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संडे जज्बात-मैंने नक्सली बने 20 अपनों को गोली मारी: अपनों पर गोली चलाना आसान नहीं था, लेकिन बम-धमाके में साथियों की मौत ने झकझोर दिया था




मैं शरतचंद्र बुरुदा हूं, ओडिशा के मलकानगिरी जिले के सरपल्ली गांव का रहने वाला। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हूं। 1990 के दशक के आखिर में जब मैंने पुलिस की नौकरी जॉइन की, तब ओडिशा के दंडकारण्य इलाके में नक्सलवाद अपने चरम पर था। आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमा पर स्थित चित्रकुंडा इलाका उस वक्त नक्सलियों के एकतरफा कंट्रोल में था। 19 दिसंबर 1998 की रात, चित्रकुंडा थाने के अंतर्गत आने वाली मल्लिगुड़ा जुडाम पोस्ट पर नक्सलियों ने हमला कर दिया। हमले में पोस्ट पर तैनात सभी पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद पुलिस प्रशासन चिंतित हो गया। हालात पर काबू पाने के लिए एक स्थानीय आदिवासी पुलिस अधिकारी की तलाश शुरू हुई, जो इलाके की भौगोलिक बनावट को अच्छी तरह जानता हो और स्थानीय भाषा समझता-बोलता हो। साथ ही नक्सलियों के बीच का आदमी हो।
उस वक्त मैं ओडिशा के कोरापुट जिले में तैनात था। मुझे इस जिम्मेदारी के लिए सबसे बेहतर पाया गया और बुलाकर वहां तैनात किया गया। हालांकि, मैं वहां बिल्कुल नहीं जाना चाहता था, क्योंकि वह मेरा अपना इलाका था और वहां के लोग अपने थे। मैं सोच रहा था- अपने ही लोगों के सामने एक पुलिस अफसर बनकर कैसे खड़ा हो पाऊंगा? अगर गोली चलानी पड़ी, तो कैसे चलाऊंगा? एक तरफ ड्यूटी थी, तो दूसरी तरफ अपने लोग। आखिरकार, मैंने ड्यूटी को चुना। दरअसल, नक्सलियों ने चित्रकोंडा थाने के तहत 1962 में बने बालिमेला बांध के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया था और इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए थे। उन्होंने आस-पास के गांवों और ओडिशा के दंडकारण्य क्षेत्र में लोगों को प्रशासन के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। मजदूरों के अधिकार के नाम पर गांव वालों को अपने साथ जोड़ने लगे और धीरे-धीरे उन्हें नक्सल आंदोलन में शामिल करने लगे। बांध के खिलाफ उन्होंने एक तरह से संगठित मुहिम ही छेड़ दी। उस वक्त हमारी मल्लिगुड़ा पोस्ट पर कुल 35 सुरक्षा बल के जवान तैनात थे। वहां शौच की बड़ी समस्या थी- करीब 500 मीटर दूर एक नाले के पास जाना पड़ता था। साल 2001 की बात है। उस दिन हमारा एक सिपाही उसी नाले के पास शौच के लिए गया। वहां नक्सलियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और उसे 28 गोलियां मारीं। यह हमला एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया था। दरअसल, नक्सलियों को उम्मीद थी कि एक सिपाही पर हमला होने की खबर मिलते ही बाकी सुरक्षा बल भी मौके पर पहुंच जाएगा और फिर हम सभी को जमीन में बिछाई अपनी एंटी-बारूदी सुरंग यानि लैंडमाइन से एक साथ उड़ा देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीएसएफ ने हमें इस घटना की जानकारी दे दी थी। सभी पुलिस मुख्यालय अलर्ट हो गए थे। उसके बाद फोर्स के कमांडेंट, डिप्टी सुपरिंटेंडेंट, एंटी-नक्सल फोर्स और बाकी पुलिस अधिकारी मौके पर अलग-अलग हिस्सों में जाने के लिए तैयार हुए। वहां जाने के दो रास्ते थे- एक सड़क के जरिए और दूसरा मोटर लॉन्च के जरिए। हमने मोटर लॉन्च वाला रास्ता चुना। लेकिन उस पूरे रास्ते में नक्सलियों ने जगह-जगह लैंडमाइन बिछा रखी थीं। हम आगे बढ़ते रहे। जाते समय तो सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन लौटते वक्त अचानक रास्ते में बिछी बारूदी सुरंगें फटने लगीं। मेरी मोटर लॉन्च आगे निकल चुकी थी, इसलिए मैं और मेरे कुछ साथी बच गए। पीछे मुड़कर देखा, तो दिल दहल गया- पीछे आ रही हमारे साथियों की गाड़ियां एक-एक कर धमाकों में उड़ रही थीं। कुछ ही पलों में सब खत्म हो गया… सभी साथी मार दिए गए। उसके बाद नक्सलियों ने हमारा पीछा किया और हम पर फायरिंग शुरू कर दी। उस वक्त भागने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। अगर मैं भावनाओं में बहकर साथियों के लिए वापस लौटता, तो जिंदा न बचता। उस दिन अपने साथियों को पीछे छोड़कर भागना मेरे लिए सबसे दर्दनाक फैसला था। उसके बाद कई दिनों तक नींद नहीं आई। आंखें बंद करता, तो वही मंजर सामने आ जाता- साथियों की मौत, धमाकों की आवाजें… सब कुछ। उस दौरान जब भी फील्ड में जाता, उन साथियों की याद बार-बार लौट आती। आज भी वही होता है। आज भी अगर मेरे पीछे अचानक कोई गाड़ी आती दिखती है, तो चौंक जाता हूं- एक पल के लिए लगता है, कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। आखिर वह हमला मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट बन गया। मैंने तय कर लिया कि अब नक्सलियों को नहीं छोड़ूंगा। अब तक मैं बातचीत का रास्ता अपना रहा था, लेकिन यह तरीका कारगर साबित नहीं हो रहा था। मैंने प्लान तैयार करना शुरू किया। मैं उन्हीं के बीच पला-बढ़ा था और उनका मुझ पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसी भरोसे को ताकत बनाया। सबसे पहले उनके इलाकों में अपनी खुफिया टीमें तैयार करनी शुरू की और उन्हें अलग-अलग जगहों पर तैनात करना शुरू किया। वे टीमें मुझे नक्सलियों की हर गतिविधि की जानकारी देने लगीं- कौन कहां जा रहा है, किस इलाके में उनकी मौजूदगी है, वगैरह-वगैरह। हालांकि, भले ही रिटायर हो चुका हूं, फिर भी एनकाउंटर की पूरी रणनीति आपसे साझा नहीं कर सकता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। फिलहाल, उन जानकारियों के आधार पर मैं अपनी रणनीति तैयार करता और एक-एक करके उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करता। उस दौरान हमने नक्सली बने अपने लगभग 20 लोगों का एनकाउंटर किया। यहीं से ओडिशा में नक्सलवाद के खात्मे की शुरुआत हुई। मैं जिस तरह एक के बाद एक एनकाउंटर कर रहा था, उससे नक्सलियों के निशाने पर आ गया। उन्हीं के बीच का आदमी था- उनकी चाल, उनका तरीका, सब जानता था… और शायद यही वजह थी कि वे भी मुझे किसी भी हालत में खत्म करना चाहते थे। कई बार तो मेरी पुलिस चौकी उड़ाने की कोशिश की। हर बार लगा कि अब बचना मुश्किल है… लेकिन किसी तरह बच जाता था। जब वह मुझे नहीं मार पाए तो मेरे परिवार को निशाना बनाने लगे। 2006 में उन्होंने सबसे पहले मेरे पिता जी को निशाना बनाया। वह एक गाड़ी से जा रहे थे। तभी, अचानक, नक्सलियों ने उनकी गाड़ी में विस्फोट कर दिया। धमाका इतना जोरदार था कि गाड़ी पलट गई। उस गाड़ी में सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई… और मेरे पिता जी गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। इसके बाद भी मेरे परिवार के कई लोगों पर हमले हुए। कोई बुरी तरह घायल हुआ, कोई किसी तरह बचा। दरअसल, अब नक्सली मेरा हौसला तोड़ में जुट गए थे। वे जानते थे कि सीधे मुझ तक पहुंचना मुश्किल है… इसलिए उन्होंने मेरे अपने लोगों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसी बीच… एक और घटना हुई, जिसने मुझे फिर से अंदर तक झकझोर दिया। एक लड़का जो कि कोई मुखबिर नहीं था। बस इलाके के एक गांव का जवान लड़का था। सीधा-सादा… और, सच कहूं, इंसानियत के नाते मेरी मदद कर रहा था। उस दिन वह मुझसे मिलने आया था। हम मिले, थोड़ी बात हुई… और फिर वह वापस अपने गांव लौट गया। मुझे क्या पता था कि यही मुलाकात उसकी जिंदगी की आखिरी मुलाकात बन जाएगी। रास्ते में… नक्सलियों ने उसे घेर लिया। उसे कोई मौका नहीं दिया। वहीं उसकी हत्या कर दी। जब मुझे ये खबर मिली… मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल सन्न रह गया। एक ही बात दिमाग में घूमने लगी- क्या उसकी मौत की वजह मैं हूं? सच बताऊं, उस दिन पहली बार मुझे लगा कि ये लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं रही… इसमें अब बेगुनाह लोग भी कुर्बान हो रहे हैं। दरअसल, जंगल में काम करते-करते ऐसा होता है। लोग आपके करीब आ जाते हैं। हर कोई मुखबिर नहीं होता… हर कोई खुफिया नहीं होता। कई लोग तो बस इसलिए मदद करते हैं क्योंकि वे इस हिंसा से परेशान होते हैं… क्योंकि वे चाहते हैं कि हालात बदलें। ऐसा नहीं है कि उस दौरान मैं केवल एनकाउंटर ही कर रहा था। मैंने कई नक्सलियों की गिरफ्तारियां भी कराईं और कई लोगों को आत्मसमर्पण भी करवाया। ऐसे ही एक नक्सली की कहानी है, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया। मैंने एक बड़े नक्सली नेता को गिरफ्तार किया था। उसका नाम नहीं बता सकता। वह अपने ग्रुप का सी-कमांडर था। दरअसल, उसके घर में चोरी हो गई थी। वह बार-बार पुलिस स्टेशन जा रहा था, लेकिन उसे कोई मदद नहीं मिल रही थी। आखिरकार वह नक्सलियों के पास पहुंचा। नक्सलियों न सिर्फ उसका चोरी हुआ सामान बरामद करवाया, बल्कि हर तरह से उसका साथ दिया। जिसके बाद वह भी नक्सलियों बन गया। इसके अलावा नक्सल प्रभावित इलाकों में न तो ठीक से स्कूल हैं, न साफ पानी की व्यवस्था और न ही बाकी बुनियादी सुविधाएं। इन्हीं समस्याओं के नाम पर नक्सली लोगों को बरगलाते हैं और अपने गुट में शामिल करते हैं। लिहाजा, यही कहूंगा कि कुछ गलतियां हमारी भी हैं, जिनका नक्सली फायदा उठाते हैं। अगर इन चीजों को ठीक किया जाए, तो नक्सलवाद काफी हद तक अपने आप खत्म हो जाएगा। फिलहाल, आखिर में कहूंगा कि अपने काम से तो संतुष्ट हूं, लेकिन अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का मुझे अफसोस भी है। न चाहते हुए भी उन पर गोलियां चलानी पड़ीं। (शरतचंद्र बुरुदा ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) —————————————- 1- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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