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Bangladesh Sharia Law; Azizul-Haque Islamabadi – Hifazat-e-Islam


बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामिक संगठन है हिफाजत-ए-इस्लाम। ये संगठन बांग्लादेश में इस्लाम की तालीम देता है। पूरे देश में हिफाजत के मदरसे हैं। अजीज-उल-हक इस्लामाबादी संगठन के जॉइंट जनरल सेक्रेटरी हैं।

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पूरे बांग्लादेश में हिफाजत का नेटवर्क है। गांव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक सेंटर हैं। इसलिए चुनाव के दौर में हिफाजत की अहमियत बढ़ जाती है। ये संगठन सीधे राजनीति में शामिल होने से इनकार करता है, लेकिन उसके पास लोगों को प्रभावित करने की ताकत है।

अजीज-उल-हक बांग्लादेश में इस्लामिक कानून की वकालत करते हैं। महिलाओं की आजादी की बात करते हैं, साथ ही कहते हैं कि जिस कौम की लीडर महिला है, वह कौम कामयाब नहीं हो सकती। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

सवाल: भारत और बांग्लादेश के बीच हाल में खटास आई है। भारत के साथ कैसे रिश्ते होने चाहिए? जवाब: हम अंग्रेजों के खिलाफ जंग की वजह से अलग हुए हैं। अल्लाह की तरफ से हमें आजादी मिली। हिंदुस्तान के साथ हमारी दोस्ती और मोहब्बत होना चाहिए। दोनों के बीच अदावत नहीं होना चाहिए।

हमने 17 साल देखा है कि हिंदुस्तान की हुकूमत ने सिर्फ अवामी लीग का समर्थन किया और इस्लामी तंजीम को खत्म करने के लिए साजिश की। अवामी लीग को एकतरफा सपोर्ट करने की वजह से लोग हिंदुस्तान के खिलाफ खड़े हुए। सिर्फ एक पार्टी के साथ दोस्ती रखना हिंदुस्तान की पॉलिसी की गड़बड़ी है।

सवाल: डॉ. यूनुस की अंतरिम सरकार के बारे में क्या फीडबैक आया, क्या वे इस्लाम के हिसाब से काम कर रहे हैं? जवाब: वे इस्लाम का निजाम कायम करने के लिए तो नहीं आए हैं। फिर भी मैं कह सकता हूं कि डॉ. यूनुस ने इस्लाम के खिलाफ कोई काम नहीं किया।

सवाल: क्या बांग्लादेश इस्लामिक देश बनने के रास्ते पर है? जवाब: 1971 से 2026 तक बांग्लादेश में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। हिंदू, बौद्ध, क्रिश्चियन अलग-अलग धर्म को मानने वाले यहां रहते हैं। हम सबके साथ मिलकर काम करते हैं। बांग्लादेश के लोग इस्लाम को हुकूमत में ले जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन यहां डेमोक्रेटिक और कम्युनिस्ट पार्टियां हैं। 54 साल तक उन्होंने हुकूमत चलाई। इस्लाम शांति और सलामती की बात करता है।

सवाल: क्या देश शरिया से चलना चाहिए? जवाब: हम तो चाहते हैं, लेकिन बांग्लादेश की ज्यादातर आबादी शरिया की जरूरत महसूस नहीं करती। अगर शरिया के मुताबिक बांग्लादेश का कानून बने, तो सब अच्छा हो जाएगा। हर किसी को इंसाफ मिलेगा। ये शरिया से ही हासिल होगा।

सवाल: आप सभी को इंसाफ देने की बात कर रहे हैं। हिफाजत-ए-इस्लाम की लीडरशिप में कितनी महिलाएं हैं? जवाब: महिलाएं हमारा साथ देती हैं। महिलाओं की शिक्षा भी जरूरी है। महिलाओं को मशविरा देने का हक है।

सवाल: मशविरा तो ठीक है, लेकिन क्या महिला नेतृत्व नहीं कर सकतीं? जवाब: इस्लामिक कानून में महिलाओं की लीडरशिप की मनाही है।

सवाल: बांग्लादेश में तो शेख हसीना और खालिदा जिया प्रधानमंत्री रही हैं। इस्लामिक कानून क्या फिर किसी महिला को PM नहीं बनने देगा? जवाब: अल्लाह के नबी ने फरमाया है कि जिस कौम की लीडर महिला है, वो कौम कामयाब नहीं हो सकती। हम अल्लाह और उसके रसूल के फरमान को मानते हैं। अल्लाह ने किसी महिला को नबी नहीं बनाया। अमेरिका में तो कोई औरत प्रेसिडेंट नहीं हुईं।

जो बांग्लादेश की हुकूमत में आने के लिए साजिशें करते हैं, उनके मुल्क में तो महिलाओं को लीडर नहीं बनाते। फिर हमारे मुसलमान देश में क्यों ऐसी उम्मीद करते हैं। हम बांग्लादेश में अच्छे से हुकूमत चलाते हैं। औरतें हमारे खिलाफ नहीं होतीं। सेक्युलर, डेमोक्रेटिक और कम्युनिस्ट पार्टियों में महिलाएं विरोध करती हैं। इस्लाम में तो कोई विरोध नहीं करता। इस्लाम तो मिसाल है कि हमारी औरतें घर में शांति से रहती हैं। अपने हक पाती हैं।

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अधिकारों के लिए आंदोलन करना जरूरी नहीं है। महिलाएं अपने पति, भाई के खिलाफ मुकदमा नहीं करतीं, लेकिन हम देखते हैं दूसरे देशों में यही सब होता है। हम खुद महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा हक देने के लिए तैयार हैं।

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सवाल: अफगानिस्तान में तालिबान ने सभी धर्म की महिलाओं को हिजाब जरूरी कर दिया है। क्या बांग्लादेश में भी बुर्का या हिजाब जरूरी किया जाना चाहिए? जवाब: मुसलमान को अपना धर्म मानना चाहिए। अल्लाह का हुकुम मानना चाहिए। जिस धर्म में अल्लाह का हुकुम नहीं है, जैसे ईसाई, यहूदी, बौद्ध को ये मानना जरूरी नहीं है। मुसलमानों को कुरान को मानना चाहिए। अगर कोई कुरान नहीं मानना चाहे, तो हम मजबूर नहीं करते हैं।

शेख हसीना सेक्युलर PM थीं, लेकिन कुरान नहीं मानती थीं। बांग्लादेश के उलेमा ने उनके खिलाफ तो कोई विरोध नहीं किया। ये एक प्रोपेगैंडा है। अगर बांग्लादेश में इस्लामिक हुकूमत कायम हो सके, तो मर्दों और औरतों के लिए अलग-अलग सिलेबस होना चाहिए।

सवाल: बांग्लादेश की सबसे बड़ी इंडस्ट्री टेक्सटाइल में आधी से ज्यादा वर्कफोर्स महिलाओं की है, क्या उन्हें काम करने की आजादी नहीं होना चाहिए? जवाब: 2013 में अवामी लीग ने हमारे बारे में साजिशन ये फैलाया कि हम महिलाओं की काम करने की आजादी के खिलाफ हैं। ये इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगैंडा है। हमने सबसे पहले महिलाओं की सैलरी 5 से बढ़ाकर 8 हजार करने की मांग की थी।

सवाल: आपने कहा कि हिफाजत गैर सियासी संगठन है, लेकिन आपके संगठन के बड़े लीडर ममनुल हक जमात के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं? जवाब: हम गैर सियासी संगठन हैं। इस्लामकि स्कॉलर इसमें शामिल हो सकते हैं। हिफाजत में कोई सिर्फ राजनीति में होने की वजह से नहीं आ सकता। हिफाजत का आधार राजनीति नहीं है। हमारे बैनर के अंदर राजनीति नहीं कर सकते।

सवाल: ढाका यूनिवर्सिटी में लड़कियां साड़ी पहनकर आती हैं, लड़के कुर्ता पहनते हैं, गाना-बजाना भी करते हैं, अगर इस्लामिक हुकूमत बनती है, तो क्या तब भी ये सब कर सकेंगे? जवाब: अगर बांग्लादेश में इस्लामिक हुकूमत कायम हो, तब इस्लामिक कानून नाफिज (लागू) हो सकते हैं। यूनिवर्सिटी में अभी सब मौजूदा कानून के हिसाब से होता है। दूसरे मजहब की संस्कृति, गाना-बजाना, ये मुसलमानों के लिए सही नहीं है। हम उनसे गुजारिश ही करते हैं कि आप इस्लामिक कानून पर चलें।

सवाल: इस बार का चुनाव BNP और जमात के बीच है। आप इस्लामिक हक की बात कर रहे हैं, कौन सी पार्टी ये बेहतर तरीके से कर सकती है? जवाब: सत्ता में आने के लिए बहुमत चाहिए। इस वक्त इस्लामिक हुकूमत कायम करने की कोशिश करना हमारा फर्ज है। अगर बांग्लादेश के लोग ये नहीं मानते हैं, तो हम क्या कर सकते हैं। जिस पार्टी के हुकूमत में आने से देश, मस्जिद-मदरसे, इस्लाम की तरक्की हो, उसे सत्ता में आना चाहिए।

सवाल: वो पार्टी कौन सी है? जवाब: जो पहले से सत्ता संभाल चुके हैं, जिनके पास तजुर्बा है, ऐसी पार्टी को वोट करना चाहिए।

सवाल: अगर चुनी हुई सरकार इस्लामिक हुकूमत लाती है और लोग विरोध करते हैं तो हिफाजत का क्या रोल रहेगा? जवाब: बांग्लादेश के ज्यादार लोग और सरकारी कर्मचारी इस्लामिक हुकूमत लाना चाहते हैं। हम भी इस्लामिक कानून चाहते हैं।

सवाल: अगर जमात सत्ता में आती है, तो क्या आप उन पर इस्लामिक शासन लाने के लिए दबाव बनाएंगे? जवाब: जमात ने तो ऐलान कर दिया है कि वे इस्लामिक कानून नहीं लाएंगे। अगर इस्लामिक कानून लागू नहीं करते हैं, तो हम उनके खिलाफ जाएंगे। हमारा मंसूबा है- अल्लाह का निजाम। जमात ने अमेरिका से वादा किया कि अगर हम हुकूमत में आए, तो आपके मशविरे से चलेंगे और शरिया लागू नहीं करेंगे।

सवाल: खबरें हैं कि अमेरिकी डिप्लोमैट जमात के नेताओं से मिले थे, ये बात सही है? जवाब: दुनिया में एक बात मशहूर है कि अमेरिका जिसका दोस्त है, उसे दुश्मन की जरूरत नहीं है। जमात दोस्त के नाम पर दुश्मन पाल रही है। इराक और लीबिया में अमेरिका ने क्या किया, बांग्लादेश को हम इराक-लीबिया नहीं बनाना चाहते।

सवाल: हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामिक संगठन है। आपने अपने समर्थकों को किसे वोट देने का मैसेज दिया है? जवाब: अवामी लीग (पूर्व PM शेख हसीना की पार्टी) ने बांग्लादेश के लोगों पर बहुत जुल्म किए। इसके खिलाफ हुए आंदोलन में देश के आम लोग शामिल हुए। अल्लाह ने हमें एक जालिम हुकूमत से निजात दिलाई है। 12 फरवरी को चुनाव हैं। इसके लिए हिफाजत-ए-इस्लाम की तरफ से पैगाम है कि उस पार्टी को वोट करें, जो मुल्क, दीन, तालीम और मदरसा महफूज कर पाए।

हम किसी सियासी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते, लेकिन मुल्क का नागरिक होने की वजह से वोट देना हमारा हक है। ये हक अदा करना हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

सवाल: देश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। भीड़ ने दीपू चंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में मार दिया। इसके सबूत भी नहीं हैं। आप इस हिंसा को कैसे देखते हैं? जवाब: हमने अखबार में साफ बयान दिया था कि ये काम गलत है। इस्लाम इसका समर्थन नहीं करता। हम देश के लोगों को पैगाम देते हैं कि इस तरह के हमले में शामिल न हों। अगर कोई इस्लाम या कुरान के खिलाफ बयान दे, तो कानूनी रास्ते से शिकायत करें। कानून अपने हाथ में न लें।

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बांग्लादेश से ये रिपोर्ट भी पढ़े

1. भारत से दोस्ती या दुश्मनी, चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा

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2. BNP लीडर बोले- इंडिया स्पेशल नहीं, शेख हसीना को पनाह देने से रिश्ते कैसे सुधरेंगे

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