
24 नवंबर 1935। इंदौर का एक समृद्ध परिवार। पिता- अब्दुल रशीद खान, ब्रिटिश भारत में DIG पद तक पहुंचे अधिकारी। मां- सिद्दीका बानो, जिनका साया सलीम खान के सिर से तब उठ गया जब वे सिर्फ नौ साल के थे।
किशोरावस्था तक आते-आते दोनों माता-पिता नहीं रहे। एक समृद्ध घर का सबसे छोटा बेटा अचानक जीवन की कठोर सच्चाइयों के सामने खड़ा था। लेकिन शायद यही संघर्ष आगे चलकर उनकी कहानियों में उभरे गुस्से, विद्रोह और आत्मसम्मान की जड़ों में बैठ गया।
इंदौर में पढ़ाई के दौरान वे खेलों में अव्वल थे, क्रिकेट के स्टार खिलाड़ी। एक प्रशिक्षित पायलट भी। आकर्षक व्यक्तित्व ऐसा कि दोस्तों ने कहा- “तुम्हें फिल्मों में होना चाहिए।”
और फिर, वह शहर जिसे हर सपने देखने वाला जानता है- मुंबई।
‘प्रिंस सलीम’: जब हीरो बनने का सपना टूट गया
1960 का दशक। फिल्म बारात से शुरुआत। साइनिंग अमाउंट सिर्फ 1000 रुपये। मासिक वेतन सिर्फ 400 रुपये। नाम रखा गया 'प्रिंस सलीम'।
लेकिन बॉलीवुड का सच निर्मम होता है। छोटे रोल, साइड किरदार, बी-ग्रेड फिल्में। कभी नाम क्रेडिट में नहीं, कभी चेहरा भीड़ में खो जाता।
तीसरी मंज़िल में एक दोस्त की भूमिका ने थोड़ी पहचान दी, पर वह चमक नहीं आई जिसकी उम्मीद थी।
सलीम खान ने बाद में खुद कहा- “मैं अभिनेता बनने के लिए बना ही नहीं था। मुझमें प्रोजेक्शन की कला नहीं थी।”
यह स्वीकार करना आसान नहीं होता। लेकिन यहीं से कहानी पलटी।
एक मुलाकात जिसने इतिहास लिख दिया
फिल्म सरहदी लुटेरा के सेट पर उनकी मुलाकात हुई एक और संघर्षरत नौजवान से, जिसका नाम था जावेद अख्तर।
एक क्लैपर बॉय, जो बाद में संवाद लिखने लगा। एक असफल अभिनेता, जो कहानी सोचने लगा। दोनों के पास शब्द थे, भूख थी और एक बेचैनी थी, कुछ बड़ा करने की।
और यहीं जन्म हुआ हिंदी सिनेमा की सबसे विस्फोटक जोड़ी सलीम-जावेद का।
सलीम कहानी गढ़ते, किरदार रचते। जावेद उन किरदारों को आवाज देते।
1970 का भारत और ‘एंग्री यंग मैन’ का जन्म
यह वह दौर था जब देश बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा था। दर्शक स्क्रीन पर अपने गुस्से का प्रतिनिधि चाहते थे।
तभी आई फिल्म 'ज़ंजीर'।
इस फिल्म की पटकथा लगभग पूरी तरह सलीम ने लिखी थी। और इसी फिल्म से एक नया नायक जन्मा- अमिताभ बच्चन।
उस समय बच्चन संघर्षरत थे। कई फ्लॉप फिल्मों के बाद उनका करियर लगभग खत्म माना जा रहा था। लेकिन सलीम–जावेद ने उनमें वह चिंगारी देखी जो किसी और ने नहीं देखी।
‘एंग्री यंग मैन’ सिर्फ एक किरदार नहीं था, वह समय की आवाज था।
शोले: जब कहानी ने इतिहास रच दिया
शोले।
अगर हिंदी सिनेमा एक किताब है, तो यह उसका सबसे चमकदार अध्याय में से एक है।
गब्बर सिंह, जय-वीरू, ठाकुर, बसंती, ये सिर्फ पात्र नहीं, भारतीय पॉप कल्चर के स्थायी प्रतीक हैं।
शोले अपने समय की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। आज भी इसे भारतीय सिनेमा की महानतम फिल्मों में गिना जाता है।
दीवार, डॉन और संवादों की अमर विरासत
दीवार में लिखा गया संवाद- “आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है…”
आज भी उतना ही प्रभावी है।
डॉन ने एंटी-हीरो को ग्लैमर दिया।
त्रिशूल और क्रांति ने उनकी पकड़ और मजबूत की।
24 फिल्मों में साथ काम किया। 20 सुपरहिट। यह सिर्फ सफलता नहीं, यह वर्चस्व था।
लेखकों को मिला स्टारडम
1970 से पहले लेखक का नाम पोस्टर पर नहीं होता था। सलीम–जावेद ने नियम बदले।
उन्होंने ऊंची फीस मांगी।
क्रेडिट में नाम सुनिश्चित कराया।
स्क्रीनप्ले, कहानी और संवाद, तीनों पर अधिकार लिया।
वे हिंदी सिनेमा के पहले ‘स्टार राइटर’ बने।
अलगाव: जब दो रास्ते जुदा हो गए
1982 में जोड़ी टूट गई। कारण रहे- अहम, असहमति, परिस्थितियां।
सलीम खान ने बाद में नाम, अंगार, पत्थर के फूल जैसी फिल्मों के लिए लिखा। लेकिन वह जादू जोड़ी में था, वह दोहराया नहीं जा सका।
फिर भी, उनकी विरासत कम नहीं हुई।
परिवार: सिनेमा की दूसरी पारी
सलीम खान सिर्फ लेखक नहीं, एक ‘फिल्मी खानदान’ के मुखिया भी हैं।
उनके बड़े बेटे सलमान खान, भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं।
अरबाज़ खान, सोहेल खान- अभिनेता और निर्माता।
बेटी अलवीरा- निर्माता।
गोद ली हुई बेटी अर्पिता- परिवार का भावनात्मक केंद्र।
उनकी दो शादियां, सलमा खान और अभिनेत्री हेलेन ने उनके निजी जीवन को भी चर्चा में रखा।
सम्मान और स्वाभिमान
छह फिल्मफेयर पुरस्कार।
2014 में पद्मश्री की पेशकश।
लेकिन सलीम खान ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि वे इससे बड़े सम्मान के हकदार हैं।
यह बयान विवादास्पद था, पर यह उनके आत्मविश्वास का प्रमाण भी था।
सलीम खान ने सिर्फ फिल्में नहीं लिखीं, उन्होंने उस दौर का गुस्सा, उम्मीद और संघर्ष लिखा।
अगर अमिताभ बच्चन एक युग का चेहरा हैं, तो सलीम खान उस युग की कलम हैं।
जिसने हीरो बनने का सपना खोकर हीरो गढ़ने की कला पा ली।


