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सुबह के करीब 6 बजे होंगे। नीलगिरि की पहाड़ियों पर हल्की धुंध थी। मैं खेत से लौटा ही था- हाथों में अभी खेत की मिट्टी लगी थी- कि मंदिर की घंटी की आवाज आई। कोई परिवार इंतजार कर रहा था। परिवार बोला, ‘रवि अन्ना, जरा पूजा कर दीजिए… बेटे का इंटरव्यू है आज’। मैंने तुरंत स्नान किया। धोती संभाली, मंदिर के भीतर गया। वार्सिती अम्मन, मीनाक्षी अम्मन और मधुरई वीरन के सामने दीया जलाया। मंत्र मुझे नहीं आते- यह बात गांव का हर आदमी जानता है। फिर जैसा कि हमेशा करता हूं, दीया घुमाया, धूप जलाई, आंखें बंद कीं। धीरे से कहा, ‘अम्मा, इनका भला करना।’ कुछ दिन बाद वही परिवार मिठाई लेकर आया। बोला- ‘अन्ना, नौकरी लग गई।’ मैं 50 साल का दलित पुजारी रवि हूं। तमिलनाडु के पहाड़ी जिले नीलगिरि की ककंजी कॉलोनी का रहने वाला। हमारे गांव में करीब 200 परिवार हैं। यहीं पैदा हुआ, यहीं पला-बढ़ा। पिता भी यहीं रहे, दादा भी, और उनके भी पिता। कह सकते हैं कि हमारी कई पीढ़ियां इसी मिट्टी में मिली हुई हैं। सच कहूं तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन अपने ही गांव के मंदिर में पुजारी बनूंगा। न मैं कभी स्कूल गया, न संस्कृत पढ़ी, न कोई मंत्र आता है। पूजा-पाठ की तो हमारे घर में दूर-दूर तक कोई रवायत नहीं थी। लेकिन जब भी किसी मंदिर के सामने से गुजरता, मन में छोटी-सी इच्छा जरूर पलती थी- काश, कभी मैं भी भगवान के सामने खड़ा होकर किसी के लिए आशीर्वाद मांगता। बस इतनी-सी इच्छा। कोई बड़ा सपना नहीं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं। सिर्फ मन की एक साध थी। फिर समय बदला। सरकार ने मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति का नियम लागू किया। जिस दिन यह खबर आई, हमारे गांव में कई दिनों तक बैठकें चलीं। चर्चा हुई, मतभेद हुए। कुछ लोग मेरे पुजारी बनने के खिलाफ थे, लेकिन अंत में एकमत हुए और मेरा नाम तय किया। लोगों का कहना था – ‘रवि जो मांगता है, भगवान सुन लेते हैं।’ वह सीधा आदमी है। सबका हाल-चाल पूछता है। किसी के दुख-सुख में पीछे नहीं हटता। गांव के मंदिर के लिए सबसे सही आदमी है। मैंने साफ कहा था- ‘मुझे मंत्र नहीं आते।’ गांव वालों ने जवाब दिया- ‘हमें मंत्र नहीं, मन चाहिए।’ बस, उसी दिन से मैं इस मंदिर का पुजारी बन गया। सरकार मुझे इसके लिए 20 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देती है। इस मंदिर में तीन देवी-देवता विराजते हैं- वार्सिती अम्मन, मीनाक्षी अम्मन और मधुरई वीरन। मेरी पूजा करने की विधि बहुत सीधी-सादी है। मैं धूप जलाता हूं, दीया-बाती करता हूं। फिर भगवान के सामने खड़ा होकर धीरे-धीरे दीया घुमाता हूं। आंखें बंद करता हूं और मन ही मन कहता हूं- ‘इनका भला करना।’ बस इतना ही। एक बार गांव का एक परिवार मेरे पास आया। सालों से उनके घर बच्चा नहीं हो रहा था। चेहरे पर चिंता साफ थी। उन्होंने कहा, ‘रवि अन्ना, हमारे लिए प्रार्थना कर दो।’ मैंने हमेशा की तरह दीया जलाया, धूप दिखाई, और भगवान से कहा- ‘अम्मा, इनके घर भी किलकारी गूंजे।’ कुछ महीनों बाद वही परिवार खुशखबरी लेकर आया। उनके घर बच्चा हुआ था। वे मिठाई लेकर आए, मेरे पैरों को छूने लगे। मैं थोड़ा संकोच में पड़ गया। मैंने कहा- ‘यह सब भगवान की कृपा है।’ अब आप ही बताइए, इसमें मंत्रों का क्या काम था? सच कहूं तो जब भी मैं किसी के लिए पूजा करता हूं, पूरे मन से करता हूं। मुझे लगता है भगवान मन की भाषा समझते हैं। मैं इतना ही जानता हूं कि मैं जो भी कहता हूं, सच्चे दिल से। शायद उसी सच्चाई की आवाज ऊपर तक पहुंचती होगी। इस मंदिर में हम पूरे महीने में सिर्फ एक दिन सामूहिक पूजा करते हैं। पोंगल, दीवाली, पूर्णमा, तमिल नया साल सब यहीं मनाते हैं। मंदिर में तीन बार सालाना त्यौहार होता है। उस दिन अन्नदान किया जाता है। सालाना त्यौहार पर गांव के जो लोग बाहर रहते हैं, देश-विदेश कहीं भी। उन्हें गांव आना होता है। सालाना हर परिवार से दो से तीन हजार रुपए लिए जाते हैं। इसके अलावा काफी लोग इस मंदिर में खास तरह की पूजा भी करवाते हैं। इन मौको पर गांव के लोगों के सगे-संबंधी और उनके दोस्त भी आ सकते हैं। दरअसल, इस तरह सरकार द्वारा चलाए जा रहे मंदिरों में कोई भी जा सकता है। हालांकि, दलितों के अलावा यहां दूसरे जाति, समुदाय के लोग नहीं आते। इसके अलावा गांवों में कुछ प्राइवेट मंदिर भी हैं, जहां लोग जाते हैं। पहले इन मंदिरों की पूरी व्यवस्था ब्राह्मणों के हाथ में थी। हम जैसे लोगों के लिए मंदिर के भीतर की जगह कुछ अलग-सी लगती थी, लेकिन वहां तक पहुंचने का हमें अधिकार नहीं था। यही परंपरा चली आ रही थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। राज्य में मेरी तरह दलित पुजारियों की नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन यह बदलाव सभी को रास नहीं आया। ऊंची जाति के लोगों को आज भी अच्छा नहीं लगता कि कोई दलित पूजा कराए। उन्होंने मंदिर आना बंद कर दिया और अपना अलग मंदिर बनवा लिया। अब तमिलनाडु में जगह-जगह लोगों के अपने मंदिर दिखाई देते हैं। लेकिन, मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। वे अपने तरीके से पूजा करते हैं, हम अपने। हां, एक बात साफ हो गई है। अब हमें कोई किसी भी मंदिर में जाने या पूजा-पाठ करने से नहीं रोक सकता। यह फर्क मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं। कुछ बड़े मंदिर जहां ब्राह्मणों के साथ दलित पुजारी बनाए गए हैं, वहां उनके साथ अब भी भेदभाव किया जाता है। उन्हें बड़े विधि-विधान नहीं करने दिए जाते। मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। कहा जाता है कि उनमें पूरी योग्यता नहीं है। उन्हें मंत्र ठीक से नहीं आते। अपने मेंदिर मैं ही अकेला हूं, तो मुझे यह सब नहीं झेलना पड़ता। पिछड़े समाज के लोग पहले भी हमारे साथ थे, अब तो हमारी और इज्जत करने लगे हैं। मेरी प्रार्थना से उनका काम हो जाए, तो वे हमें पैसे, कपड़े और मिठाइयां देकर जाते हैं। लेकिन ब्राह्मण और ऊंची जाति के लोग अब भी हमसे दूरी बनाकर रखते हैं। दरअसल, तमिलनाडु के बड़े मंदिरों में आज भी पुजारी ब्राह्मण ही हैं। जब कभी मैं उन मंदिरों में जाता हूं- भीड़ के बीच खड़े होकर, सिर झुकाकर दर्शन करता हूं- तो साफ दिखता है कि वहां की पूरी व्यवस्था अब भी उन्हीं के हाथों में है। गर्भगृह के भीतर कौन जाएगा, पूजा कौन कराएगा, सब वही तय करते हैं। लेकिन वहां दलितों के पुजारी बनने की बात… अभी दूर की चीज है। फिर भी कहूं तो, जितना हुआ है, वह भी कम नहीं है। पहले जहां मंदिरों प्रवेश तक करने नहीं दिया जाता था, आज छोटे मंदिरों में ही सही हम पूजा करा रहे हैं। सरकार ने कम-से-कम शुरुआत तो की है। मंदिरों में पूरी बराबरी भले ही नहीं मिली है, लेकिन बहुत हद तक न्याय हुआ है। बाकी जो रह गया है, शायद वह आने वाले समय हो जाएगा। यहां सरकारी नीति की बात करूं तो कागज पर तो साफ लिखा है- किसी भी जाति का व्यक्ति पुजारी बन सकता है। नियम के हिसाब से हमारी नियुक्ति बड़े मंदिरों में भी होनी चाहिए। लेकिन अगर अचानक बड़े मंदिरों में हमारी नियुक्ति कर दी जाए, तो शायद राज्य में हंगामा खड़ा हो जाएगा। विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं। सुनते हैं कि ब्राह्मण, सरकार की इस व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जा चुके हैं। हालांकि, मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं मालूम। सुप्रीम कोर्ट में मामला होने की वजह से राज्य में अभी बहुत सारे पद खाली हैं। बहुत सारे मंदिरों में दलितों की नियुक्ति होना बाकी है। लेकिन सोचता हूं- चलो, शुरुआत तो हुई। सच बताऊं, जब अपने ही गांव के मंदिर में दीया जलाता हूं, तो मन गदगद हो जाता है। लगता है जो कभी असंभव था, वह आज सामने हो रहा है। और फिर मन में एक उम्मीद भी पलती है- शायद आने वाले सालों में तस्वीर और बदलेगी। हमारी अगली पीढ़ी बिना किसी डर या विरोध के बड़े मंदिरों में पूजा कराएगी। हालांकि, अभी सरकार ने एक और अच्छा काम कर दिया है। कोई भी किसी भी जाति का हो, अगर वह पुजारी बनना चाहता है तो वह बाकायदा 3 साल की पढ़ाई करके बन सकता है। मैं जानता हूं कि तमिलनाडु के सिवा बाकी राज्यों में ऐसा नहीं है। वहां कोई दलित पुजारी नहीं है। बल्कि वहां तो दलितों के मंदिर जाने पर भी पाबंदी है। इसलिए कहूंगा कि तमिलनाडु इस मामले में एक मॉडल है। तमिलनाडु के मॉडल को फॉलो किया जाए तो वहां के समाज में भी काफी अच्छा हो सकता है। लोग खुश रहेंगे। (दलित पुजारी रवि ने अपने जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) ———————————————— 1- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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