HomeThe 50Bangladesh Election 2026 Vs India; BNP Jamaat E Islami Voters

Bangladesh Election 2026 Vs India; BNP Jamaat E Islami Voters


ढाका की मशहूर ‘शहीद मीनार’ के पास आइसक्रीम बेचने वाले अहीदुज्जमान जिस जगह ठेला लगाते हैं, वह बांग्लादेश की पहचान है। 1952 में इसी जगह ढाका यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भाषायी आंदोलन शुरू किया था। बांग्लादेश फिर बदलाव के दौर में है। शेख हसीना की सरकार गि

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अहीदुज्जमान कहते हैं, ‘मुझे चुनाव से कोई फर्क नहीं पड़ता। अवामी लीग ने देश को आजादी दिलवाई, उसी को चुनाव नहीं लड़ने दिया जा रहा। दूसरी तरफ जो 1971 के मुक्ति संग्राम के खिलाफ थे, जिन्होंने बांग्लादेश बनने का विरोध किया, वे चुनाव में जमकर प्रचार कर रहे हैं। अब बताइए इलेक्शन में हम किसे और क्यों वोट करेंगे।’

अहीदुज्जमान का इशारा जमात-ए-इस्लामी की ओर था। उनके जैसी ही उलझन हर आम बांग्लादेशी के सामने है। चुनाव में सिर्फ दो विकल्प हैं, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन। चुनाव की कवरेज के लिए दैनिक भास्कर ढाका पहुंचा है।

आम लोगों और एक्सपर्ट्स से बात करके समझ आया कि भारत सबसे बड़ा मुद्दा है। वोटर दो हिस्सों में बंटे हैं, एक भारत समर्थक है और दूसरा भारत विरोधी। लोगों को डर है कि चुनाव के दौरान हिंसा हो सकती है। इसमें अगस्त 2024 के आंदोलन के दौरान लूटे गए हथियारों को इस्तेमाल होने का खतरा है।

ढाका यूनिवर्सिटी का ये एरिया शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन का सेंटर पॉइंट था। यहां आज भी आंदोलन के निशान बाकी हैं। आंदोलन के बाद शेख हसीना भागकर भारत आ गई थीं।

ढाका यूनिवर्सिटी का ये एरिया शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन का सेंटर पॉइंट था। यहां आज भी आंदोलन के निशान बाकी हैं। आंदोलन के बाद शेख हसीना भागकर भारत आ गई थीं।

तख्तापलट की बुरी यादों से निकला बांग्लादेश, अब सड़कों पर चुनावी नारे अगस्त, 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद दैनिक भास्कर बांग्लादेश पहुंचा था। तब राजधानी ढाका के अलावा कई शहर हिंसा और आगजनी से दहले हुए थे। जगह-जगह तबाही की निशानियां थीं। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का कब्जा था और सुरक्षाबल भाग चुके थे।

अब ढाका में चहल-पहल है। चुनावी रैलियां हो रही हैं, पोस्टर लगे हैं। बांग्लादेश में फिलहाल डॉ. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार है। इसमें छात्र आंदोलन से निकले नेता भी एडवाइजर के तौर पर शामिल हैं।

इस बार चुनाव में सिर्फ दो धड़े हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जिसके नेता खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान हैं। दूसरा जमात-ए-इस्लामी, जिसने 11 पार्टियों का गठबंधन बनाया है। जमात के नेता शफीकुर रहमान हैं। पूर्व PM शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों की पार्टी नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी जमात के साथ हाथ मिला लिया है।

मुस्लिम बोले- भारत से दोस्ती जरूरी, जमात पाकिस्तान के एजेंडे पर शहीद मीनार के पास मिले अहीदुज्जमान चुनाव के बारे में कहते हैं, ‘देश में चुनाव के लिए जैसा माहौल होना चाहिए, वैसा है नहीं। ये चुनाव मजाक की तरह हो रहा है। स्टूडेंट्स ने आंदोलन करके शेख हसीना को हटा दिया। अब उनकी पार्टी NCP ने जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन कर लिया। वे अपनी पार्टी के अंदर ही महिलाओं से भेदभाव करते हैं।’

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NCP ने 5 अगस्त को जो वादा किया था, उस पर कुछ नहीं कर पाए। जमात-ए-इस्लामी ने पहले छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल किया, अब उनकी पार्टी का कर रही है। जमात ही NCP को चला रही है। वह अपनी हुकूमत कायम करके पाकिस्तानी एजेंडे को लागू करना चाहती है।

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‘पाकिस्तान ने हम पर जुल्म किया, सताया और कभी हमें बराबर का नहीं समझा। भारत ने हमें जुल्म और गुलामी से आजादी दिलाई। आज भारत बड़ी ताकत बन चुका है।’

ढाका में रिक्शा चलाने मोहम्मद नजरूल इस्लाम कहते हैं, ‘चुनाव में हर कोई अपनी फिक्र में लगा हुआ है। यहां पार्टियां लोगों के लिए राजनीति नहीं करतीं। पिछले दिनों इतने लोगों की मौत हो गई, उसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा। महंगाई पर कोई बात नहीं कर रहा। पार्टियां अपने फायदे के लिए सब करने में लगी हैं।’

‘मुझे नहीं पता कि मैं जमात को वोट करूं या BNP को। कोई मेरे बारे में तो बात ही नहीं कर रहा। मुझे लगता है कि भारत जैसे पड़ोसी से अच्छे रिश्ते रखने चाहिए। अभी रिश्ते अच्छे नहीं हैं।’

जमात-ए-इस्लामी की चुनावी रैलियों में भीड़ जुट रही है। फोटो बांग्लादेश के तीसरे बड़े शहर खुलना की है। जमात पर 2013 से बैन लगा था, जिसे अंतरिम सरकार ने हटा दिया।

जमात-ए-इस्लामी की चुनावी रैलियों में भीड़ जुट रही है। फोटो बांग्लादेश के तीसरे बड़े शहर खुलना की है। जमात पर 2013 से बैन लगा था, जिसे अंतरिम सरकार ने हटा दिया।

हिंदू वोटर्स की राय- पहले ज्यादा सेफ थे, समझ नहीं आ रहा किसे वोट दें ढाका की जगन्नाथ यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली सुष्मिता मोंडल म्यूजिक डिपार्टमेंट में सेकेंड ईयर की स्टूडेंट हैं। वे अपने दोस्तों के साथ शहीद मीनार आई थीं। चुनाव और अल्पसंख्यकों के हालात पर सुष्मिता कहती हैं, ‘बीच-बीच में दिक्कतें आती रहती हैं। सड़क पर लोग गलत इशारे करते हैं। टोकने पर बदतमीजी करने लगते हैं।’

‘ऐसा हमेशा से नहीं होता था। पहले हालात बेहतर थे। हम ज्यादा सुरक्षित महसूस करते थे। अब लगता है कि हमारे साथ कुछ हो भी जाए, तो कोई साथ नहीं देगा। ये डर हमारे दिल में घर कर गया है।’

बांग्लादेशियों के पास दो विकल्प बांग्लादेश के अलग-अलग तबकों के लोगों से बात करने पर समझ आया कि चुनाव को लेकर उनमें बहुत उत्साह नहीं है। आंदोलन चलाकर शेख हसीना की सरकार गिराने वाले छात्रों की पार्टी से भी बांग्लादेशियों का मोहभंग हो गया है।

अब उनके पास दो ही विकल्प हैं-

1. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी BNP के नेता वोट मांगते वक्त अपना पुराना शासन याद दिला रहे हैं। तारिक रहमान इस पार्टी के सबसे बड़े चेहरे हैं। वे देश को फिर से पटरी पर लाने का वादा कर रहे हैं। लोगों के बीच जाकर भविष्य की नीतियों का खाका पेश कर रहे हैं।

2. जमात-ए-इस्लामी जमात भविष्य के सपने बेच रही है। इस्लामिक पॉलिटिक्स को केंद्र में रखकर पार्टी खुलकर धर्म के आधार पर वोट मांग रही है। धर्म की राह पर चलकर करप्शन कम करने की बात कर रही है। जमात ने चुनाव की तैयारियां बहुत बारीकी से की हैं और सबसे बड़ा गठबंधन बनाने में कामयाब रही है।

एक्सपर्ट बोले- लोगों को सुरक्षा से मतलब, सरकार से नहीं ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सैफुल आलम चौधरी कहते हैं, ‘जिन हालात में बांग्लादेश में चुनाव हो रहे हैं, उसमें सबसे बड़ा सवाल है कि चुनाव होंगे या नहीं। अगर आप लोगों से बात करेंगे तो ज्यादातर कहेंगे कि चुनाव तो होगा, लेकिन नतीजे आएंगे या नहीं, इस पर शक है। अभी बांग्लादेश का अजीब माहौल है। अवामी लीग पर बैन लगा है। वह चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। सरकार चुनाव की बजाय रेफरेंडम पर जोर दे रही है।’

चौधरी आगे कहते हैं, ‘चुनाव शांति से और निष्पक्ष होंगे, इसे लेकर शंका है। अगस्त, 2024 में हुई हिंसा के दौरान बड़े पैमाने पर सिक्योरिटी फोर्स के हथियार लूटे गए थे। इनमें से सिर्फ 30% रिकवर हो पाए हैं। 70% हथियार अब भी लोगों के पास है। इसलिए लग रहा है कि चुनाव में हिंसा हो सकती है। चुनी हुई सरकार लोगों के लिए जवाबदेह होती है, अभी अंतरिम सरकार के साथ ऐसा नहीं है।’

चौधरी कहते हैं, ‘1971 के बाद से बांग्लादेश में दो तरह का वोट बैंक रहा है। एक भारत का समर्थक है, दूसरा विरोधी। कोई भी सिर्फ प्रो-इंडिया वोट बैंक से नहीं जीत सकता, इसलिए हर नेता और पार्टी खुद को भारत का विरोधी दिखाते हैं। मौजूदा सरकार भी अंदरूनी तौर पर भारत से पहले की तरह संबंध रखे हुए है। क्रिकेट जैसे मामलों पर ऐसा दिखाने की कोशिश हो रही है कि रिश्ते खराब हो रहे हैं।’

‘सरकार के साथ मिलकर चुनाव में धांधली कर सकती है जमात’ बांग्लादेश के सीनियर जर्नलिस्ट मंजरुल आलम पन्ना कहते हैं, ‘लोग दुविधा में हैं कि चुनाव होंगे या नहीं। डॉ. यूनुस की अंतरिम सरकार के काम में भेदभाव दिखता है। बांग्लादेश में कई सुपरपावर जैसे अमेरिका, चीन और तुर्किए का बड़ा दखल है। लोगों को लगता है कि डॉ. यूनुस पश्चिमी देशों का एजेंडा पूरा कर रहे हैं। कानून व्यवस्था बहुत खराब है। ऐसे में चुनाव कैसे होंगे, ये कहना मुश्किल है।’

मंजरुल आलम कहते हैं कि अवामी पार्टी की एक्टिविटी पर बैन है। ऐसे में BNP और जमात के बीच सीधी लड़ाई है। जमात के मुकाबले BNP ज्यादा पसंद की जाने वाली पार्टी है। उसके पास 35% रिजर्व वोट हैं। जमात के पास सिर्फ 5-7% वोट है।’

‘जमात और अंतरिम सरकार मिलकर बारीकी से चुनाव की प्लानिंग कर रहे हैं। मुझे लगता है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे और ये मिलकर धांधली करेंगे। अगस्त, 2024 में लोग इंडिया से नाराज थे। अब लोगों को समझ आ रहा है। भारत का विरोध करने वाले फिर से समर्थन में आ गए हैं।

हिंदू अल्पसंख्यक किसे वोट करेंगे बांग्लादेश में करीब 8% हिंदू आबादी है। चुनाव में 60 से 70 सीटों पर इनका असर है। तख्तापलट से पहले तक हिंदू समुदाय अवामी लीग के वोटर माने जाते थे। अब उनके सामने सवाल है कि वे किसे वोट करें।

मंजरुल आलम कहते हैं, ‘सबसे बड़ा सवाल है कि अवामी लीग के वोटर और अल्पसंख्यक किसे वोट देंगे। BNP अवामी लीग के वोटर्स को अपने पाले में ला सकती है। ऐसा होता है तो BNP को जीतने से कोई नहीं रोक सकता। अंतरिम सरकार ने अल्पसंख्यकों पर हमलों के बाद जिस तरह का बर्ताव किया है, उससे साफ है कि हिंदू समुदाय स्टूडेंट्स की पार्टी NCP और जमात को वोट नहीं देगा। ऐसे BNP ही बड़ा विकल्प बचता है।’

चुनाव में धांधली हुई, तो सेना के लिए मौका बांग्लादेश में चुनाव वाले दिन हिंसा और धांधली होती है, तो नतीजों में देरी होगी। अगर पूरे नतीजे नहीं आ पाए, दोबारा चुनाव कराया जाएगा। हालात हाथ से बिल्कुल बाहर हो गए, तो बांग्लादेश की आर्मी एक्टिव हो सकती है। सूत्र बताते हैं कि ऐसी स्थिति में नतीजे आने तक आर्मी कुछ वक्त के लिए सरकार भी बना सकती है।

प्रोफेसर चौधरी कहते हैं, ‘बांग्लादेश में आर्मी का रुख प्रोफेशनल रहा है, लेकिन हाल में कई मौकों पर आर्मी का रवैया भेदभाव वाला दिखा है। 5 अगस्त के बाद उसने कई बार सरकार के निर्देशों का पालन किया, लेकिन बीच-बीच में सरकार को चेतावनी देती भी दिखी है। आर्मी की ही जिम्मेदारी है कि चुनाव शांति से हों।’

………………………. बांग्लादेश से ये रिपोर्ट भी पढ़ें

BNP लीडर बोले- इंडिया स्पेशल नहीं, शेख हसीना को पनाह देने से रिश्ते कैसे सुधरेंगे

शेख हसीना की सरकार गिरने के 18 महीने बाद हो रहे इन चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार है। दैनिक भास्कर ने BNP की सेंट्रल कमेटी के मेंबर अब्दुल मोइन खान से बातचीत की। वे कहते हैं कि हम भारत से अच्छी दोस्ती चाहते हैं, लेकिन भारत में कुछ स्पेशल नहीं है। समझ नहीं आता उसने शेख हसीना को पनाह क्यों दी है। इससे रिश्ते अच्छे नहीं हो पाएंगे। पढ़ें पूरा इंटरव्यू…



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