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Student Leader Warns Jamaat Victory


शेख हसीना के खिलाफ हुए आंदोलन से निकले स्टूडेंट लीडर महफूज आलम अंतरिम सरकार में मंत्री बने, डॉ. मोहम्मद यूनुस के राइट हैंड की तरह काम किया, फिर अचानक इस्तीफा देना पड़ा। महफूज आलम कहते हैं कि वे अल्पसंख्यकों के लिए काम करना चाहते थे, लेकिन डॉ. यूनुस सर

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बांग्लादेश में 12 फरवरी को वोटिंग होनी है। दैनिक भास्कर ने चुनाव, अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों, कट्‌टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के उभार और छात्रों की पार्टी NCP पर बात की। महफूज आलम NCP और जमात गठबंधन के भी खिलाफ थे। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

सवाल: अंतरिम सरकार के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सबसे खराब दौर में हैं, ऐसा क्यों हुआ? जवाब: हमने भारत के साथ बात की थी। भारत को वास्तविकता का अंदाजा नहीं था। उसे सभी पार्टियों और लोगों के साथ बराबरी का रिश्ता रखना चाहिए था। हमने भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश की थी। इंडियन मीडिया को बांग्लादेश के बारे में प्रोपेगैंडा फैलाए बिना, फैक्ट पर रिपोर्टिंग करनी चाहिए। बांग्लादेश भारत से 30 मिनट दूर है, आइए और जमीन पर सच्चाई देखिए।

सवाल: आपने कहा कि बांग्लादेश दूसरा पाकिस्तान नहीं बनेगा, ऐसा क्यों कहा? जवाब: हमने बांग्लादेश के लिए पश्चिमी पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी। पाकिस्तान ने हमारे साथ न्याय नहीं किया। पूर्वी बंगाल के दलितों का शोषण किया। पाकिस्तान चाहता था कि सिर्फ मुसलमानों के पास अधिकार होंगे, लेकिन हमने बांग्लादेश में ऐसा नहीं किया। हमारे देश में कई अल्पसंख्यक समुदाय हैं। हम सभी को साथ लेकर आगे बढ़े।

हम 1947 के बंटवारे का दर्द नहीं भूले हैं। हमें एक पॉलिटिकल कमेटी की जरूरत है, जिसमें बांग्लादेश के सभी धर्म, समुदाय, जातियों को शामिल करके काम करना होगा।

सवाल: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों के पीछे कोई संगठन है या ये अलग-अलग घटनाएं हैं? जवाब: मुझे लगता है कि दोनों बातें हैं। ये उलेमा या मौलवी ही नहीं करवाते, हिंसा के पीछे ज्यादातर अवामी लीग, BNP और दूसरी पार्टियां होती हैं। ग्रामीण इलाकों में उलेमा या मौलवियों के पास इतनी पॉलिटिकल पावर नहीं है कि भीड़ जुटा सकें। वे धर्म को मानने वाले लोगों पर तो असर डाल सकते हैं, लेकिन कुछ बड़ा नहीं कर सकते।

ज्यादातर राजनीतिक रूप से काम करने वाले लोकल संगठन ये काम करते हैं। अगर किसी बिजनेसमैन को अल्पसंख्यक की जमीन चाहिए, तो वो धमकियां देना शुरू करता है। इस तरह के गुंडों को पार्टियां संरक्षण देती हैं।

अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा के पीछे सबसे बड़ी वजह जमीन होती है। लोकल कारोबारी या गुंडे अल्पसंख्यकों की जमीन हड़पना चाहते हैं। ये गुंडे ही पार्टियों में शामिल होते हैं, इसलिए उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती।

सवाल: आप अल्पसंख्यकों के लिए काम करना चाहते थे, लेकिन ऐसा करने से कौन रोक रहा था? जवाब: मैं अगस्त में अल्पसंख्यक समुदाय के कई लोगों से मिला था। डॉ. यूनुस के दफ्तर से मैं अल्पसंख्यक समुदाय के मसले डील कर रहा था। 53 साल बाद बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के लिए एक दिन की ज्यादा छुट्टी दी गई। मैंने खुद इसके लिए लड़ाई लड़ी। मैं ये लड़ाई क्यों ना लड़ूं, हमने शेख हसीना के भेदभाव के खिलाफ लड़े थे, तो फिर किसी और समुदाय के खिलाफ भी भेदभाव नहीं होना चाहिए।

यहां विरोध का सवाल नहीं है। मैं इस मुद्दे पर अलग तरीके से काम करना चाहता था। वे (अंतरिम सरकार) अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सरकारी तरीके से काम कर रहे थे। सही तरीका बातचीत और लोकतांत्रिक है। इससे हालात और ज्यादा खराब नहीं होते। अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के हल के लिए राजनीतिक पहल करना जरूरी है। मेरा रास्ता यही है।

सवाल: आपने अंतरिम सरकार में डॉ. यूनुस के राइट हैंड की तरह काम किया। स्टूडेंट लीडर से मंत्री बनने और फिर इस्तीफे तक का सफर कैसा रहा? जवाब: अंतरिम सरकार में बिल्कुल नया अनुभव था। हम कई तरह के बदलाव और सुधार करना चाहते थे, लेकिन समझ आया कि हकीकत कुछ और होती है। हम इसे समझ नहीं पाए। बदलाव के दौर में बनी सरकार की अपनी सीमाएं होती हैं।हमने पहले ही तय किया था कि हम कुछ वक्त तक सरकार चलाएंगे और फिर चुनाव करवाकर जीतने वाली पार्टी को सत्ता सौंप देंगे। हम ज्यादा कुछ नहीं कर पाए।

सवाल: आप छात्र आंदोलन का चेहरा थे, फिर छात्रों की नेशनल सिटिजन पार्टी क्यों जॉइन नहीं की? जवाब: हमारी राजनीतिक समझ अलग थी। हालांकि मैं चाहता था कि छात्र आंदोलन में शामिल लोग पार्टी बनाएं। पार्टी बनी भी, लेकिन मैं उसमें शामिल नहीं हुआ। अल्पसंख्यकों पर हमले, भीड़ की हिंसा, मजारों पर हो रहे हमले जैसे मुद्दों पर मेरी राय अलग थी। मैं सिर्फ सरकारी तौर-तरीकों से इन घटनाओं को रोकने के पक्ष में नहीं था। मेरा मानना था कि सरकार को इसे राजनीतिक और व्यावहारिक तरीके से रोकना चाहिए।

सवाल: छात्र आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार बनाते हुए आपने जो आदर्श तय किए थे, क्या सरकार उन पर खरी उतरी है? जवाब: नहीं, वैसा बिल्कुल भी नहीं हुआ। मुझे लगता है कि सरकार को राजनीतिक पार्टियों का समर्थन नहीं मिला। दिखाने के लिए राजनीतिक पार्टियां सहयोग कर रही थीं। हमने मुद्दों पर काम करना शुरू किया, तो उन्होंने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करवाने शुरू कर दिए। सरकार का राजनीतिक तौर पर मजबूत होना जरूरी है, लेकिन ऐसा था नहीं।

सवाल: डॉ. यूनुस पहले की तरह ही हैं या बांग्लादेश की राजनीति ने उन्हें बदल दिया? जवाब: मुझे लगता है कि वे छात्रों के साथ मिलकर बांग्लादेश के लिए बहुत कुछ काम करना चाहते थे। पॉलिटिकल पार्टियों ने डॉ. यूनुस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि सरकार से स्टूडेंट लीडर को निकालो। वे पार्टियों के दबाव में आ गए।

सवाल: कौन सी पार्टी डॉ. यूनुस पर दबाव बना रही थी? जवाब: दोनों ही पार्टियां (BNP और जमात) दबाव बना रही थीं। एक खुलेआम ऐसा कर रही थी और दूसरी पार्टी मेरे खिलाफ थी। मैं उस पार्टी के गलत काम के बारे में खुलकर बोलता था।

सवाल: डॉ. यूनुस में क्या बदलाव दिखते हैं? जवाब: डॉ. यूनुस आए थे, तब उनके अंदर बांग्लादेश को बदलने की चाहत थी। अब वे सरकार से बाहर जाने वाले हैं। उन्हें लग रहा है कि वे काम नहीं कर पाए। इसलिए निराशा से भर गए हैं। वे बड़े सपने देखा करते थे, लेकिन ये बहुत मुश्किल काम था। हालांकि, अब भी छात्रों के लिए अच्छा सोचते हैं।

सवाल: छात्र आंदोलन की शुरुआत सेक्युलरिज्म की भावना से हुई थी। अब छात्रों की पार्टी ने कट्‌टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही हैं, क्यों? जवाब: मैंने हमेशा जमात की विचारधारा के बारे में खुलकर बोला है। वह लोकतांत्रिक पार्टी है, लेकिन हमारी सोच जमात से अलग है। जमात और नए दौर की राजनीति के बीच फर्क होना चाहिए।

सवाल: आपने जमात से गठबंधन पर अपने छात्र आंदोलन के साथी नेताओं से बात की, डॉ. यूनुस ने इस पर क्या कहा? जवाब: मुझे नहीं पता कि डॉ. यूनुस इस बारे में क्या सोचते हैं। मैं तब तक सरकार छोड़ चुका था। कई छात्र इस गठबंधन से खुश भी थे। वे अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से सोच रहे थे। मैंने साफ तौर पर कहा कि अगर आप जमात के साथ जाना चाहते हैं तो जाइए, लेकिन मैं इस गठबंधन के खिलाफ हूं।

सवाल: आपको जमात के बारे कौन सी बात सबसे खराब लगती है? जवाब: जमात की पॉलिटिक्स सबको साथ लेकर नहीं चलती। मुझे लगता है आगे इसी पर दिक्कत होगी। 1971 के मुक्ति संग्राम के बारे में उनके एक्टिविस्ट बुरी बातें करते हैं। मैंने नाहिद (स्टूडेंट एडवाइजर) से भी कहा कि अभी जमात को आगे बढ़ने में और समय लगेगा। इसलिए जमात में मत शामिल होइए।

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अगर जमात खुद को बदलती है, तो आगे कभी उनके साथ जा सकते हो। अगर तुम जमात को सत्ता में आने में मदद करोगे, तो लोग तुम्हें पूरी जिंदगी कोसेंगे। तुम जमात की परछाई से कभी बाहर नहीं आ पाओगे।

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सवाल: बांग्लादेश में चुनाव कौन जीत रहा है? जवाब: मुझे लगता है कि जमात को 30% तक वोट मिल सकता है। हालांकि, सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिल पाएंगी।

सवाल: क्या जमात सत्ता में आने के लिए दूसरे रास्ते चुनेगी? जवाब: मुझे नहीं लगता चुनाव के बाद गठबंधन का कोई मौका होगा।

सवाल: अगर जमात सत्ता में आती है, तो आपके मन में सबसे बड़ा डर क्या है? जवाब: जमात राजनीतिक इस्लामिक पार्टी है। उसने खुद में पहले से सुधार किया है। जमात शरिया के मुताबिक चलने वाली सोसायटी से मुख्यधारा में आ रहा है, लेकिन ये सुधार नीचे के कार्यकर्ताओं तक नहीं गया है।

सवाल: अगर जमात सरकार बना लेती है तो अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर क्या असर होगा? जवाब: वे दिखाने के लिए कहेंगे कि हम सबके लिए बराबरी का रवैया रखते हैं। हकीकत में ऐसा नहीं होगा। वे इनके मुद्दों पर कुछ नहीं बोलेंगे। सीधे तौर पर परेशान तो नहीं करेंगे, लेकिन बचाएंगे भी नहीं। अगर जमात सत्ता में आती है, तो सूफियों को दिक्कतें हो सकती हैं।

सवाल: अंतरिम सरकार ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में कैसा काम किया है, खासतौर पर दिसंबर और जनवरी में, जब उन पर हमलों की ज्यादा खबरें आई हैं? जवाब: जो हुआ, वह बहुत दुखद है। अगर हम सत्ता में होते, तो बेहतर तरीके से काम करते।

………………………. बांग्लादेश से ये रिपोर्ट भी पढ़ें

1. भारत से दोस्ती या दुश्मनी, चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा

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2. BNP लीडर बोले- इंडिया स्पेशल नहीं, शेख हसीना को पनाह देने से रिश्ते कैसे सुधरेंगे

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