
पर्दे पर पहला सीन आता है जहां एक महिला अर्धनग्न अवस्था में रेल की पटरियों के बीचों-बीच पड़ी हुई है। कोई मदद के लिए आता है। उसे उठाकर अस्पताल लेकर जाता है और इसी के साथ आपके दिल की धड़कन बढ़ने लग जाती हैं क्योंकि अगर पहला सीन इस तरीके से पिक्चराइज किया है तो आगे फिल्म में क्या-क्या देखना पड़ेगा, यह सोचकर आपकी रूह कांप जाती है। बात हो रही है फिल्म 'अस्सी' की, जिसका स्पेशल शो मीडिया के लिए रखा गया था। यह फिल्म यूं तो हमने लगभग 1 हफ्ते पहले देख ली है, क्योंकि 'अस्सी' 20 फरवरी को रिलीज होगी। यह एक कोर्टरूम ड्रामा है और जिसकी बु्नावट एक रेप केस के इर्दगिर्द की गई है।
एक महिला दिल्ली में एक मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलती है। उसे पकड़ लिया जाता है और चलती कार में उसके साथ रेप किया जाता है। यह घटनाक्रम इतना भयावह है कि उसके बारे में बात करना ही बहुत मुश्किल लगता है तो उस महिला के बारे में सोचिए इस रेप ने उसके जीवन पर क्या असर डाला होगा। उसके पति के उसके बच्चे के आसपास रहने वाले लोगों के जीवन को कैसे बदल दिया होगा। अस्सी फिल्म का ये कोर्ट रूम ड्रामा न लगते हुए हर लड़की के दिल में उठने वाला सवाल है और समाज के कुछ लोगों के मन में उठने वाला उपहास है।
फिल्म एक टीचर परिमा की कहानी है जो हंसी खुशी जिंदगी जी रही है। अपने स्कूल की ही एक पार्टी से जरा लेट हो जाती है। पति के साथ ना लौटते हुए अकेले दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन पर उतर जाती है और यह उसकी भूल साबित होती है। कुछ लड़के उसे दबोच लेते हैं और चलती कार में उसके साथ बार-बार रेप किया जाता है
उसकी हालत यह हो जाती है कि न तो विरोध करने के लिए सक्षम बचती है और ना ही हॉस्पिटल में पहुंच जाने के बाद अपने शारीरिक, मानसिक और इमोशनल पीड़ा से निजात पा सकती है। ऐसे में तापसी पन्नू जो कि एक लॉयर रावी के रूप में दिखाई दी है। वह आगे आकर हिम्मत बढ़ाने का काम करती है।
इस पूरी घटना का असर परिमा के परिवार पर भी पड़ता है। मोहम्मद ज़ीशान अयूब जो कि परिमा के पति के रोल में हैं इस घटनाक्रम से स्तब्ध रह जाते हैं। इस बात को लेकर खुद को कोसते हैं कि वह अपने पत्नी को सुरक्षा नहीं दे पाए।
वहीं उनका छोटा सा बेटा ध्रुव जिसका रोल अद्विक जायसवाल ने निभाया है। वह अपनी इस मां की स्थिति को समझ पाता है लेकिन मां को कैसे इस हालत में डाला गया इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है। कभी वह मां को देख कर बहुत दुखी हो जाता है तो कभी हाथ पकड़ कर अपने पिता को जिंदगी में आगे बढ़ने का साहस भी देता है। एक और कहानी चलती है जहां पर रावी और और उसके कार्तिक दादा भी है।
कोर्टरूम ड्रामा में भरसक कोशिश की जाती है कि परिमा के जो अपराधी पकड़े गए हैं उन्हें बेकसूर साबित किया जाए और परिमा के जख्मों को बार-बार कुरेद दिया जाए।
एक्टिंग की बात की जाए तो तापसी पन्नू ने गहराई के साथ अभिनय किया है। वह एक ऐसी वकील बनी हैं, जो कानून के दांवपेंच भी जानती है, हिम्मती भी है और समय आने पर विषय की गहराई भी समझती है।

कानी को हम पहले भी अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय फिल्मों में अपना नाम करते हुए देख चुके हैं। एक रेप विक्टिम का दर्द, उसकी उलझन, उसके ट्रॉमा और पीड़ा को कानी ने बहुत गंभीरता के साथ निभाया है।
रेवती आपको उतनी ही विश्वसनीय और ऊंचे ओहदे पर बैठी हुई समझदार जज लगती है जिसे रेप विक्टिम के साथ नाइंसाफी ना हो इस बात का ध्यान रखना है। रेवती ने अपने सशक्त अभिनय के द्वारा प्रभावित किया है। कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा, अद्विक जायसवाल सहित अन्य कलाकारों की मेहनत दिखाई देती है।
निर्देशन की बात कही जाए तो अनुभव सिन्हा का अनुभव हमेशा पर्दे पर दिखाई दे जाता है। कोर्टरूम ड्रामा में वह जो विषय को देखने और परखने का नया नजरिया लेकर आते हैं जो शायद लोग नजरअंदाज कर जाते हैं।
कैसे इस फिल्म में कभी-कभी मौके पर मौजूद सबूतों से भी परिणाम बदले जा सकते हैं या फिर जज साहिबा का यह कह देना कि आशा है कि नई पीढ़ी कुछ बेहतर कर पाएगी, हमारी पीढ़ी तो कुछ खास कर नहीं सकी दुनिया बदलने के लिए, तो आप को लगता है कि शायद यही वह बातें है जो हर लड़की के दिमाग में चलती है।
समाज महिलाओं की स्थिति अच्छे होते हुए देखना तो चाहती है, लेकिन करना कुछ नहीं चाहता। कई बार जो बदलाव करना चाहता है उसमें से कुछ लोग अपराध का रास्ता भी चुन सकते हैं। इतने सारे विरोधाभास में जब निर्देशक अपनी बात लोगों के जेहन में बहुत साफ तौर पर पहुंचा देता है तब उसकी असली जीत हो जाती है।
फिल्म में माई मेरी गाना लिखा, संगीतबद्ध और गाया स्वानंद किरकिरे ने है, जो फिल्म के साथ-साथ चलता है और आपको इमोशनल कर देता है।
फिल्म में एक ही बात खटकती है, जो यह कि इसमें नसीरुद्दीन शाह का कोई रोल क्यों रखा गया है? स्पेशल अपीयरेंस कहानी में कोई बदलाव नहीं ला पाया। यह रोल कोई भी कलाकार निभा सकता था। यहां तक कि वॉइस ओवर डालकर भी इस रोल को कहानी में बुना जा सकता था। नसीरुद्दीन शाह का होना और उन्हें मनमाफिक ना देख पाने का दुख अलग तरीके से आपको सताएगा।
अगर फिल्म के ग्रामर की मैं बात करती हूं तो उस लिहाज से भी यह फिल्म बहुत बेहतरीन बन पड़ी है क्योंकि कोर्टरूम ड्रामा दिखाया गया है। अपराध दिखाया गया है। अपराध करने वाले और अपराध को भोगने वाले यानी व्यक्ति की मनोदशा को दिखाया गया है।
अंत में कुछ एक बातों को बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगर सभी अपराधी बन गए तो फिर समाज कैसे चलेगा? या, अपराध जिसके साथ हुआ है उसे भी खड़े होकर लड़ना होगा और उसका साथ देने के लिए हर उस व्यक्ति को आना होगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज नहीं तो कल किसी अपराध का शिकार हो सकता है। उन सभी को उठ खड़े होना होगा और अपराध और अपराधी दोनों को नकारना होगा।
फिल्म अस्सी अपने नाम को सार्थक तब करती है जब वह यह बताती है कि उस रात 80 ऐसे केसेस दर्ज हुए। जिसमें से कुछ तो ट्रायल तक भी नहीं पहुंच पाए थे। जिस देश में हर 20 मिनट में एक महिला पर रेप किया जा रहा हो, ऐसे में इस फिल्म को कोर्टरूम ड्रामा के तौर पर दिखाना, उसके हर उस एंगल को परखना सच में एक बेहतरीन कोशिश है। यह फिल्म हर हाल में देखी जानी चाहिए।
- ASSI (2026)
- निर्देशक: अनुभव सिन्हा
- गीत: कुमार, स्वानंद किरकिरे
- संगीत: रोचक कोहली, स्वानंद किरकिरे
- कलाकार: तापसी पन्नू, कानि कुश्रुति, रेवती, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब, नसीरुद्दीन शाह, सुप्रिया पाठक, सीमा पाहवा, अद्विक जायसवाल
- रेटिंग : 4/5


