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Aak Plant- मारवाड़ का आक का पौधा बना ग्लोबल हॉट-प्रोडक्ट, किसानों और महिलाओं की बढ़ी कमाई

Aak Plant- आक का पौधा, जो अब तक मारवाड़ के किसानों के लिए खेतों में उगने वाली एक सामान्य झाड़ी भर था, अब देश के सबसे हॉटेस्ट Sustainable fashion ट्रेंड्स में अपनी जगह बना रहा है। बाड़मेर इस वादे के साथ कि रेगिस्तान की धूल में बसा यह पौधा अब सिर्फ़ प्रकृति का तोहफ़ा नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक समृद्धि का वाहक बनेगा।

केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह के नवंबर 2025 में उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संस्थान (निट्रा) में आक की फसल का निरीक्षण करने के ठीक एक महीने बाद, इस ऐतिहासिक पहल ने रफ़्तार पकड़ी। गाजियाबाद स्थित निट्रा केंद्र में एक MOU पर हस्ताक्षर हुए, जो मारवाड़ की ज़मीन से वैश्विक Fashion technology के कैनवस पर एक नया अध्याय लिखेगा।

मुख्य बिन्दु

निट्रा-रूमा देवी फाउंडेशन का गठजोड़: गेम-चेंजर MOU

इस समझौते पर निट्रा के महानिदेशक डॉ. एमएस परमार और अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर डॉ. रूमा देवी ने हस्ताक्षर किए, जिनकी फाउंडेशन पहले ही 2000 किलो आक पाडिया बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर और नागौर के ग्रामीण इलाकों से कलेक्ट कर चुकी है। यह फाउंडेशन अपने ‘वोकल फॉर लोकल’ मिशन के तहत उन महिलाओं को सशक्त बना रहा है, जिनके लिए यह पौधा अब तक बेकार की झाड़ी थी।

कार्यक्रम में निट्रा की डॉ. प्रीति और फाउंडेशन की ओर से विक्रम सिंह व प्रवक्ता हर्षिता सिंह की मौजूदगी ने इस पहल को एक सिस्टेमेटिक अप्रोच दिखाया। यह केवल एक MOU नहीं, बल्कि रेगिस्तान के किसानों के लिए एक इकोनॉमिक रिवोल्यूशन का ब्लूप्रिंट है।

आक की खूबियां: ऊन से ज़्यादा गर्म, रेशम से ज़्यादा मुलायम

आक का रेशा ऊन से अधिक गर्म और रेशम से भी ज़्यादा मुलायम होता है। यह पौधा मारवाड़ की सबसे बड़ी ताकत है – कम पानी में फलता-फूलता है और प्रति एकड़ 200-300 किलो तक उत्पादन देता है। निट्रा की प्रयोगशालाओं में इसकी मज़बूती और Textile innovation की तकनीक पर रिसर्च जारी है। इसके बीज का तेल Organic cosmetics उद्योग में इस्तेमाल होता है, जबकि तने और फल से भी उपयोगी सामग्री निकलती है।

डॉ. रूमा देवी के मुताबिक, “रेशे की मांग अभी सप्लाई से कहीं अधिक है। हमारी फैक्ट्रियों को हर रोज़ कॉल आते हैं कि आक का रेशा कब मिलेगा। यह मारवाड़ी महिलाओं के लिए एक Sustainable income source बनने वाला है।”

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव: 2000 किलो से शुरुआत

बीती गर्मियों में रूमा देवी फाउंडेशन ने ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षित करके इस पौधे की पहचान और कलेक्शन का काम शुरू करवाया। बिना किसी लागत के खेतों में स्वतः उगने वाले आक से महिलाओं को घर बैठे रोज़गार मिला। अब होली के आसपास जब रेशा पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तो इसकी मार्केटिंग और टेक्निकल प्रोसेसिंग पर फोकस होगा।

“हमारी मां बड़ी बहनें अब जानती हैं कि जो पौधा वे उखाड़ फेंकती थीं, वही उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्चा निकाल सकता है,” डॉ. परमार ने बताया कि इससे 5 जिलों में हज़ारों परिवारों की आर्थिक तस्वीर बदलेगी।

अंतरराष्ट्रीय मार्केट का दरवाज़ा: भारत का नया GI टैग प्रॉडक्ट?

आक से जैकेट, दस्ताने, कंबल, जुराब और बर्फीले क्षेत्रों के लिए टेंट तैयार हो रहे हैं। इन प्रोडक्ट्स को ग्लोबल Fashion market में पहचान दिलाने के लिए निट्रा की टेक्निकल एक्सपर्टाइज़ और रूमा देवी का इंटरनेशनल नेटवर्क काम करेगा। यह पहल न केवल Cruelty-free fashion को बढ़ावा देगी, बल्कि मारवाड़ को एक नए GI tag उत्पाद के साथ मैप करेगी।

मारवाड़ का आक अब सिर्फ़ पारंपरिक उपयोग से निकलकर मॉडर्न Textile industry का हिस्सा बन रहा है। जल्दी ही यह भारत के उन प्रोडक्ट्स में शुमार होगा, जो ग्लोबल मार्केट में ‘मेड इन इंडिया’ और ‘सस्टेनेबल’ का नया चेहरा होंगे।



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