मार्च, 2025 की बात है, बांग्लादेश में चांदपुर के पूरनबाजार में बने मंदिर के बाहर करीब 600 लोग पहुंच गए। उन्हें मंदिर के पुजारी अनिक गोस्वामी की तलाश थी। भीड़ का आरोप था कि अनिक गोस्वामी ने पैगंबर का अपमान किया है। अनिक वहां से भाग निकले। वे अब भी छिपक
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अगस्त, 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में धार्मिक हिंसा के 2000 से ज्यादा मामले हुए हैं। इनमें जमात से जुड़े तौहिदी जनता ग्रुप और हिज्ब उत तहरीर का नाम आया। अब बांग्लादेश में चुनाव हैं। 12 फरवरी को वोटिंग होगी। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग इस बार चुनाव नहीं लड़ रही है। जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी में मुकाबला है। अल्पसंख्यकों को टारगेट करने वाली जमात सत्ता की दावेदार है।
ये चुनाव अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के लिए परीक्षा जैसे हैं। उन पर हमले हो रहे हैं। रंगदारी मांगी जा रही है। धमकियां मिल रही हैं। ऐसे में 900 साल पुराने ढाकेश्वरी मंदिर में पूजा कर रहे श्रद्धालु हों या ढाका यूनिवर्सिटी के जगन्नाथ हॉल कैंपस के स्टूडेंट, सबके मन में एक ही सवाल है- वोट देने में ज्यादा खतरा है या न देने में। इस रिपोर्ट में पढ़िए और देखिए बांग्लादेशी हिंदुओं की परेशानी और वोट को लेकर उनकी उलझन।
जगह: ढाकेश्वरी मंदिर, बख्शी बाजार, ढाका

ढाकेश्वरी मंदिर बांग्लादेश का सबसे बड़ा मंदिर है। शक्ति पीठ होने की वजह से ये हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसे नेशनल टेंपल का दर्जा हासिल है।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका का नाम ढाकेश्वरी मंदिर के नाम से ही पड़ा था। चुनाव की कवरेज के दौरान हम यहां पहुंचे। मंदिर के बाहर अच्छी खासी चहल-पहल है। अंदर भी करीब 300 श्रद्धालु थे। उस वक्त दोपहर में होने वाली आरती की तैयारी चल रही थी। गीता पाठ का भी कार्यक्रम था।
हमने पूजा करने आए कुछ लोगों से बात की। उनसे ये 5 सवाल पूछे…
1. बांग्लादेश में होने जा रहे चुनाव पर वे क्या सोचते हैं? 2. बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं, इनके पीछे कौन है? 3. शेख हसीना के जाने के बाद देश में बने हालात का क्या असर पड़ा है? 4. करीब 10% आबादी वाला हिंदू समुदाय किसे वोट करेगा? 5. क्या वे बांग्लादेश में सुरक्षित महसूस करते हैं या कहीं और जाने के बारे में सोच रहे हैं?
‘हम हिंदू, हमारी किस्मत में ही जुल्म लिखा है’ ढाका की रहने वाली निशा रानी दत्त ढाकेश्वरी मंदिर में वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर रही थीं। निशा सरकारी बैंक में नौकरी करती हैं। हमने उनसे पूछा कि चुनाव में हिंदुओं के लिए कैसा माहौल है? वे जवाब देती हैं, ‘हमें समझ नहीं आ रहा चुनाव में क्या करना है। चुनाव आते ही दूसरे लोग हमें परेशान करने लगते हैं। हम हिंदू हैं, हमारी किस्मत में सताया जाना ही लिखा है।’
‘मैं ढाका में रहती हूं। इसलिए बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं होती। चटगांव, खुलना, जॉयपुरहाट और लालमोनिरहाट में हिंदुओं पर बहुत जुल्म होते हैं। फिर भी ये देश हमारा है। हम कभी इसे छोड़कर नहीं जाएंगे।’
निशा के साथ मौजूद सोमा भी कहती हैं, ‘ये मेरा देश है। मेरा जन्म यहीं हुआ। मैं यहीं रहना चाहती हूं। मैं कहीं और जाने के बारे में नहीं सोच रही। कोई भी सरकार में आए, लेकिन हम अपने धर्म को जिस तरह से मानते आए हैं, वैसे ही मानेंगे।’

ढाकेश्वरी मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है। यहां साल भर संगीत कार्यक्रम होते हैं।
‘हिंदू जमात-ए-इस्लामी को वोट नहीं दे सकते, BNP को ही देंगे’ सुनीरमल रॉय पेशे से डॉक्टर हैं। ढाकेेश्वरी मंदिर में पूजा करने आते रहते हैं। वे कहते हैं, ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP और जमात के बीच चुनाव होना है। शेख हसीना की अवामी लीग को तो बैन कर दिया गया है। अभी समझ नहीं आ रहा कि चुनाव कौन जीतेगा। चुनाव की वजह से हमारे लोगों को दिक्कतें हो रही हैं। कई बार घर पर हमला हो जाता है, धमकियां दी जाती हैं।’
हिंदू समुदाय इस बार किसे वोट करेगा? सुनीरमल जवाब देते हैं, ‘हमें पता है कि जमात-ए-इस्लामी इस्लामिक पार्टी है। BNP लोकतांत्रिक पार्टी है। ज्यादातर हिंदू BNP को सपोर्ट करेंगे। जमात को बहुत कम ही हिंदू वोट करेंगे।’

अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 2000 से ज्यादा मामले बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल अल्पसंख्यकों का संगठन है। ये देश में धार्मिक आधार पर होने वाली हिंसा के आंकड़े जुटाकर रिपोर्ट जारी करता है। संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से धार्मिक हिंसा के 2000 से ज्यादा मामले हो चुके हैं। इनमें 68 लोगों की हत्या हुई है। 28 केस महिलाओं के खिलाफ हिंसा के हैं। मंदिरों पर भी हमले हुए हैं। हालांकि डॉ. यूनुस की अंतरिम सरकार ने इस डेटा को खारिज किया है।
काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी मणिंद्र कुमार नाथ कहते हैं,
बांग्लादेश में चुनाव करीब आते ही हालात खराब हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों के लिए हर दिन के साथ डर बढ़ता जा रहा है। हम अपनी परेशानियों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहते हैं, लेकिन सरकार हमारी बात नजरअंदाज कर रही है।

‘अंतरिम सरकार के चीफ एडवाइजर डॉ. मोहम्मद यूनुस ने माना है कि धार्मिक हिंसा के 71 मामले हुए हैं। इनमें सिर्फ एक मामले में मौत हुई है। हमारा डेटा कहता है कि धार्मिक हिंसा में 66 लोगों की मौत हुई है। हमें लगता है कि ये हत्याएं धार्मिक वजहों से ही की गई हैं, लेकिन सरकार मानने को तैयार नहीं है।’
‘हमारे देश की बुनियाद सेक्युलरिज्म पर टिकी है, लेकिन अब कट्टर इस्लामिक ताकतें इसे सांप्रदायिक बनाना चाहती हैं। जमात-ए-इस्लामी, BNP और अवामी लीग भी धार्मिक हिंसा के पीछे होती हैं। पार्टियां अपनी राजनीति के लिए धर्म का सहारा लेती हैं और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती हैं।’

हालांकि अंतरिम सरकार के चीफ एडवाइजर मोहम्मद यूनुस के एडवाइजर शफीकुल आलम ने भास्कर को दिए इंटरव्यू में कहा था कि पिछले साल हमने हिंसा पर सालाना रिपोर्ट जारी की थी। कम्युनल और हेट क्राइम के मामले में पिछले एक साल में सिर्फ एक ही हत्या हुई है, जिसमें दीपू चंद्र दास का मामला है।
उन्होंने दावा किया कि दूसरी घटनाओं में जमीन और कानून व्यवस्था के मामले या किसी दूसरी वजहों से हत्या हुई हैं। अवामी लीग हर हिंदू की हत्या को धार्मिक हिंसा में हुई मौत बता रही है।
‘हम वोट दें तो दिक्कत, न दें तो दिक्कत’ ढाका की रहने वाली सुप्रिया भट्टाचार्य सरकारी स्कूल में टीचर थीं। नौकरी छोड़कर सोशल वर्क करने लगीं। वे महिला एकता परिषद की प्रेसिडेंट हैं और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए काम करती हैं।
सुप्रिया भट्टाचार्य ढाकेश्वरी मंदिर में दर्शन के लिए आई थीं। करीब 300 लोगों में साथ गीता पाठ कर रही थीं। पाठ खत्म होते ही 12 फरवरी को होने वाले चुनाव पर बातें होने लगीं। सुप्रिया कहती हैं कि बांग्लादेश में जब भी चुनाव होते हैं, हमारे दिलों में खौफ घर कर जाता है।
सुप्रिया कहती हैं, ‘चुनाव के वक्त अल्पसंख्यक समुदाय के लोग डरे हुए हैं। मैं तो ढाका में रहती हूं, इसलिए उतना डर नहीं है। दूरदराज के इलाकों और गांवों में रहने वाले हिंदू बहुत ज्यादा डर में जी रहे हैं। इस बार हिंदू समुदाय पर एक और दबाव है। हमें रेफरेंडम के पक्ष या विपक्ष में वोट करना है। हमें समझ नहीं आ रहा कि संविधान बदलने के लिए वोट करें या जो संविधान है, उसी के पक्ष में रहें।’

हिंदुओं पर हमले कौन करता है? जवाब में सुप्रिया कहती हैं, ‘साफतौर पर नहीं कह सकते कि ये कौन कर रहा है। ये आतंकी मानसिकता के लोग हैं। जरूरी नहीं कि वे किसी पार्टी के लोग हों, लेकिन अगर बांग्लादेश की सरकार ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं करती है, तो ये उसकी नाकामी है।’
मंदिर में आईं केएस सिन्हा डांस टीचर हैं। वे कहती हैं, ‘बांग्लादेश में बहुत सारे हिंदू रहते हैं। हम वोट डालना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि बांग्लादेश में ऐसी सरकार बने, जो सबकी सुरक्षा के लिए काम करे, न कि किसी एक धर्म के लिए।’
जगह: जगन्नाथ हॉल कैंपस, ढाका यूनिवर्सिटी ढाकेश्वरी मंदिर के बाद हम ढाका यूनिवर्सिटी के जगन्नाथ हॉल कैंपस पहुंचे। ये कैंपस अल्पसंख्यक छात्रों के लिए है। हॉस्टल में रहने वाले ज्यादातर छात्र हिंदू हैं। हॉस्टल के अंदर मंदिर, काली पूजा के लिए जगह और बुद्ध की मूर्तियां हैं।
हॉल यूनियन के लीडर सुदीप्तो प्रमाणिक कहते हैं, ‘जब भी चुनाव होते हैं, हमें अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगती है। हम चाहते हैं कि ऐसी सरकार आए, जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दे। 1971 से ही अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो रहा है। सरकार जिन अधिकारियों को प्रमोशन दे रही है, उनमें एक भी हिंदू नहीं है।’
‘मैं धार्मिक पहचान के तौर पर कड़ा पहनता हूं। मुझे ये पहनने से दिक्कत नहीं हुई, लेकिन मेरे एक जूनियर को हॉस्टल में एक साल पहले कलावा पहनने की वजह से पीटा गया था। लड़कियों को बिंदी या टीका लगाने की वजह से टारगेट किया जाता है।’

जनवरी में साम्प्रदायिक हिंसा के 42 केस 1 से 27 जनवरी के बीच देशभर में साम्प्रदायिक हिंसा के 42 केस दर्ज किए गए। इनमें 11 लोग मारे गए। बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल ने 29 जनवरी को ये डेटा जारी किया था। काउंसिल ने ढाका में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय डर और असुरक्षा के साए में जी रहे हैं। वे मजबूर हैं कि चुनाव में किसी को भी वोट न करें।
सुदीप्तो प्रमाणिक इस पर कहते हैं, ‘अगर ऐसी ही स्थिति रहती है और अल्पसंख्यक वोट डालने से हिचकिचाते हैं, तो इसकी जिम्मेदार सरकार है। सरकार, प्रशासन, चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टियां अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने में नाकाम रही हैं।’

मुस्लिम बोले- हिंदुओं से कोई टकराव नहीं ढाका के रहने वाले एएसएम फैजल फार्मासिस्ट हैं। हमने उनसे देश में हिंदुओं की स्थिति के बारे में पूछा। वे जवाब देते हैं, ‘मैं अलग-अलग धर्मों के लोगों से मिलता हूं। उनमें से कुछ से मेरे अच्छे संबंध हैं। मैंने कभी किसी को किसी पर जुल्म करते नहीं देखा। हो सकता है कि लोगों के बीच घरेलू या जमीन से जुड़े विवाद हों, उन्हीं वजहों से कभी-कभार घटनाएं हो जाती हों। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि किसी पर सिर्फ इसलिए हमला किया गया हो क्योंकि वह अल्पसंख्यक है।’

हिंदुओं को धमकी- 5 लाख टका दो, वर्ना दुर्गा पूजा नहीं करने देंगे सितंबर, 2024 में दुर्गा पूजा के पहले हिंदुओं को धमकी भरे लेटर मिले थे। खुलना जिले के दाकोप में भी ऐसा ही लेटर पहुंचा था। इसमें लिखा था कि अगर गांववाले 5 लाख बांग्लादेशी टका नहीं देंगे, तो दुर्गा पूजा नहीं मनाने दी जाएगी।
दाकोप के कमर खोला गांव में स्कूल टीचर साइकत गिलदार मंदिर के प्रमुख हैं। गांव के मुखिया भी हैं। वे बताते हैं, ‘धमकी भरा लेटर किसने भेजा था, इसका पता नहीं चला। उसमें लिखा था कि अगर दुर्गा पूजा का त्योहार मनाना है, तो पैसा देना होगा, नहीं तो तुम्हें मार देंगे।’
हाथ में धमकी भरा लेटर पकड़े हुए साइकत अब भी डरे हुए हैं। वे बताते हैं कि हम इतना डर गए थे कि दुर्गा पूजा का उत्सव ही नहीं मनाया।

कमर खोला गांव की दुर्गा पूजा समिति को यही लेटर मिला था। पैसों की मांग के साथ इसमें लिखा था कि ये आदेश सभी के लिए है।
लेटर में लिखा था कि इस बार दुर्गा पूजा के लिए तुम्हें 5 लाख टका (करीब 3.5 लाख रुपए) देना होगा, वर्ना किसी हालत में पूजा नहीं करने देंगे। यह हमारी तरफ से आखिरी चेतावनी है। अगर तुमने इसे हल्के में लिया, तो नतीजे बहुत बुरे होंगे। पैसे तैयार रखो। हम बताएंगे कि कालीनगर बाजार में कहां और कैसे पैसे पहुंचाने हैं। अगर पुलिस को बताया तो याद रखना, तुम्हें और तुम्हारे परिवार को छोड़ा नहीं जाएगा। आसपास के सभी मंदिरों को हमारी बात माननी होगी।
दाकोप की रहने वालीं तुलसी गलदार साइकत की भाभी हैं। वे कहती हैं कि गांव में कोई दिक्कत नहीं है। सब मिल-जुलकर रहते हैं, लेकिन इस तरह की खबरें पढ़ती हूं, तो डर जाती हूं। मुझे डर लगता है क्योंकि मैं हिंदू हूं।’
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