने लगी। उसके बाद जेल प्रशासन मुझे बरेली सेंट्रल जेल से बनारस के मेंटल हॉस्पिटल लेकर गया। वहां मेरा दो साल इलाज चला। हाथ में कोर्ट-कचहरी के कागज पलटते हुए आजाद खान ये बातें बताते हैं। इस दौरान वह इधर-उधर देखते हुए अक्सर मुठभेड़-मुठभेड़ कहते हैं। पूछने पर कुछ नहीं बताते। फिर थोड़ा जोर देता हूं तो कहते हैं- हमारे गांव में दो समुदायों के बीच अक्सर लड़ाई-झगड़े होते थे। 1999 की बात है। गांव में झगड़ा हुआ और पुलिस पहुंच गई। हमारी पुलिस से हाथापाई हो गई। मेरे कुछ साथियों ने पुलिस पर गोली चला दी। अटैंप्ट टू मर्डर का केस चला, मुझे भी 10 साल की सजा हुई थी। कुछ महीने जेल में रहा था, फिर जमानत पर छूटकर आया था। उसके बाद दिल्ली कमाने चला गया था और फिर यह डकैती का झूठा केस मुझ पर लाद दिया गया। यह कहते हुए आजाद खान अजीबोगरीब बातें करने लगते हैं। कुछ का कुछ बताने लगते हैं। पास में ही बैठी इनकी भाभी कहती हैं- अब आप इनसे मत बात कीजिए। इनकी मानसिक हालत ठीक नहीं है। कई बार गाली-गलौज भी करने लगते हैं। 25 साल जेल के दौरान इन्हें अकेले काल-कोठरी में रखा गया था। वहां इन्हें टॉर्चर किया गया था, उसके बाद से बड़बड़ाने लगे हैं। हम लोग कुछ कर नहीं पा रहे थे। एक NGO ने हमारी मदद की। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां मामले को झूठा पाया गया। सोचिए एक झूठे केस में इंसान की पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी गई। पागल बना दिया गया। जब तक हम लोग जिंदा हैं, इनकी देखभाल करेंगे, हमारे मरने के बाद इनका क्या होगा, पता नहीं। आजाद खान की इस स्याह कहानी को जानने के बाद मैं मैनपुरी से दिल्ली पहुंचा। यहां किराड़ी इलाके के प्रेम नगर में रामदास का परिवार रहता है। रामदास यहां चप्पल की एक फैक्ट्री में काम करते हैं। 9 हजार रुपए महीना कमाते हैं। पड़ोसियों ने एक बच्ची के रेप के झूठा केस में फंसा दिया। पॉक्सो एक्ट तहत जेल गए। 7 साल जेल काटी और 2021 में बाइज्जत बरी बाहर आए हैं। रामदास बताते हैं- मुझ पर रेप का मुकदमा दर्ज था। अभी 60 साल का हूं। जब जेल गया था, तब 50 साल का था। मेरा दो बेटे-दो बेटियों समेत पूरा परिवार है। पड़ोसी ने मेरी जाति से नफरत करते थे, इसलिए मुझे फर्जी केस में फंसा दिया। एक ऐसी बच्ची का रेप करने और उसे गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया, जिसे मैं अपनी पोती मानता था। मई 2015 की बात है। मेरी सिलाई मशीन की फैक्ट्री थी। उसमें काम करने के बाद बैंक में गार्ड की नौकरी भी करता था। एक दिन शाम को घर आया, तो पड़ोसी मेरे परिवार से लड़ाई कर रहे थे। पता चला था कि गेट पर किसी कुत्ते ने पॉटी कर दी थी, जिसको लेकर मेरे परिवार से गाली-गलौज कर रहे थे। मैंने रोका तो मुझ पर टूट पड़े। घसीटते हुए कहने लगे- बहुत शान में चलता है न तू। ऐसा लगता है, जैसे कोई बड़ा रईस हो। कितनी बड़ी नौकरी करता है रे। आज हम तुझ पर केस करेंगे। अगले दिन सुबह-सुबह पुलिस मेरे घर आई और मुझे उठाकर ले गई। थाने में बताया कि मुझ पर रेप का मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस मुझे पीटते हुए बोली- तुम पर केस करने के लिए तुम्हारे पड़ोसी 50 हजार रुपए दिए हैं। अगर इस केस को खत्म करना है, तुम्हें एक लाख रुपए देने होंगे। मेरे पास उतने रुपए नहीं थे। नहीं दे पाया और पुलिस ने केस को बड़ा बनाकर मुझे जेल भेज दिया। इसके बाद तारीख पर तारीख शुरू हुई। मैंने कभी पॉक्सो एक्ट… के बारे में सुना तक नहीं था। उधर, मेरे जेल जाते ही मेरे बेटे-बहू, पत्नी सब दर-दर ठोकर खाने लगे। उस वक्त बहू गर्भवती थी। केस लड़ने के लिए मेरे बेटे ने एक-एक करके बहू की सारी ज्वैलरी बेच दी। हर तारीख पर 3 से 5 हजार रुपए खर्च हो रहे थे। जब गहने के पैसे खत्म हो गए तो मैंने जज से कहा था कि- साहब जो भी फैसला देना है दे दीजिए, नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। पास में बैठे रामदास के बेटे जोगिंदर दास भी ये बाते सुन रहे थे। वह कहते हैं- एक तरफ मेरी पत्नी गर्भवती थी, दूसरी तरफ पापा जेल में थे। जब भी वकील के पास जमानत के लिए जाता, वह कहता- 50 हजार रुपए दो, तभी जमानत की अर्जी लगवाऊंगा। जब पत्नी के सारे गहने बिक गए, तब फैक्ट्री की 5 सिलाई मशीनें भी बेच दी। उसके बाद पैसे कम पड़ने लगे। तो गांव जाकर घर की जमीन बेची। मामले में 10 लाख से ज्यादा खर्च हो गए थे। जब जेल में पापा से मिलने जाता, तो हम एक-दूसरे को देखकर रोते। उस वक्त यही सोचता जैसे भी पापा को जेल बाहर निकालूंगा। आखिर में किसी तरह पैसे दे-लेकर फाइनल सुनवाई हुई। तीस हजारी कोर्ट ने 2021 में पापा को 7 साल की जेल के बाद बरी कर दिया। दिल्ली सरकार को एक लाख रुपए मुआवजा देने को भी कहा। लेकिन जब हम ये पैसे लेने हम दिल्ली सचिवालय गए, तो वहां अधिकारी एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस का चक्कर कटवाने लगे। अब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा है। इस एक लाख को पाने के चक्कर मेंल हमारे ढाई लाख खर्च हो चुके हैं। केवल अपील पर अपील चल रही है। जोगिंदर की ये बातें सुनकर रामदास लंबी सांस लेते हुए बोलते हैं- जेल में गीता पढ़कर और पेंटिंग करके जिंदगी काट रहा था। वहां बाकी कैदी मुझे देखकर पूछते- चाचा, आप कौन-से जुर्म में जेल आए हो? मैं जैसे ही कहता- रेप केस में। वे पुलिस को गाली देते हुए कहते- आपकी उम्र भी तो देख लेते पुलिस वाले। उन्होंने ऐसी ही फर्जी केस में फंसाकर हमें अपराधी बनने को मजबूर किया है। रामदास कहते हैं- इस तरह 7 साल जेल में बेनुनाह होते हुए भी गुजारे। अब जेल से चले आने के बाद भी क्या बचा है। जमीन, गहने बिक गए। पूरी कमाई कोर्ट-कचहरी में लुटा दी। ——————————————————— 1- ब्लैकबोर्ड-हट्टा-कट्टा भर्ती हुआ, फौज ने विकलांग बनाकर भेज दिया:8 महीने कोमा में रहा, होश आया तो पता चला- मुझे आर्मी से निकाल दिया ‘डेढ़ महीने से मुझे ‘महाराजा’ पनिशमेंट दी जा रही थी, जिसमें सिर के बल डेढ़-डेढ़ घंटे रहना होता था। एक दिन मैं बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहा था। तभी एक जोरदार पंच मेरे सिर पर लगा और मैं गिर पड़ा। अफसर चिल्लाए- चेतन, उठो और लड़ो। मैंने कहा- अब नहीं लड़ पाऊंगा, सर। लेकिन उन्होंने कहा- नहीं चेतन, तुम्हें भिड़ना होगा। पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती हैं- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े…पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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